स्वदेश निर्मित ‘आईएनएस विक्रांत’ नौसेना के बेड़े में शामिल

कोच्चि/नयी दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को यहां भारत के पहले स्वदेश निर्मित विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विक्रांत’ का जलावतरण किया. इसके साथ ही भारत उन चुंिनदा देशों की फेहरिस्त में शामिल हो गया है, जिनके पास ऐसे बड़े युद्धपोतों के निर्माण की घरेलू क्षमताएं हैं.

मोदी ने छत्रपति शिवाजी महाराज से प्रेरित नौसेना के नये निशान (ध्वज) का भी अनावरण किया. उन्होंने कहा कि आज देश ने भारत ने गुलामी के एक निशान, ‘गुलामी के एक बोझ’ को सीने से उतार दिया है. प्रधानमंत्री मोदी ने यहां कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) में स्वदेश निर्मित जहाज को नौसेना के बेड़े में शामिल किया. इस जहाज का नाम नौसेना के एक पूर्व जहाज ‘विक्रांत’ के नाम पर रखा गया है, जिसने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अहम भूमिका निभायी थी.

उन्होंने विमानवाहक पोत की कुछ विशेषताओं के बारे में भी बात की. उन्होंने इसे ‘‘फ्लोंिटग एयरफील्ड, एक तैरता हुआ शहर’’ के रूप में र्विणत किया. उन्होंने कहा कि आईएनएस विक्रांत में जितनी बिजली पैदा होती है उससे 5,000 घरों को रोशन किया जा सकता है.
सीएसएल पर आईएनएस विक्रांत के जलावतरण समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और नौसेना प्रमुख एडमिरल आर. हरि कुमार सहित कई गणमान्य लोग शामिल हुए.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वह आईएनएस विक्रांत को मराठा योद्धा छत्रपति शिवाजी को सर्मिपत करते हैं. उन्होंने कहा, ‘‘आज दो सितंबर, 2022 की ऐतिहासिक तारीख को, इतिहास बदलने वाला एक और काम हुआ है. आज भारत ने, गुलामी के एक निशान, गुलामी के एक बोझ को अपने सीने से उतार दिया है. आज से भारतीय नौसेना को एक नया ध्वज मिला है.’’ उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय नौसेना के झंडे पर अब तक गुलामी की पहचान बनी हुई थी. लेकिन आज से छत्रपति शिवाजी से प्रेरित होकर नौसेना का नया ध्वज समुद्र और आसमान में लहराएगा.’’ नौसेना ने पहले कहा था कि नया ‘निशान’ समृद्ध भारतीय समुद्री विरासत के अनुरूप होगा.

विक्रांत के नौसेना के बेड़े में शामिल होने के साथ ही भारत अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस जैसे देशों के एक चुंिनदा समूह में शामिल हो गया है, जिसमें स्वदेशी रूप से एक विमानवाहक पोत का निर्माण करने की विशिष्ट क्षमता है. कुल 262 मीटर लंबा तथा 62 मीटर चौड़ा यह जहाज 28 समुद्री मील से लेकर 7500 समुद्री मील की दूरी तय कर सकता है. बीस हजार करोड़ रुपये की लागत से बना यह विमान वाहक जहाज अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है. यह देश में बने ‘एडवांसड लाइट हेलीकॉप्टर’ (एएलएच) के अलावा मिग-29के लड़ाकू विमान सहित 30 विमान संचालित करने की क्षमता रखता है.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘‘आईएनएस विक्रांत भारत के रक्षा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण है. आईएनएस विक्रांत के साथ ही भारत उन चुंिनदा देशों के समूह में शामिल हो गया है, जो स्वदेशी स्तर पर विमानवाहक पोत बना सकते हैं. आज आईएनएस विक्रांत ने देश को एक नए आत्मविश्वास से भर दिया है.’’ मोदी ने कहा, ‘‘ विक्रांत विशाल है, विराट है, विहंगम है. विक्रांत विशिष्ट है, विक्रांत विशेष भी है. विक्रांत केवल एक युद्धपोत नहीं है. यह 21वीं सदी के भारत के परिश्रम, प्रतिभा, प्रभाव और प्रतिबद्धता का प्रमाण है.’’

