भारत ने एलएसी पर बुनियादी ढांचे के निर्माण में देर की, अब तेजी से काम जारी: लेफ्टिनेंट जनरल कालिता

मणिपुर संघर्ष 'राजनीतिक समस्या'; लूटे गए 4,000 हथियार बरामद होने बाकी

गुवाहाटी. थलसेना की पूर्वी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कालिता ने मंगलवार को कहा कि भारत ने चीन से लगी सीमा पर बुनियादी ढांचे के निर्माण में पड़ोसी देश की तुलना में देर से शुरुआत की, लेकिन अब इसपर तेजी से काम किया जा रहा है.
पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ ने यह भी कहा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थिति “सामान्य लेकिन कुछ हद तक अप्रत्याशित” है.

कालिता ने ‘गुवाहाटी प्रेस क्लब के अतिथि’ के रूप में कहा, “उन्होंने (चीन ने) हमसे बहुत पहले बुनियादी ढांचे का निर्माण शुरू कर दिया था. एक राष्ट्र के रूप में हमने बुनियादी ढांचे का निर्माण देर से शुरू किया, लेकिन अब हम इसमें तेजी ला रहे हैं.” उन्होंने कहा कि चीन से लगी सीमा पर बुनियादी ढांचे के निर्माण में जबरदस्त प्रयास किया गया है, चाहे वह लद्दाख हो या सिक्किम या अरुणाचल प्रदेश या उत्तराखंड या हिमाचल.

उन्होंने कहा कि सरकार बुनियादी कनेक्टिविटी के लिए सड़कें और ट्रैक और मोबाइल संचार के लिए हेलीपैड बना रही है. कलिता ने कई विषयों पर खुलकर बात करते हुए कहा, “जीवंत ग्राम कार्यक्रम के तहत, भारत एलएसी के करीब स्थित गांवों में बहुत सारे बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है ताकि शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों.”

भारत और चीन के बीच सीमा क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति के बारे में उन्होंने कहा, “सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में एलएसी के संबंध में स्थिति सामान्य लेकिन कुछ हद तक अप्रत्याशित बनी हुई है. मुद्दों का समाधान होने तक समस्याएं बनी रहेंगी.” उन्होंने कहा कि भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक “बदलाव” आ रहा है और सिविल सोसाइटी की भागीदारी के बिना केवल सशस्त्र बल भविष्य में होने वाला कोई युद्ध नहीं जीत सकते.

कालिता ने कहा कि “बदलाव” ने भारतीय थलसेना को प्रभावित किया है, जो फिलहाल पांच अलग-अलग कार्यक्षेत्रों में एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. उन्होंने कहा, “रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है, इजराइल-हमास संघर्ष भी जारी है. हमारे पड़ोस में भी काफी अस्थिरता है. लिहाजा, पूरी भू-राजनीति बदल रही है. एक बदलाव हो रहा है. और इसका प्रभाव न केवल हमारे देश पर बल्कि हमारी सशस्त्र सेनाओं पर भी पड़ता है.” लेफ्टिनेंट जनरल कालिता ने कहा, चूंकि चारों ओर “परिवर्तन” हो रहे हैं, तकनीकी विकास हो रहा है तो इससे युद्ध के तरीकों पर प्रभाव पड़ रहा है.

उन्होंने कहा, “केवल सशस्त्र बल ही भविष्य में कोई युद्ध नहीं जीत सकते. पूरे देश को प्रयास करना होगा. पूरे देश के हर वर्ग को भविष्य की लड़ाई में भाग लेना होगा. हाल के इजराइल-हमास संघर्ष और रूस-यूक्रेन संघर्ष से यह साबित होता है.” कलिता ने कहा कि वर्तमान समय के युद्ध में, आबादी का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं रहता और इससे नागरिक-सैन्य समन्वय का महत्व पता चलता है.

उन्होंने कहा, “इसलिए, युद्ध लड़ने की पद्धति भी बदल रही है. यही कारण है कि 2023 को भारतीय सेना ने परिवर्तन के वर्ष के रूप में चिन्हित किया है. ये बदलाव पांच मुख्य स्तंभ पर आधारित हैं.” उन्होंने कहा कि इन पांच स्तंभों में बल पुनर्गठन एवं अनुकूलन, आधुनिकीकरण एवं प्रौद्योगिकी समावेशन, प्रक्रियाएं एवं कार्य, मानव संसाधन प्रबंधन, और एकीकरण हैं. उन्होंने कहा, “हमें देश की सामाजिक-राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक जरूरतों के साथ सुरक्षा जरूरतों के साथ सामंजस्य बिठाने की जरूरत है. इसलिए हमें सभी क्षेत्रों में तालमेल बनाना चाहिए.”

