न्यायालय ने EWS के लिए 10% आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं से मुद्दे तय किए

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Thu, 08 Sep 2022 06:20 PM
न्यायालय ने EWS के लिए 10% आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं से मुद्दे तय किए
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लोगों को प्रवेश तथा नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण देने के केन्द्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं से तीन व्यापक मुद्दे तय किए हैं, जिन पर न्यायालय निर्णय लेगा.
न्यायालय यह भी तय करेगा कि क्या संविधान (103वां संशोधन) अधिनियम के जरिये राज्यों को इस प्रकार के विशेष प्रावधान करने की अनुमति देकर संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत का उल्लंघन किया गया है अथवा नहीं.

प्रधान न्यायाधीश उदय उमेश ललित की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने जिन तीन मुद्दों को निर्णय के लिए सामने रखा है, उनमें आरक्षण देने संबंधी निर्णय की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़े सभी पहलु ‘‘व्यापक तौर पर’’ समाहित हो गए हैं.

पहले मुद्दे के मसौदे में कहा गया है, ‘‘क्या 103वें संविधान संशोधन अधिनियम को संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन माना जा सकता है, जो सरकार को आर्थिक आधार पर आरक्षण जैसे विशेष प्रावधान करने की मंजूरी देता है.’’ दूसरा कानूनी प्रश्न यह है कि क्या यह कहा जा सकता है कि संविधान संशोधन ने राज्यों को निजी गैर-वित्तपोषित संस्थानों में दाखिले के संबंध में विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देकर मूल संरचना का उल्लंघन किया है.

पीठ ने कहा कि तीसरा मुद्दा यह है कि ‘‘क्या 103वें संविधान संशोधन ने एसईबीसी, ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग को ईडब्ल्यूएस आरक्षण’’ के दायरे से बाहर रख कर संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन किया गया है. पीठ में न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट, न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला भी शामिल हैं. पीठ ने कई वकीलों द्वारा तैयार किए गए मुद्दों पर गौर किया और इसके बाद वेणुगोपाल की ओर से तैयार किए गए तीन प्रश्नों को महत्वपूर्ण प्रश्न मानने का निर्णय लिया. अब इन मुद्दों पर पीठ कोई फैसला सुनाएगी. मामले पर सुनवाई 13 सितंबर को होगी.

प्रधान न्यायाधीश ने हस्तक्षेप करने वालों जिनमें मध्य प्रदेश, असम और महाराष्ट्र जैसे राज्य शामिल हैं से मामले में लिखित में अभ्यावेदन देने को कहा और उन्हें आश्वस्त किया कि उन्हें भी जिरह का मौका दिया जाएगा. पीठ ने छह सितंबर को यह स्पष्ट कर दिया था कि वह 40 याचिकाओं से मुद्दों के निर्धारण करने के बाद तथा सुचारु सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए निर्देश देने के उपरांत 13सितंबर से सुनवाई शुरू करेगी. पीठ को बताया गया था कि पक्षकारों के वकीलों को दलील रखने में करीब 18 घंटे का समय लगेगा.

अधिकतर याचिकाओं में 103वें संविधान संशोधन अधिनियम 2019 की वैधता को चुनौती दी गई है. इसमें मुख्य याचिका भी शामिल है, जो 2019 में ‘जनहित अभियान’ ने दाखिल की थी. केन्द्र सरकार की ओर से पैरवी अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल तथा सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कर रहे हैं. केन्द्र की ओर से याचिका दाखिल करके विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित ईडब्ल्यूएस आरक्षण कानून को चुनौती देने वाली याचिकाएं शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया गया था ताकि वह इस मामले पर कोई निर्णय दे सके.

इससे पहले केन्द्र सरकार ने न्यायालय से कहा था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने वाला उसका कानून ‘‘ सामाजिक समानता’’ को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है. जिसके तहत उन लोगों को उच्च शिक्षा और रोजगार में ‘‘समान अवसर’’मुहैया कराए गए हैं जो अपनी आर्थिक स्थिति के चलते पिछड़ गए हैं.

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