
नयी दिल्ली. भारतीय वायुसेना के वीर अधिकारी एवं 1965 के भारत-पाक युद्ध के नायक एअर मार्शल डेंजिल कीलर को शायद रणक्षेत्र में दुश्मन के सेबर जेट को मार गिराने के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाएगा. उनके परिवार के करीबी लोगों ने बताया कि 1965 के युद्ध में अपनी वीरता के लिए वीर चक्र प्राप्त करने वाले 90 वर्षीय कीलर का बुधवार को हरियाणा के गुरुग्राम में निधन हो गया.
डेंजिल कीलर का जन्म दिसंबर 1933 में लखनऊ में हुआ था. वह और ट्रेवर कीलर लड़ाकू पायलट बंधुओं के रूप में जाने जाते थे तथा उन्हें महान दर्जा प्राप्त हुआ. ट्रेवर कीलर को स्वतंत्र भारत में हवा में लक्ष्य को मार गिराने का सबसे पहला युद्धक पायलट होने का गौरव प्राप्त हुआ. 1965 के युद्ध में उन्होंने एक सेबर जेट को भी मार गिराया था. डेंजिल कीलर ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में भी हिस्सा लिया था, जिस युद्ध के कारण बांग्लादेश का निर्माण हुआ.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ”उन्होंने 1965 के युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना के एक सेबर विमान को मार गिराया था. वह और उनके भाई भारतीय वायुसेना के नायक हैं.” वीरता पुरस्कारों की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित विवरण के अनुसार, मई 1954 में भारतीय वायुसेना में शामिल हुए डेंजिल कीलर ने 1978 में विमान संबंधी दो आपात स्थितियों के दौरान (ग्रुप कैप्टन के रूप में) अपने साहस के लिए कीर्ति चक्र भी प्राप्त किया. कीर्ति चक्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है.
उनके कीर्ति चक्र उद्धरण में लिखा है, ”ग्रुप कैप्टन डेंजिल कीलर वीआरसी (4805) एफ (पी) को अगस्त 1975 में एक प्रतिष्ठित इकाई में तैनात किया गया था जो रणनीति विकसित करती है और युद्ध प्रशिक्षण प्रदान करती है. इसमें कहा गया है कि मार्च 1978 में जब ग्रुप कैप्टन कीलर उच्च ऊंचाई पर टाइप 77 विमान उड़ा रहे थे, तो इसकी ‘कैनोपी’ उड़ गई और उन्हें अत्यंत प्रतिकूल स्थिति तथा गंभीर ‘वायु विस्फोट’ का सामना करना पड़ा. इस घटना में उनकी आंखों, कान के परदे और बाएं हाथ पर चोट लग गई, जिससे उनके लिए विमान को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया.
उद्धरण में कहा गया है, ”हालांकि उस स्तर पर विमान को छोड़ना पूरी तरह से उचित था, फिर भी उन्होंने विमान पर पुन? नियंत्रण प्राप्त करने के लिए अपने कौशल और अनुभव का भरपूर उपयोग किया. अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में… ग्रुप कैप्टन कीलर विमान को वापस बेस पर ले आए और इसे आपात स्थिति में सुरक्षित उतारने में सफल रहे.” अपने उड़ान कौशल, दृढ़ संकल्प, सूझबूझ और साहस से, व्यक्तिगत जोखिम उठाते हुए, वह एक मूल्यवान विमान को बचाने में सक्षम रहे.
प्रशस्ति उद्धरण के अनुसार, एक बार फिर मई 1978 में, सीधी उड़ान के दौरान 23 मिमी का गोला फटने से निकले छर्रे से विमान को नुकसान पहुंचा, लेकिन इसके बावजूद वह बेहद मुश्किल परिस्थितियों में विमान को सुरक्षित उतारने में सफल रहे. इसमें कहा गया है कि इन दो गंभीर आपात स्थितियों में उनके उत्कृष्ट और कुशल संचालन ने दो मूल्यवान विमानों को बचा लिया. उद्धरण में कहा गया है, ”ग्रुप कैप्टन डेंजिल कीलर ने अपनी जान जोखिम में डालकर विमान को सुरक्षित करने में अदम्य साहस, अनुकरणीय पेशेवर कौशल और कर्तव्य के प्रति समर्पण का प्रदर्शन किया.”