उन्होंने कहा, ‘‘ यदि लक्ष्य दुरन्त हैं, यात्राएं दिगंत हैं, समंदर और चुनौतियाँ अनंत हैं तो भारत का उत्तर है विक्रांत. आजादी के अमृत महोत्सव का अतुलनीय अमृत है विक्रांत. आत्मनिर्भर होते भारत का अद्वितीय प्रतिंिबब है विक्रांत.’’ मोदी ने नौसेना, कोचीन शिपयार्ड के इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और विशेष रूप से परियोजना पर काम करने वाले श्रमिकों के योगदान को स्वीकार किया और उनकी प्रशंसा की. उन्होंने कहा कि ओणम का सुखद और शुभ अवसर खुशी में इजाफा कर रहा है.

उन्होंने कहा, ‘‘ छत्रपति वीर शिवाजी महाराज ने इस समुद्री सामर्थ्य के दम पर ऐसी नौसेना का निर्माण किया, जो दुश्मनों की नींद उड़ाकर रखती थी. जब अंग्रेज भारत आए, तो वे भारतीय जहाजों और उनके जरिए होने वाले व्यापार की ताकत से घबराए रहते थे. इसलिए उन्होंने भारत के समुद्री सामर्थ्य की कमर तोड़ने का फैसला लिया. इतिहास गवाह है कि कैसे उस समय ब्रिटिश संसद में कानून बनाकर भारतीय जहाजों और व्यापारियों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए थे.’’

महिला शक्ति पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘ विक्रांत जब हमारे समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा के लिए उतरेगा, तो उस पर नौसेना की अनेक महिला सैनिक भी तैनात रहेंगी. समंदर की अथाह शक्ति के साथ असीम महिला शक्ति, ये नए भारत की बुलंद पहचान बन रही है.’’ ‘वोकल फॉर लोकल’ के मंत्र को बढ़ावा देने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘ बूंद-बूंद जल से जैसे विराट समंदर बन जाता है. वैसे ही भारत का एक-एक नागरिक ‘वोकल फॉर लोकल’ के मंत्र को जीना प्रारंभ कर देगा, तो देश को आत्मनिर्भर बनने में अधिक समय नहीं लगेगा.’’

नौसेना का बजट बढ़ाने पर मोदी ने कहा, ‘‘ हिंद-प्रशांत क्षेत्र और हिंद महासागर में सुरक्षा चिंताओं को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया है, लेकिन आज ये क्षेत्र हमारे लिए देश की बड़ी रक्षा प्राथमिकता हैं. इसलिए हम नौसेना के लिए बजट बढ़ाने से लेकर उसकी क्षमता बढ़ाने तक हर दिशा में काम कर रहे हैं.’’ केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए.

आईएनएस विक्रांत पूर्व सरकारों के सामूहिक प्रयासों का नतीजा : कांग्रेस

कांग्रेस ने शुक्रवार को भारत के पहले स्वदेश निर्मित पोत ‘‘आईएनएस विक्रांत’’ को राष्ट्र को सर्मिपत करने का श्रेय लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावे पर सवाल उठाया और आरोप लगाया कि उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों के योगदान को उचित स्थान ना देकर ‘‘पाखंड’’ किया है. पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भारतीय नौसेना, उसके डिजाइन ब्यूरो और कोचिन शिपयार्ड को बधाई दी और ‘‘आईएनएस विक्रांत’’ को नौसेना के बेड़े में शामिल किए जाने को देश की समुद्री सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया.

