
नयी दिल्ली. भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने 1970 के दशक में एक न्यायाधीश की नियुक्ति का हवाला देते हुए नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया और कटाक्ष करते हुए कहा कि यह कांग्रेस के ‘संविधान बचाओ’ की मजेदार कहानी है. कांग्रेस ने उन पर पलटवार करते हुए गुमानमल लोढ़ा एवं रंजन गोगोई का उदाहरण दिया और दावा किया कि न्याय प्रक्रिया, न्यायालयों और न्यायाधीशों का जितना बेशर्मी भरा राजनीतिक इस्तेमाल आरएसएस, जनसंघ और भाजपा ने किया है वह इतिहास के पन्नों में दर्ज है.
हाल में प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के खिलाफ विवादित बयान देने वाले दुबे ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”कांग्रेस के संविधान बचाओ की एक मजेदार कहानी. असम में बहरुल इस्लाम साहिब ने कांग्रेस की सदस्यता 1951 में ली. तुष्टिकरण के नाम पर कांग्रेस ने उन्हें 1962 में राज्यसभा का सदस्य बना दिया और छह साल बाद दोबारा 1968 में राज्यसभा का सदस्य सेवाभाव के लिए बनाया.” उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने बहरुल इस्लाम को 1972 में राज्यसभा से इस्तीफा दिलाए बिना उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बना दिया तथा फिर 1979 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाया.
दुबे ने कहा, ”बेचारे 1980 में सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन यह तो कांग्रेस है, उसने उन्हें दिसंबर 1980 में सीधे उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बना दिया. 1977 में इंदिरा गांधी जी के उपर लगे सभी भ्रष्टाचार के मुकदमे इन्होंने तन्मयता से खत्म कर दिए. फिर खुश होकर कांग्रेस ने इन्हें 1983 में उच्चतम न्यायालय से सेवानिवृत्त कर राज्यसभा का तिबारा सदस्य 1983 में बना दिया.” उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, ”मैं कुछ नहीं बोलूंगा?” इस पर पलटवार करते हुए कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”न्याय प्रक्रिया, न्यायालयों और न्यायाधीशों का जितना बेशर्मी भरा राजनीतिक इस्तेमाल आरएसएस, जनसंघ और भाजपा ने किया है वह इतिहास के पन्नों में दर्ज है.”
उन्होंने कहा, ”निशिकांत दुबे ने गुमानमल लोढ़ा का नाम शायद नहीं सुना होगा. सुना होगा तो भी नहीं बोलेंगे. यह वह व्यक्ति थे जो 1969 से 1971 तक जनसंघ राजस्थान के अध्यक्ष रहे. 1972 से 1977 तक राजस्थान विधानसभा के सदस्य और कई कमेटियों के प्रमुख रहे. फिर जनता पार्टी की सरकार में जनसंघ की कृपा से 1978 में राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बन गए.” खेड़ा के अनुसार, वर्ष 1988 में गुमानमल गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बना दिए गए तथा जब वहां से निकले तो भाजपा के टिकट पर सांसद रहे.
उन्होंने कहा, ”एक दूसरा प्रकरण तो और भी गंभीर है जिसमें उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के पद से इस्तीफा दिलवाकर उन्हें राष्ट्रपति का चुनाव लड़वा दिया गया. यह प्रकरण आजाद भारत न्यायाधीशों के राजनीतिक इस्तेमाल का सबसे बड़ा और शर्मनाक उदाहरण है.” खेड़ा ने दावा किया कि के. सुब्बाराव 30 जून 1966 को भारत के 9वें प्रधान न्यायाधीश बने थे, लेकिन ”जनसंघियों के दबाव” में उन्होंने कुछ महीने बाद ही 11 अप्रैल 1967 को इस्तीफा दे दिया क्योंकि जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना चाहता था.
उन्होंने कहा, ”सुब्बाराव ने 11 अप्रैल 1967 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद से इस्तीफा दे दिया और चुनावी मैदान में उतर गए. हालांकि वह राष्ट्रपति चुनाव हार गए और जनसंघ के मंसूबे पूरे नहीं हो पाए. जाकिर हुसैन जी ने उन्हें भारी मतों से पराजित किया.” कांग्रेस नेता ने कहा, ”बात यही नहीं रूकती रंजन गोगोई तक जाती है. आजकल एक नफरती संघी का वीडियो भी बहुत वायरल है कि कैसे उन्होंने अपने दामाद को बचाने के लिए राममंदिर का निर्णय सुना दिया.”