भू-राजनीति में बदलाव जारी हैं, केवल सेना युद्ध नहीं जीत सकती: लेफ्टिनेंट जनरल आरपी कालिता

थलसेना की पूर्वी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कालिता ने मंगलवार को कहा कि भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक “बदलाव” आ रहा है और सिविल सोसाइटी की भागीदारी के बिना केवल सशस्त्र बल भविष्य में होने वाला कोई युद्ध नहीं जीत सकते. लेफ्टिनेंट जनरल कालिता ने गौहाटी प्रेस क्लब के अतिथि के तौर पर कहा कि “बदलाव” ने भारतीय थलसेना को प्रभावित किया है, जो फिलहाल पांच अलग-अलग कार्यक्षेत्रों में एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है.

उन्होंने कहा, “रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है, इजराइल-हमास संघर्ष भी जारी है. हमारे पड़ोस में भी काफी अस्थिरता है. लिहाजा, पूरी भू-राजनीति बदल रही है. एक बदलाव हो रहा है. और इसका प्रभाव न केवल हमारे देश पर बल्कि हमारी सशस्त्र सेनाओं पर भी पड़ता है.” लेफ्टिनेंट जनरल कालिता ने कहा, चूंकि चारों ओर “परिवर्तन” हो रहे हैं, तकनीकी विकास हो रहा है तो इससे युद्ध के तरीकों पर प्रभाव पड़ रहा है.

उन्होंने कहा, “केवल सशस्त्र बल ही भविष्य में कोई युद्ध नहीं जीत सकते. पूरे देश को प्रयास करना होगा. पूरे देश के हर वर्ग को भविष्य की लड़ाई में भाग लेना होगा. हाल के इजराइल-हमास संघर्ष और रूस-यूक्रेन संघर्ष से यह साबित होता है.” कलिता ने कहा कि वर्तमान समय के युद्ध में, आबादी का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं रहता और इससे नागरिक-सैन्य समन्वय का महत्व पता चलता है.

उन्होंने यहां पत्रकारों से कहा, “इसलिए, युद्ध लड़ने की पद्धति भी बदल रही है. यही कारण है कि 2023 को भारतीय सेना ने परिवर्तन के वर्ष के रूप में चिन्हित किया है. ये बदलाव पांच मुख्य स्तंभ पर आधारित हैं.” उन्होंने कहा कि इन पांच स्तंभों में बल पुनर्गठन एवं अनुकूलन, आधुनिकीकरण एवं प्रौद्योगिकी समावेशन, प्रक्रियाएं एवं कार्य, मानव संसाधन प्रबंधन, और एकीकरण हैं. उन्होंने कहा, “हमें देश की सामाजिक-राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक जरूरतों के साथ सुरक्षा जरूरतों के साथ सामंजस्य बिठाने की जरूरत है. इसलिए हमें सभी क्षेत्रों में तालमेल बनाना चाहिए.”

मणिपुर संघर्ष ‘राजनीतिक समस्या’; लूटे गए 4,000 हथियार बरामद होने बाकी: लेफ्टिनेंट जनरल कलिता

मणिपुर में जातीय संघर्ष को “राजनीतिक समस्या” करार देते हुए सेना की पूर्वी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता ने मंगलवार को कहा कि जब तक सुरक्षाबलों से लूटे गए लगभग 4,000 हथियार आम लोगों से बरामद नहीं कर लिए जाते तब तक हिंसा की घटनाएं जारी रहेंगी.

पूर्वी कमान के ‘जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ’ ने यह भी कहा कि भारत मिजोरम और मणिपुर में आम ग्रामीणों, सेना या पुलिस सहित म्यांमा से शरण लेने वाले किसी भी व्यक्ति को शरण दे रहा है, लेकिन मादक पदार्थों के तस्करों के उग्रवादी समूहों के सशस्त्र कैडरों को नहीं.

कलिता ने गुवाहाटी प्रेस क्लब में संवाददाताओं से बातचीत में कहा, ”हमारा प्रयास हिंसा को रोकना और संघर्ष के दोनों पक्षों को राजनीतिक समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रेरित करना है. क्योंकि अंतत? समस्या का राजनीतिक समाधान ही होना है.” उन्होंने कहा कि जहां तक ??जमीनी स्थिति का सवाल है, भारतीय सेना का उद्देश्य शुरू में अपने घरों से विस्थापित हुए लोगों के लिए बचाव और राहत अभियान चलाना था.