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने अगस्त 2013 में आईएनएस विक्रांत का उद्घाटन करते पूर्व रक्षा मंत्री ए के एंटनी का एक वीडियो साझा किया और कहा कि चूंकि मोदी सरकार सत्ता में है, इसलिए वह इस विमानवाहक पोत को राष्ट्र को सर्मिपत कर रही है.
रमेश ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘मोदी सरकार का इससे कोई लेना देना नहीं है. जब इसे बेड़े में शामिल किया जा रहा है तब मोदी सरकार सत्ता में हैं. सच्चाई यह है कि कई साल पहले रक्षा मंत्री रहते हुए ए के एंटनी ने आईएनएस विक्रांत को लांच किया था. डिजाइन से लेकर निर्माण और लांच से लेकर देश को सर्मिपत करने में 22 साल लगे हैं. मोदी सरकार ने बस, इसे बेड़े में शामिल किया है और वह इसका श्रेय ले रही है.’’

उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘इसलिए, यह पाखंड है जो वर्तमान प्रधानमंत्री की खासियत है.’’ वरिष्ठ कांग्रेस नेता रमेश ने कहा कि यह ऐसी उपलब्धि है जिससे देश की मजबूती को बल मिलेगा और अपनी खासियत के अनुरूप प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्ववर्ती सरकारों के योगदान को उचित स्थान नहीं दिया.

एंटनी का वीडियो साझा करते हुए रमेश ने यह भी कहा, ‘‘तत्कालीन रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने 12 अगस्त 2013 को भारत के पहले स्वदेश निर्मित विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत को लांच किया था. प्रधानमंत्री ने इसे आज बेड़े में शामिल किया है. आत्मनिर्भर भारत 2014 से पहले भी था. इससे जुड़े पूर्व प्रधानमंत्रियों के योगदान की भी सराहना की जानी चाहिए.’’

उन्होंने कहा, ‘‘भारत के पहले स्वदेश निर्मित विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत को राष्ट्र को सर्मिपत किया जाना 1999 के बाद की सभी सरकारों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है. क्या प्रधानमंत्री मोदी इसे स्वीकार करेंगे?’’ रमेश ने कहा कि इस अवसर पर पहले आईएनएस विक्रांत को भी याद किया जाना चाहिए, जिसने 1971 के युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता कृष्णा मेनन ने ब्रिटेन से इसे हासिल करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी.

प्रधानमंत्री ने आज कोच्चि में ‘आईएनएस विक्रांत’ का जलावतरण किया. इसके साथ ही भारत उन चुंिनदा देशों की फेहरिस्त में शामिल हो गया है, जिनके पास ऐसे बड़े युद्धपोतों के निर्माण की घरेलू क्षमताएं हैं. कुल 262 मीटर लंबा तथा 62 मीटर चौड़ा यह जहाज 28 समुद्री मील से लेकर 7500 समुद्री मील की दूरी तय कर सकता है. 20,000 करोड़ रुपये की लागत से बना यह विमान वाहक जहाज अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है. यह देश में बने ‘एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर’ (एएलएच) के अलावा मिग-29के लड़ाकू विमान सहित 30 विमान संचालित करने की क्षमता रखता है.

इस नए पोत के साथ ही भारत अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस जैसे देशों की श्रृंखला में शामिल हो गया है जिनके पास ऐसे बड़े युद्धपोतों के निर्माण की घरेलू क्षमताएं हैं. रमेश ने कहा कि आईएनएस विक्रांत को नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाना भारतीय नौसेना के इंजीनियरों, अधिकारियों और कोचिन शिपयार्ड के कर्मचारियों को सर्मिपत है.

उन्होंने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी की समस्या ये है कि सरकारों की निरंतरता को वह नहीं मानते जैसे 2014 से पहले भारत था ही नहीं. रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की शुरुआत कृष्णा मेनन ने 1957 में रक्षा मंत्री के रूप में की थी और जवाहरलाल नेहरू उस वक्त देश के प्रधानमंत्री थे.’’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईएनएस विक्रांत का जलावतरण करते हुए कहा, ‘‘ आईएनएस विक्रांत भारत के रक्षा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण है. आईएनएस विक्रांत के साथ ही भारत उन चुंिनदा देशों के समूह में शामिल हो गया है, जो स्वदेशी स्तर पर विमानवाहक पोत बना सकते हैं.’’ मोदी ने कहा, ‘‘ विक्रांत विशाल है, विराट है, विहंगम है. विक्रांत विशिष्ट है, विक्रांत विशेष भी है. विक्रांत केवल एक युद्धपोत नहीं है. यह 21वीं सदी के भारत के परिश्रम, प्रतिभा, प्रभाव और प्रतिबद्धता का प्रमाण है.’’

