न्यायपालिका को अधिक संवेदनशील होना चाहिए, मूल अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए: सिब्बल

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Sun, 17 Jul 2022 06:00 PM
न्यायपालिका को अधिक संवेदनशील होना चाहिए, मूल अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए: सिब्बल
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कोलकाता. वरिष्ठ कानूनविद् और अधिवक्ता कपिल सिब्बल का मानना है कि न्यायपालिका को ‘मौलिक अधिकारों के उल्लंघन’ को लेकर लोगों की ंिचताओं के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राजनीतिक उद्देश्यों के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग नहीं किया जाए. उन्होंने कहा कि अदालतों को लोगों के मौलिक अधिकारों की सक्रियता से रक्षा करना चाहिए और संस्थाओं को दुरुपयोग किये जाने से बचाना चाहिए.

उल्लेखनीय है कि कुछ महीने पहले सिब्बल ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी और वर्तमान में वह राज्यसभा के निर्दलीय सदस्य हैं. उन्होंने कहा कि अदालतों के कुछ फैसले देश में न्यायपालिका की स्थिति को प्रर्दिशत करते हैं. सिब्बल ने यहां ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में कहा, ”मुझे लगता है कि न्यायपालिका को इन ंिचताओं (मौलिक अधिकारों के हनन) के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए और इस दिशा में काम करना चाहिए. केवल दो संस्थाएं-मीडिया और अदालतें-ही ऐसी हैं, जो हमारे नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा कर सकती हैं. मीडिया का काम लोगों के अधिकारों के हनन के गंभीर मुद्दों को सामने लाना होता है. लेकिन मैंने अतीत में देखा है कि कुछ मामलों में ऐसा नहीं हुआ है.” यह पूछे जाने पर कि क्या विपक्ष लोगों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहा है, उन्होंने कहा कि यह अदालतों का कर्तव्य है.

सिब्बल ने कहा, “अगर देश की संस्थाओं पर हमला होता है, अगर उन संस्थाओं का राजनीतिक लाभ के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है, अगर लोगों को कैद किया जा रहा है, तो उनकी रक्षा कौन करेगा? विपक्ष? नहीं.” उन्होंने कहा, ”संस्थाओं को अदालतों से सुरक्षा मिलने की जरूरत है. अदालतों को ंिचताओं के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है, ताकि राजनीतिक उद्देश्यों के लिए एजेंसियों का दुरुपयोग न हो. अदालतों को उन लोगों की सक्रियता से रक्षा करनी चाहिए जो बेवजह जेलों में कैद हैं.” सिब्बल ने यह पूछे जाने पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि क्या न्यायपालिका का राजनीतिकरण किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, ”मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता. अदालतों के फैसले न्यायपालिका की स्थिति को प्रर्दिशत करते हैं… 2014 के बाद से कुछ ऐसे फैसले आए हैं, जिन्होंने मुझे ंिचतित किया है.” वरिष्ठ सांसद ने भाजपा नीत केंद्र सरकार पर संसद में विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाकर विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, ”यह अभूतपूर्व और अस्वीकार्य है. हमने कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी. शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना एक लोकतांत्रिक अधिकार है. वे किसी भी तरह के विरोध को रोकना चाहते हैं, वे यही चाहते हैं.” राज्यसभा सचिवालय द्वारा जारी एक परिपत्र के अनुसार, संसद के परिसर में प्रदर्शन, धरना और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जा सकते. इसपर विपक्ष ने नाराजगी जताई है जबकि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जोर देते हुए कहा है कि इस तरह के नोटिस वर्षों से जारी किए जा रहे हैं. देश में वर्तमान स्थिति के मद्देनजर भविष्य के बारे में टिप्पणी करते हुए, पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने के लिए बदलाव की आवश्यकता के बारे में ”लोगों की समझ” वर्तमान परिदृश्य को बदल देगी.

उन्होंने कहा, ”चीजें तब तक नहीं बदलेंगी जब तक लोगों को यह एहसास नहीं होगा कि आने वाले वर्षों में, शासन की प्रकृति बदल जाएगी, और वे अपने बच्चों तथा नाती-पोतों के भविष्य की परिकल्पना नहीं कर पाएंगे.” विपक्षी एकता के बारे में सिब्बल ने कहा कि यह समय ही बताएगा कि यह किस तरह से आकार लेगा. उन्होंने इस बात से इनकार किया कि विपक्ष का नेतृत्व कोई मुद्दा होगा.
उन्होंने कहा, ”नेता हमेशा उभरते हैं. नरेंद्र मोदी (भाजपा के नेता के रूप में) उभरे… इससे पहले, हमने कई वर्षों तक भाजपा में किसी भी नेता को उभरते हुए नहीं देखा था.” यह पूछे जाने पर कि क्या पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विपक्ष का नेतृत्व कर सकती हैं, इसपर सिब्बल ने कहा कि यह विपक्षी दलों को तय करना है. उन्होंने कहा, ”मुझे किसी व्यक्ति के बारे में टिप्पणी नहीं करनी. वह एक बड़ी योद्धा हैं, वह ऊर्जावान नेता हैं, लेकिन मुझे नहीं पता कि भविष्य में क्या होगा.”

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