न्यायानय ने 14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 28 सप्ताह का गर्भ समाप्त कराने की अनुमति दी

Author: Nandkishoryadav
UPDATED: Sat, 18 Jul 2026 02:51 PM
न्यायानय ने 14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 28 सप्ताह का गर्भ समाप्त कराने की अनुमति दी
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कोच्चि: केरल उच्च न्यायालय ने 14 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की मदद करते हुए उसे 28 सप्ताह के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त कराने की अनुमति दे दी है। न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने कहा कि हालांकि मेडिकल बोर्ड ने अपनी राय में बताया था कि यदि गर्भ की अवधि लगभग 34 सप्ताह के करीब होती है तो भ्रूण से जुड़ी जटिलताओं की संभावना कम हो सकती है, लेकिन दुष्कर्म पीड़िता के मामले में गर्भावस्था से होने वाली मानसिक पीड़ा और आघात को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

मेडिकल बोर्ड ने अदालत को बताया था कि गर्भ की अवधि लगभग 28 सप्ताह होने के कारण बच्चे का अनुमानित वजन करीब 1 किलोग्राम हो सकता है और उसके जीवित रहने की संभावना लगभग 80 प्रतिशत है। बोर्ड ने यह भी कहा था कि प्रसव के बाद बच्चे को समय से पहले जन्म से जुड़ी कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जिनमें आंखों की बीमारी, आंतों से जुड़ी गंभीर समस्या, मस्तिष्क में रक्तस्राव, सांस लेने में परेशानी जैसी जटिलताएं शामिल हैं।

मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि ये समस्याएं तब कम होती हैं जब गर्भ की अवधि करीब 34 सप्ताह हो जाती है। बोर्ड ने रक्त संबंध (एक ही गोत्र का होने) के कारण कुछ अतिरिक्त जटिलताओं की आशंका भी जताई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने कहा कि पीड़िता की उम्र 14 वर्ष है और वह इस गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती है, इसलिए गर्भ समाप्त करने की याचिका को मंजूरी दी जानी चाहिए।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पीड़िता और उसके पिता द्वारा प्रक्रिया के लिए सहमति का लिखित आश्वासन दिए जाने के बाद तुरंत गर्भ समाप्त करने की व्यवस्था की जाए।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि चिकित्सकीय प्रक्रिया के बाद बच्चा जीवित रहता है, तो राज्य सरकार उसे आवश्यक नवजात शिशु देखभाल उपलब्ध कराए। यदि पीड़िता बच्चे को अपने साथ नहीं रखना चाहती है, तो उसे किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार किसी बाल देखभाल संस्था या मान्यता प्राप्त गोद लेने वाली एजेंसी को सौंपा जा सकता है।

अदालत ने कहा कि यदि प्रक्रिया के दौरान शिशु की मृत्यु हो जाती है, तो सरकार यह सुनिश्चित करे कि भ्रूण के ऊतक और रक्त के नमूने सुरक्षित रखे जाएं, ताकि आवश्यक चिकित्सकीय जांच, जिसमें डीएनए ंिफगरंिप्रंिटग और मैंिपग शामिल है, की जा सके क्योंकि यौन उत्पीड़न के संबंध में प्राथमिकी दर्ज है। ये निर्देश पीड़िता के पिता द्वारा दायर याचिका पर जारी किये गए।

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