कलिता ने कहा, “इसके बाद, हम हिंसा को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें हम काफी हद तक सफल रहे हैं. लेकिन दो समुदायों-मेइती और कुकी के बीच ध्रुवीकरण के कारण यहां-वहां छिटपुट घटनाएं होती रहती हैं.” यह पूछे जाने पर कि झड़प शुरू होने के साढ.े छह महीने से अधिक समय के बाद भी मणिपुर में सामान्य स्थिति क्यों नहीं लौटी है, उन्होंने कहा कि राज्य में रहने वाले तीन समुदायों-मेइती, कुकी और नगा के बीच कुछ विरासत संबंधी मुद्दे हैं. लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा कि इससे पहले 1990 के दशक में कुकी और नगाओं के बीच संघर्ष हुआ था, जिसमें लगभग 1,000 लोग मारे गए थे.

उन्होंने कहा, “अब क्या हुआ है कि दो समुदाय पूरी तरह से ध्रुवीकृत हो गए हैं. हालांकि हिंसा का स्तर कम हो गया है. विभिन्न थानों और अन्य स्थानों से 5,000 से अधिक हथियार लूट लिए गए.” अधिकारी ने कहा, “इनमें से केवल 1,500 हथियार ही बरामद किए गए हैं. इसलिए, लगभग 4,000 हथियार अभी भी बाहर हैं. जब तक ये हथियार लोगों के पास हैं, तब तक इस तरह की छिटपुट हिंसक गतिविधियां जारी रहेंगी.” कलिता ने कहा कि भारत-म्यांमा सीमा के माध्यम से मादक पदार्थों के साथ-साथ हथियारों की तस्करी थम गई है, हालांकि कुछ छिटपुट घटनाएं हो सकती हैं.

उन्होंने जोर देकर कहा, “लेकिन चूंकि 4,000 हथियार पहले से ही खुले में हैं, मुझे लगता है कि बाहर से हथियार लाने की कोई आवश्यकता नहीं है.” मणिपुर में तीन मई को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मेइती समुदाय की मांग के विरोध में पर्वतीय जिलों में ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ आयोजित होने के बाद शुरू हुईं जातीय झड़पों में 180 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और सैकड़ों अन्य घायल हुए हैं.

राज्य की आबादी में मेइती लोगों की संख्या लगभग 53 प्रतिशत है और वे ज्यादातर इंफाल घाटी में रहते हैं. वहीं, नगा और कुकी आदिवासी समुदायों की आबादी 40 प्रतिशत से कुछ अधिक है, जो पर्वतीय जिलों में रहते हैं. म्यांमा के शरणार्थी संकट पर लेफ्टिनेंट जनरल कलिता ने कहा, “हमारे पड़ोस में कोई भी अस्थिरता हमारे हित में नहीं है. यह निश्चित रूप से हम पर प्रभाव डालती है, क्योंकि हमारे बीच साझा सीमा है. कठिन भौगालिक स्थितियों तथा विकास की कमी के कारण भारत-म्यांमा सीमा संबंधी समस्या बढ. जाती है.” उन्होंने कहा कि सीमा के दोनों ओर एक ही जातीय मूल के लोग हैं, जहां काफी स्वतंत्र आवाजाही होती है, और सीमाओं का प्रबंधन करने वाले बलों के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन भारत के लोग हैं और कौन म्यांमा से हैं.

कलिता ने कहा, “हम शरण चाहने वाले किसी भी व्यक्ति को आश्रय दे रहे हैं, चाहे वह आम ग्रामीण हो या म्यांमा सेना या म्यांमा पुलिस हो. एक उचित प्रक्रिया का पालन किया जाता है. जब भी वे अंदर आना चाहते हैं, तो हथियार स्पष्ट रूप से अलग कर दिए जाते हैं.” उन्होंने कहा, “इसके बाद एक उचित पहचान की जाती है, ताकि अवांछित तत्वों को अलग किया जा सके. हम विदेश मंत्रालय और (म्यांमा) दूतावास से संपर्क करते हैं. म्यांमा सेना के इन सभी जवानों को मोरेह (मणिपुर में) ले जाया जाएगा और फिर (म्यांमा) बल को सौंप दिया जाएगा.” कलिता ने कहा कि सीमा पर बलों के लिए निर्देश बिलकुल स्पष्ट है कि म्यांमा में संघर्ष से बचने के लिए शरण लेने वाले आम ग्रामीणों को रोका नहीं जाए और जब भी वे तैयार हों, उन्हें वापस भेज दिया जाए.

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