धर्मांतरण विरोधी कानून के पक्ष में हैं गिरिराज सिंह, हिंदुओं के लिए चाहते हैं ‘वैश्विक अल्पसंख्यक’ का दर्जा

मुजफ्फरपुर-पटना. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने धर्मांतरण विरोधी कानून की जरूरत पर बल देते हुए शुक्रवार को कहा कि इसे पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए. भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्य में ऐसे किसी कानून की आवश्यकता से इंकार किए जाने के कुछ ही दिनों बाद यह बयान दिया है.

मुजफ्फरपुर में पत्रकारों द्वारा धर्मांतरण विरोधी कानून की आवश्यकता के बारे में पूछे जाने पर गिरिराज ने कहा, ‘‘देश भर में धर्मांतरण के खिलाफ एक कानून होना चाहिए.’’ जबरन धर्म परिवर्तन के सवाल पर बुधवार को नीतीश ने कहा था कि बिहार में सरकार पूरी तरह सचेत है और यहां इस तरह का कोई विवाद नहीं है.

उन्होंने कहा था, ‘‘बिहार में बहुत शांति है. चाहे कोई किसी भी धर्म को मानता तो, किसी को कोई समस्या नहीं है. यहां इस तरह का आपस में कोई विवाद नहीं है. बिहार में दंगा जैसी कोई घटना नहीं होती है.’’ लोकसभा में बेगूसराय का प्रतिनिधित्व करने वाले केंद्रीय मंत्री गिरिराज भाजपा के सत्ता में आने से पहले 2014 में उनके खिलाफ दर्ज एक मामले को लेकर मुजफ्फरपुर में थे. गौरतलब है कि भाजपा द्वारा आहूत भारत बंद के दौरान गिरिराज सहित कई अन्य भाजपा नेताओं के खिलाफ रेल यातायात को अवरुद्ध करने को लेकर उक्त मामला दर्ज किया गया था.

गिरिराज ने रेलवे अदालत से एमपी-एमएलए अदालत में स्थानांतरित किए गए उक्त मामले को ‘‘झूठा’’ बताते हुए कहा,‘‘मैं यहां अपना बयान दर्ज कराने आया हूं.’’ मामले में नामित कुल 23 भाजपा नेता न्यायाधीश विकास मिश्रा की अदालत में पेश हुए. भाजपा के राज्यसभा सदस्य और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के विचारक राकेश सिन्हा से पटना में धर्मांतरण के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोगों पर आर्थिक और मानसिक रूप से दबाव डाला जाता है कि वे अपना विश्वास त्याग दें और दूसरे धर्म को अपना लें. यह धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीत सरकार को इसे आगे नहीं बढ़ने देना चाहिए और धर्मांतरण विरोधी कानून लाना चाहिए.’’ सिन्हा ने यह भी कहा कि हिंदुओं को संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘‘वैश्विक अल्पसंख्यक’’ घोषित किया जाना चाहिए क्योंकि यह समुदाय भारत और नेपाल को छोड़कर कहीं भी बहुमत में नहीं है. उन्होंने इस साल की शुरुआत में पारित इस्लामोफोबिया दिवस पर प्रस्ताव, जिसका भारत ने विरोध किया था, का हवाला देते हुए कहा, ‘‘यदि संयुक्त राष्ट्र ऐसा करने के लिए सहमत नहीं है तो यह माना जाएगा कि अंतरराष्ट्रीय निकाय के दोहरे मानदंड हैं.’’ भाषा सं अनवर अर्पणा

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