पूर्व न्यायाधीशों ने रोहिंग्याओं पर की गई टिप्पणी के लिए प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ ‘अभियान’ की निंदा की

नयी दिल्ली. पूर्व न्यायाधीशों के एक समूह ने रोहिंग्या प्रवासियों से संबंधित सुनवाई के दौरान भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की हाल की टिप्पणियों के मद्देनजर उन्हें निशाना बनाकर चलाई जा रही एक ‘‘सोची-समझी मुहिम’’ की बुधवार को कड़ी आलोचना की.

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के 44 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने कहा कि न्यायपालिका को बदनाम करने या प्रधान न्यायाधीश पर राजनीतिक मंशा थोपने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे संवैधानिक संस्थानों में जनता का विश्वास और न्यायालय की स्वतंत्रता कमजोर हो रही है.

पूर्व न्यायाधीशों ने ‘उच्चतम न्यायालय का अनादर अस्वीकार्य है’ शीर्षक वाले एक बयान में कहा, ‘‘न्यायिक कार्यवाही केवल निष्पक्ष और तर्कसंगत आलोचना के अधीन होनी चाहिए.’’ इसमें कहा गया, ‘‘हालांकि, हम जो देख रहे हैं वह सैद्धांतिक असहमति नहीं है, बल्कि एक सामान्य अदालती कार्यवाही को पूर्वाग्रह का कृत्य बताकर न्यायपालिका को बदनाम करने का प्रयास है.’’ पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि प्रधान न्यायाधीश पर सबसे बुनियादी कानूनी सवाल पूछने के लिए निशाना साधा जा रहा है.

पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि आलोचकों ने पीठ की टिप्पणियों के एक महत्वपूर्ण हिस्से को भी नजरअंदाज कर दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि भारतीय धरती पर किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी नागरिक, यातना, गुमशुदगी या अमानवीय व्यवहार का शिकार नहीं बनाया जा सकता है.

दो दिसंबर को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने मानवाधिकार कार्यकर्ता रीता मनचंदा द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर तीखी टिप्पणी की थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि कुछ रोहिंग्या हिरासत से लापता हो गए हैं. प्रधान न्यायाधीश ने पूछा, ‘‘यदि कोई घुसपैठिया आता है, तो क्या हम उसका लाल कालीन बिछाकर स्वागत करते हैं और कहते हैं कि हम उसे सभी सुविधाएं देना चाहते हैं? उन्हें वापस भेजने में क्या समस्या है?’’

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