समय-समय पर बदलता रहा, और सदियों में विकसित हुआ नौसेना का ध्वज
भारतीय नौसेना को शुक्रवार को एक नया ध्वज मिला और इसके साथ ही इसने औपनिवेशक पहचान को त्याग दिया. ब्रिटश शासन से लेकर गणराज्य के प्रतीक तक यह झंडा सदियों में विकसित हुआ है. यह ध्वज अनिवार्य रूप से एक विशेष डिजाइन वाला झंडा होता है जो जहाजों या नौसैन्य बल की पहचान और राष्ट्रीयता को दर्शाता है, खासकर गहरे समुद्र में.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कोच्चि में भारत के पहले स्वदेश निर्मित विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विक्रांत’ के जलावतरण समारोह में नए ध्वज का अनावरण किया. मोदी ने भारतीय नौसेना के नए निशान (ध्वज) का अनावरण करते हुए कहा कि भारत ने औपनिवेशिक अतीत को त्याग दिया है.

उन्होंने इसे छत्रपति शिवाजी महाराज को सर्मिपत करते हुए कहा, ‘‘आज दो सितंबर, 2022 की ऐतिहासिक तारीख को, इतिहास बदलने वाला एक और काम हुआ है. आज भारत ने, गुलामी के एक निशान, गुलामी के एक बोझ को अपने सीने से उतार दिया है. आज से भारतीय नौसेना को एक नया ध्वज मिला है.

भारतीय नौसेना के झंडे पर अब तक गुलामी की पहचान बनी हुई थी. लेकिन आज से छत्रपति शिवाजी से प्रेरित नौसेना का नया झंडा समुद्र और आसमान में लहराएगा.’’ नए ध्वज में क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर लाल धारियों को हटा दिया गया है जो कि ‘क्रॉस आॅफ सेंट जॉर्ज’ का प्रतीक था जो औपनिवेशिक युग की याद दिलाता था और जो इसके पिछले संस्करण में मौजूद था. इसके फ्लाई क्षेत्र में जुड़वां सुनहरी सीमाओं के साथ एक अष्टकोणीय आकार शामिल किया गया है जो मराठा शासक की मुहर से प्रेरित है.

नौसेना द्वारा जारी एक वीडियो के अनुसार, नीले अष्टकोणीय आकार में एक लंगर के ऊपर राष्ट्रीय प्रतीक को शामिल किया गया है जो दृढ़ता को दर्शाता है. यह नौसेना के आदर्श वाक्य “सम नो वरुण:” के साथ एक ढाल पर लगाया गया है, जिसका अर्थ है: ‘‘हमारे लिए शुभ हो ओह वरुण’’. अष्टकोणीय आकार आठ दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो भारतीय नौसेना की बहु-दिशात्मक पहुंच और बहु-दिशात्मक परिचालन क्षमता का प्रतीक है. भारतीय नौसेना ने अपने ट्वीट में नए ध्वज के अनावरण को ‘‘नौसेना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन” करार दिया.

भारतीय नौसेना का मूल औपनिवेशिक काल में जाता है, और एक स्वतंत्र भारत के नौसैन्य बल के रूप में अपनी पहचान धारण से पहले इसके नामकरण में पिछली कुछ शताब्दियों में कई बदलाव हुए हैं. ये बदलाव ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन और फिर 1857 के विद्रोह के बाद शासन के सीधे ब्रिटिश राजपरिवार के अधीन जाने तथा अंतत: भारत के 1947 में स्वतंत्रता अर्जित करने तथा तीन साल बाद गणतंत्र बनने तक फैले हैं. इन सदियों में नौसैनिक बलों का ध्वज समय-समय पर विकसित होता रहा और बदलता रहा.

