
नयी दिल्ली. दिल्ली उच्च न्यायालय ने रोहिंग्या शरणार्थियों के बच्चों को स्थानीय स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए निर्देश देने के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई करने से मंगलवार को इनकार कर दिया और कहा कि यह केंद्र का अधिकार क्षेत्र है. मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा कि यह मामला सुरक्षा और राष्ट्रीयता पर प्रभाव डालने वाले ”अंतरराष्ट्रीय मुद्दों” से संबंधित है, इसलिए याचिकाकर्ता को केंद्रीय गृह मंत्रालय के समक्ष एक अभ्यावेदन देना चाहिए.
याचिकाकर्ता एनजीओ ‘सोशल ज्यूरिस्ट’ ने कहा कि दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) आधार कार्ड के अभाव में म्यांमा के इन बच्चों को अपने स्कूलों में दाखिला नहीं दे रहे हैं. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर अधिकारी यथाशीघ्र निर्णय लेंगे. पीठ ने कहा, ”गृह मंत्रालय को इस पर निर्णय लेने दें. इसमें कई मुद्दे शामिल हैं. हम इस पर सुनवाई नहीं कर सकते. इस मामले को गृह मंत्रालय के समक्ष जाने दें.” न्यायालय ने कहा कि रोहिंग्या विदेशी हैं, जिन्हें आधिकारिक और कानूनी रूप से भारत में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई है.
दिल्ली उच्च न्यायालय का लिट्टे पर पाबंदी संबंधी यूएपीए न्यायाधिकरण की कार्यवाही में दखल से इनकार
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अमेरिका में रहने वाले एक श्रीलंकाई व्यक्ति की वह याचिका खारिज कर दी जिसमें लिबरेशनल टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) को गैरकानूनी घोषित करने से जुड़े मामले में उसका पक्ष सुनने का अनुरोध किया गया था. न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और न्यायमूर्ति अमित शर्मा की पीठ ने श्रीलंकाई व्यक्ति विसुवनथान रूद्रकुमारन की अर्जी खारिज कर दी. रूद्रकुमारन ने अवैध गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) न्यायाधिकरण के 11 सितंबर के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है. न्यायाधिकरण ने लिट्टे से संबंधित कार्यवाही में उसे पक्षकार बनाने की अर्जी खारिज कर दी थी. उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी कि न्यायाधिकरण के आदेश में दखल की जरूरत नहीं है तथा देश की सुरक्षा एवं अखंडता से जुड़े मामलों की न्यायिक समीक्षा में काफी सावधानी बरतने की जरूरत है.
पीठ ने कहा, ” याचिकाकर्ता का दावा है कि वह तमिल ईलम की एक अंतरराष्ट्रीय सरकार का प्रधानमंत्री है और ऐसे व्यक्ति को यूएपीए के तहत इन कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करने की अनुमति देने का प्रभाव, वह भी तब, जब वह लिट्टे का सदस्य या लिट्टे का पदाधिकारी नहीं है, दूरगामी है, क्योंकि याचिकाकर्ता के रुख का नीतिगत मुद्दों और अन्य देशों के साथ संबंधों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, जिसका आकलन न्यायाधिकरण या इस अदालत द्वारा नहीं किया जा सकता.”
रूद्रकुमारन ने दावा किया कि लिट्टे के खत्म होने के बाद, उसके समर्थकों ने महसूस किया कि श्रीलंका में तमिलों के मुद्दे को शांतिपूर्ण तरीके से जारी रखा जाना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप टीजीटीई का गठन किया गया और उसमें लिट्टे के विभिन्न समर्थकों का एक सलाहकार बोर्ड शामिल है. हालांकि, उच्च न्यायालय ने कहा कि तमिलनाडु और भारत से बाहर स्थित लिट्टे के अन्य समर्थकों की सुनवाई पहले से ही न्यायाधिकरण द्वारा की जा रही है, जो यह दर्शाता है कि न्यायाधिकरण द्वारा निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का पालन किया जा रहा है.



