तृणमूल के बागी सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का किया एलान, अभिषेक का बागियों के गुट को मान्यता नहीं देने का अनुरोध

नयी दिल्ली: रविवार को तृणमूल कांग्रेस का संकट उस वक्त और गहरा गया जब बागी सांसदों ने बेहद कम र्चिचत ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी आॅफ इंडिया’ (एनसीपीआई) में विलय की घोषणा की और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिलकर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था का अनुरोध किया। वहीं, तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से आग्रह किया कि वह इस अलग हुए गुट को कोई मान्यता नहीं दें।

लोकसभा सदस्य सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा कि बागी गुट असली तृणमूल कांग्रेस के तौर पर मान्यता पाने के लिए अदालत में भी लड़ाई लड़ेगा और पार्टी के चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश करेगा। लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने संवाददाताओं से कहा कि तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने बिरला को सौंपे गए प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर किए हैं।

उन्होंने कहा, ”तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई लोकसभा सदस्यों ने एक अलग समूह के रूप में मान्यता देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। हम नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी आॅफ इंडिया में अपना विलय करेंगे और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का समर्थन करेंगे।” ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी आॅफ इंडिया’ त्रिपुरा की एक कम प्रसिद्ध पंजीकृत, लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है जिसकी कोई खास राजनीतिक मौजूदगी नहीं है। पार्टी ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें इसके उम्मीदवार या तो नोटा से पीछे रहे या उन्हें उससे बस कुछ ही अधिक वोट मिले।

बागी गुट के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ने उन 20 सांसदों के हस्ताक्षर की पुष्टि की जिन्होंने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। बंद्योपाध्याय ने पत्रकारों से कहा, ”हमने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी आॅफ इंडिया के साथ विलय कर लिया है।” ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले धड़े के दावों के बारे में पूछे जाने पर बंदोपाध्याय ने कहा कि ”असली तृणमूल कांग्रेस” कौन है, इसका फैसला अदालतें करेंगी।

बंदोपाध्याय ने कहा, ”अदालत बाद में फैसला करेगी कि असली तृणमूल कांग्रेस कौन है। हमने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर उन्हें अपना अनुरोध सौंपा है। अगले लोकसभा सत्र में हमारे बैठने की अलग व्यवस्था होगी।” उन्होंने यह भी कहा कि वह तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर भी दावा करेंगे।

बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मिलने से पहले केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से उनके घर पर मुलाकात की। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब तृणमूल कांग्रेस नेता कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने भी रविवार को अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस लोकसभा संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी द्वारा लिखा गया एक पत्र लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा, जिसमें उनसे किसी भी कथित अलग गुट को मान्यता न देने का आग्रह किया गया है। इस पत्र में तर्क दिया गया है कि संविधान किसी मौजूदा राजनीतिक दल के भीतर एक अलग समूह बनाने की अनुमति नहीं देता है।

दस जून की तारीख वाले इस पत्र को पहले ईमेल के जरिए भी भेजा गया था, जिसमें कहा गया है कि दलबदल विरोधी कानून इस तरह के विभाजन की इजाजत नहीं देता। पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अपने पत्र में अनुरोध किया है कि आॅल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) को एक ही राजनीतिक पार्टी माना जाए जिसका प्रतिनिधित्व सदन में केवल उसके अधिकृत नेता और मुख्य सचेतक द्वारा किया जाए। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि बागी सांसदों की ओर से किसी भी तरह के पत्राचार या अनुरोध पर कोई फैसला करने से पहले पार्टी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए।

महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए बनर्जी ने तर्क दिया कि 10वीं अनुसूची के तहत अब ”विभाजन” का बचाव उपलब्ध नहीं है और वर्तमान कानूनी ढांचा किसी एक राजनीतिक दल की पहचान को मान्यता देता है न कि उसके भीतर मौजूद विरोधी गुटों को अलग अलग मान्यता देता है।

उन्होंने कहा, ”अगर उपर्युक्त प्रकार का कोई भी पत्राचार या संचार प्राप्त होता है, तो उस पर कोई निर्णय लेने से पहले एआईटीसी को अपना पक्ष रखने और सुने जाने का अवसर प्रदान किया जाए।” बनर्जी ने यह भी कहा कि विलय के किसी भी दावे के लिए राजनीतिक पार्टी का विलय और दो-तिहाई विधायकों का समर्थन, दोनों जरूरी हैं और कानून के तहत इनमें से सिर्फ एक शर्त पूरी करना काफी नहीं होगा।

लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद आजाद ने कहा कि उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने यह साफ कर दिया है कि एक राजनीतिक पार्टी में विभाजन मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा, “हम इसी सिलसिले में एक पत्र सौंपने और लोकसभा अध्यक्ष से संवैधानिक ढांचे एवं कानूनी नियमों के तहत काम करने का आग्रह करने के लिए यहां आए थे।” बागी सांसदों के ”विलय” पर तृणमूल कांग्रेस विधायक मदन मित्रा ने कहा कि इससे उनकी बेईमानी का पता चलता है।

कोलकाता में उन्होंने कहा, ”सभी सांसदों ने तृणमूल कांग्रेस नेता के तौर पर चुनाव लड़ा था, दूसरी पार्टी में विलय करना उनकी ‘बेईमानी’ को दिखाता है… इतनी छोटी संख्या के आधार पर अलग पार्टी नहीं बनाई जा सकती। अभी लंबी प्रक्रिया बाकी है। देखते हैं आगे क्या होता है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी आगे की कानूनी कार्रवाई पर फैसला करेंगी।”

घोष ??ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस ”अविभाज्य” है और संविधान लोकसभा में किसी पार्टी के भीतर अलग गुट बनाने की इजाजत नहीं देता है।
उन्होंने कहा, ”यह संविधान के खिलाफ है। हमने पत्र दिया है कि जो लोग तृणमूल कांग्रेस को तोड़कर लोकसभा में अलग गुट बनाना चाहते हैं… संविधान इसकी इजाजत नहीं देता और यह कानून के खिलाफ है।”

बागी सांसदों पर उन्होंने कहा, ”यह आपकी नैतिक कमजोरी को दिखाता है कि जब पार्टी की हार हुई तो उस पार्टी, उस नेता और उस चुनाव चिह्न को छोड़ दिया जिसके दम पर आप जीते थे।” तृणमूल के वरिष्ठ नेता एवं सांसद सौगत रॉय ने बागी नेताओं के ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी आॅफ इंडिया’ (एनसीपीआई) में विलय के फैसले का मजाक उड़ाया। रॉय ने इस विलय की राजनीतिक अहमियत और मतदाताओं के सामने इस कदम को सही ठहराने की बागियों की क्षमता पर सवाल उठाए।

रॉय ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”जिस पार्टी के चुनाव चिह्न पर आप चुने गए, उससे गद्दारी करने के बाद आप अपने मतदाताओं का सामना कैसे करेंगे? यह विलय बेतुका है। एनसीपीआई को कौन जानता है? क्या वे अपने चुनाव क्षेत्रों में जाकर लोगों को बता सकते हैं कि वे अब एनसीपीआई का हिस्सा हैं? यह विलय उन गद्दारों की हताशा को दिखाता है जो अपने भाजपा के आकाओं को खुश करना चाहते हैं।” भाजपा ने हालांकि कहा कि बड़ी संख्या में लोगों का पार्टी छोड़ना सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर बढ़ती निराशा को दिखाता है।

भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के प्रवक्ता सायनतन बसु ने कहा कि यह घटनाक्रम तृणमूल कांग्रेस का अंदरूनी मामला है और पार्टी नेतृत्व को दूसरों पर दोष मढ़ने के बजाय आत्म-मंथन करना चाहिए। उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”अगर वे एनसीपीआई में शामिल होते हैं और राजग तथा सरकारी विधेयकों का समर्थन करते हैं, तो यह देश के लिए अच्छा है। असल बात यह है कि कोई भी तृणमूल कांग्रेस में नहीं रहना चाहता। इसके नेतृत्व को दूसरों पर दोष मढ़ने के बजाय गंभीरता से आत्म-मंथन करना चाहिए।”

बागी गुट का कहना है कि उसे पार्टी के अधिकतर सांसदों और विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इस बीच, नयी दिल्ली रवाना होने से पहले बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कोलकाता हवाई अड्डे पर पत्रकारों से कहा कि जल्द दो और लोकसभा सदस्य इस गुट में शामिल हो सकते हैं जिससे सदन में उनकी संख्या 22 हो जाएगी।

तृणमूल कांग्रेस पर नियंत्रण की लड़ाई संसद और पश्चिम बंगाल विधानसभा दोनों जगहों पर साथ साथ चल रही है। पिछले हफ्ते पार्टी के 80 में से 64 विधायक अलग हो गए और विधानसभा अध्यक्ष रंिथद्र बोस से एक अलग विधायक दल समूह के तौर पर मान्यता हासिल कर ली; साथ ही रीताब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता माना गया। ममता बनर्जी के गुट ने इस फैसले को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी है।

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