नेवल डॉकयार्ड मुंबई (एनडीएम) में विरासत दीर्घा में एक पैनल पर प्रर्दिशत जानकारी के अनुसार, “भारत में, ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1612 में सूरत में अपनी गतिविधियों की शुरुआत की और उसके जहाजों को माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी के मरीन के रूप में जाना जाता है. इसने कैंटन में सेंट जॉर्ज क्रॉस के साथ धारीदार ध्वज अपनाया. सूरत से बंबई में गतिविधियों के स्थानांतरण के साथ, बॉम्बे मरीन का गठन 1686 में किया गया था.” वर्ष 1707 में, ब्रिटिश संघ के ध्वज से कैंटन में सेंट जॉर्ज क्रॉस को बदल दिया, और 1801 में ब्रिटिश ध्वज को विकर्ण के साथ लाल धारियों को शामिल करने के लिए संशोधित किया गया था.

साल 1830 में, बॉम्बे मरीन का नाम बदलकर ‘हर मेजेस्टीज इंडियन नेवी’ कर दिया गया. समय के साथ नौसेना की ताकत बढ़ती रही और अगले कुछ दशकों में इसके नामकरण में कई बदलाव हुए. नौसेना की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 1863 से 1877 तक इसका नाम ‘बॉम्बे मरीन’ रहा और इसके बाद इसका नाम ‘हर मेजेस्टीज इंडियन मरीन’ कर दिया गया.

विभिन्न अभियानों के दौरान प्रदान की गई सेवाओं को मान्यता देते हुए इसका नाम 1892 में ‘रॉयल इंडियन मरीन’ कर दिया गया. उस समय तक इसमें 50 से अधिक जहाज शामिल थे. साल 934 में ‘रॉयल इंडियन मरीन’ को ‘रॉयल इंडियन नेवी’ नाम दिया गया और इसकी सेवाओं को मान्यता देते हुए इसे 1935 में ‘ंिकग्स कलर’ प्रस्तुत किया गया था.

दीर्घा में काम करने वाली हेरिटेज सिनर्जीज इंडिया की संस्थापक कमलिका बोस ने कहा कि नौसेना और उसके ध्वज-दोनों के विकास को एनडीएम की विरासत दीर्घा में दर्शाया गया है और इन सदियों में लाए गए ध्वज डिजाइन भी प्रर्दिशत किए गए हैं. वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के साथ, स्वतंत्रता के बाद, रॉयल इंडियन नेवी को रॉयल इंडियन नेवी और रॉयल पाकिस्तान नेवी में विभाजित कर दिया गया. 26 जनवरी, 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के साथ, उपसर्ग ‘रॉयल’ को हटा दिया गया और इसे भारतीय नौसेना (इंडियन नेवी) के रूप में नया नाम दिया गया.

छब्बीस जनवरी 1950 से 2001 तक, भारतीय नौसेना ने ब्रिटिश नौसैन्य ध्वज के एक संशोधित संस्करण का उपयोग किया, और कैंटन में यूनियन जैक को भारतीय तिरंगे से बदल दिया गया. 15 अगस्त, 2001 से, इस ध्वज को भारतीय नौसेना के क्रेस्ट वाले एक सफेद ध्वज के साथ बदल दिया गया, क्योंकि पिछला ध्वज भारत के औपनिवेशिक अतीत को प्रतिंिबबित करता था और यह 2004 तक बना रहा.

वर्ष 2004 के बाद से, क्रॉस के केंद्र में भारत के राष्ट्रीय प्रतीक को जोड़ने के साथ ही ध्वज को सेंट जॉर्ज क्रॉस डिजÞाइन में वापस बदल दिया गया और 2014 में प्रतीक के नीचे देवनागरी लिपि में राष्ट्रीय आदर्श वाक्य – सत्यमेव जयते – को नीचे जोड़ा गया तथा यह दो सितंबर, 2022 को नए ध्वज को अपनाने तक उपयोग में रहा.

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