
तिरुवनंतपुरम/बेंगलुरु. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व प्रमुख जी. माधवन नायर ने बृहस्पतिवार को यहां कहा कि चंद्रयान-3 की सफलता से भारत की तकनीकी क्षमता और प्रक्षेपण प्रणालियों को स्वीकृति मिलेगी, जिसके चलते देश के अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक अनुबंधों को और बढ़ावा मिलेगा. नायर ने कहा कि चंद्रयान-3 की सफलता ग्रहों पर अन्वेषण शुरू की दिशा में भारत का पहला कदम है.
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “हमने वास्तव में बड़ी सफलता हासिल करते हुए एक अच्छी शुरुआत की है.” इसरो के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि देश के पास पहले से ही यूरोप और अमेरिका के साथ कई वाणिज्यिक अनुबंध हैं, और अब 23 अगस्त को तीसरे चंद्र मिशन की सफलता के साथ ये बढ़ेंगे.
नायर ने कहा, “निश्चित रूप से दुनिया के लोग हमारी तकनीकी क्षमता, हमारी प्रक्षेपण प्रणाली और अंतरिक्ष यान आदि की गुणवत्ता को स्वीकार करेंगे. अंतरराष्ट्रीय सहयोग भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के एजेंडे में रहा है और आने वाले दिनों में इसे मजबूत किया जाएगा.” इसरो के अनुसार, चंद्रयान-3 की कुल लागत केवल 615 करोड़ रुपये है जो देश में किसी बॉलीवुड फिल्म के निर्माण के बजट के लगभग बराबर है.
अंतरिक्ष अभियान में बड़ी छलांग लगाते हुए भारत का चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-3’ बुधवार शाम 6.04 बजे चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरा, जिससे देश चांद के इस क्षेत्र में उतरने वाला दुनिया का पहला तथा चंद्र सतह पर सफल ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है. नायर ने कहा कि अंतरिक्ष एजेंसी के वैज्ञानिकों की पगार विकसित देशों के वैज्ञानिकों के वेतन का पांचवां हिस्सा है और शायद यही कारण है कि वे अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए किफायती तरीके तलाश सके.
नायर ने अन्य देशों की तुलना में बेहद कम कीमत वाले साधनों के जरिए अंतरिक्ष में खोज के भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी के इतिहास के बारे में कहा, ”इसरो में वैज्ञानिकों, तकनीशियनों और अन्य र्किमयों को जो वेतन भत्ते मिलते हैं वे दुनिया भर में इस वर्ग के लोगों को मिलने वाले वेतन भत्तों का पांचवां हिस्सा हैं. इसका एक लाभ भी है.” उन्होंने कहा कि इसरो के वैज्ञानिकों में कोई भी लखपति नहीं है और वे बेहद सामान्य जीवन जीते हैं.
नायर ने कहा, ”हकीकत यह है कि वे धन की कोई परवाह भी नहीं करते, उनमें अपने मिशन को लेकर जुनून और प्रतिबद्धता होती है. इस तरह हम ऊंचा मुकाम हासिल करते हैं.” उन्होंने कहा कि इसरो के वैज्ञानिक बेहतरीन योजना बनाकर और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के जरिए ये उपलब्धि हासिल कर सके.
इसरो के पूर्व प्रमुख के अनुसार, ”हम एक-एक कदम से सीखते हैं. जो हमने अतीत में सीखा है, हम अगले मिशन में उसका इस्तेमाल करते हैं. हमने करीब 30 वर्ष पहले ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान के लिए जो इंजन बनाया था उसी का इस्तेमाल भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान में भी किया जाता है.” उन्होंने कहा कि भारत अपने अंतरिक्ष अभियानों के लिए घरेलू तकनीक का उपयोग करता है और इससे लागत को काफी कम करने में मदद मिली है. नायर ने कहा कि भारत के अंतरिक्ष मिशन की लागत अन्य देशों के अंतरिक्ष अभियानों की तुलना में 50 से 60 प्रतिशत कम है.
चंद्रयान-3 की सफलता से चंद्रमा को आधार बिंदू के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ी: कस्तूरीरंगन
वरिष्ठ अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन ने बृहस्पतिवार को कहा कि चंद्रयान-3 मिशन की सफलता ने भविष्य के ग्रहीय मिशनों के लिए चंद्रमा को आधार बिंदू के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावना को बढ़ा दिया है. उन्होंने कहा कि इस सफलता ने इस तरह के भविष्य के अन्वेषणों में भाग लेने के लिए भारत की साख को मजबूत किया है.
कस्तूरीरंगन ने कहा कि चंद्रयान-3 को सफलतापूर्वक चंद्रमा पर उतारने, अन्वेषण की क्षमता, पूरी प्रक्रिया की समझ और इससे जुड़ी सभी चीजों ने इसरो को “संपूर्ण क्षमता” प्रदान की है. उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में भविष्य के ग्रहों के अन्वेषण मानव जाति की गतिविधियों पर हावी होने जा रहे हैं.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष कस्तूरीरंगन ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि नवीनतम चंद्र मिशन “पिछले 50 वर्षों में इसरो की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है क्योंकि पहली बार आपने पृथ्वी के बाहर किसी वस्तु को सौर मंडल के किसी अन्य पिंड में उतारने की इसरो के अंतरिक्ष कार्यक्रम की क्षमता का व्यापक प्रदर्शन किया है.”
कस्तूरीरंगन ने कहा, “मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही अनोखी क्षमता है.” उन्होंने कहा, “दक्षिणी ध्रुव की खोज करना इस तथ्य के कारण बहुत महत्वपूर्ण है कि यहां सूरज की रोशनी ज्यादा नहीं आती, और चूंकि चंद्रमा ने दो अरब वर्षों के बाद विकसित होना बंद कर दिया, इसलिए दक्षिणी ध्रुव एक प्राचीन क्षेत्र है.” उन्होंने कहा, “इस बात की काफी संभावना है कि अगर वहां जल बड़ी मात्रा में उपलब्ध है तो चंद्रमा भविष्य के मिशनों में उपयोग के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण मंच बन सकता है.”
उन्होंने कहा कि भारत अब आर्टेमिस समझौते का सदस्य है और हम इस अवसर का उपयोग एक क्लब का सदस्य बनने के लिए करेंगे जो सौर मंडल में अन्य वस्तुओं की खोज के लिए चंद्रमा को आधार बिंदू के रूप में उपयोग करने का प्रयास करेगा. उन्होंने कहा, “लिहाजा, यह भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि हम उस स्थान पर पहुंचे हैं जहां जलीय व रासायनिक, भौतिक व पर्यावरणीय गुण होने की बहुत अधिक संभावना है. इन गुणों को आज की तुलना में बहुत बेहतर ढंग से समझने की जरूरत है.”



