धोखाधड़ी के आरोप वाली जनहित याचिका पर केंद्र, सीबीआई, ईडी व अनिल अंबानी को नोटिस

नयी दिल्ली. एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, उच्चतम न्यायालय ने रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) और इसके समूह की कंपनियों की संलिप्तता वाली कथित व्यापक बैंकिंग और कॉर्पोरेट धोखाधड़ी की अदालत की निगरानी में जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर मंगलवार को केंद्र, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), अनिल अंबानी और अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (एडीएजी) से जवाब मांगा.

प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने जनहित याचिका दायर करने वाले और पूर्व केंद्रीय सचिव ई ए एस शर्मा की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण की दलीलों पर गौर किया और तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा. पीठ ने अब जनहित याचिका पर आगे की सुनवाई तीन सप्ताह बाद करना निर्धारित किया है. भूषण ने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियां इस बड़े बैंकिंग घोटाले में बैंकों और उनके अधिकारियों की कथित मिलीभगत की जांच नहीं कर रही हैं. उन्होंने सीबीआई और ईडी को इस मामले में बैंकों और उनके अधिकारियों के खिलाफ जांच की स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देने का अनुरोध किया. भूषण ने कहा कि यह मामला “संभवत? भारत के इतिहास में सबसे बड़ा कॉर्पोरेट धोखाधड़ी” का है. वकील ने आरोप लगाया कि प्राथमिकी 2025 में दर्ज की गई, जबकि धोखाधड़ी 2007-08 से चल रही थी.

उन्होंने कहा, “हम ईडी और सीबीआई से स्थिति रिपोर्ट चाहते हैं कि वे क्या जांच कर रहे हैं. स्पष्ट रूप से, वे बैंकों की मिलीभगत की जांच नहीं कर रहे हैं.” प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “नोटिस जारी करें… तीन हफ़्तों में जवाब दें. उन्हें अपना जवाब दाखिल करने दें.” जनहित याचिका में अनिल अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस एडीएजी की कई कंपनियों में सार्वजनिक धन के व्यवस्थित तरीके से दुरुपयोग, वित्तीय विवरणों में हेराफेरी और संस्थागत मिलीभगत का आरोप लगाया गया है. इसमें कहा गया है कि 21 अगस्त को सीबीआई द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी और इससे संबंधित ईडी की कार्यवाही, कथित धोखाधड़ी के केवल एक छोटे से हिस्से पर ध्यान देती है.

याचिका में दावा किया गया है कि गंभीर अनियमितताओं को चिन्हित करने वाले विस्तृत फोरेंसिक ऑडिट के बावजूद, कोई भी एजेंसी बैंक अधिकारियों, लेखा परीक्षकों या नियामकों की भूमिका की जांच नहीं कर रही है. उन्होंने इसे “गंभीर विफलता” करार दिया है.
याचिका में कहा गया है, “एक ‘रिट ऑफ मैंडमस (परमादेश)” जारी करें… या प्रतिवादी संख्या 4 (अनिल अंबानी) और प्रतिवादी संख्या 5 (एडीएजी) द्वारा की गयी वित्तीय धोखाधड़ी की पूरी तरह से निष्पक्ष और समयबद्ध जांच करने के लिए सीबीआई और ईडी को अदालत की निगरानी में जांच का निर्देश दें.” इसमें प्रतिवादियों को सीबीआई और ईडी के अधिकारियों को शामिल करते हुए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है, ताकि “गहन, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच” की जा सके.

याचिका में कहा गया है, “उचित रिट या निर्देश जारी करें कि एडीएजी, इसके प्रवर्तकों /निदेशकों और संबंधित कंपनी के मामलों की जांच की निगरानी इस माननीय न्यायालय द्वारा की जाए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जांच निष्पक्ष, स्वतंत्र, व्यापक और किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त हो, और फोरेंसिक और ऑडिट रिपोर्ट में सामने आए वित्तीय या आपराधिक कदाचार का कोई भी पहलू जांच के दायरे से बाहर न रहे.” याचिका में एक व्यापक, समन्वित और न्यायिक निगरानी वाली जांच की भी मांग की गई है और दावा किया गया है कि सीबीआई और ईडी द्वारा की जा रही जांच अपर्याप्त है और इसे अगस्त 2025 में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) द्वारा दर्ज की गई एक संकीर्ण प्राथमिकी तक “जानबूझकर सीमित” कर दिया गया है.

इसमें कहा गया है कि 2013 से 2017 के बीच आरकॉम, रिलायंस इंफ्राटेल (आरआईटीएल) और रिलायंस टेलीकॉम (आरटीएल) ने एसबीआई के नेतृत्व वाले बैंकों के एक संघ से 31,580 करोड़ रुपये उधार लिए. एसबीआई ने 21 अगस्त को प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें 2,929.05 करोड़ रुपये के नुकसान से संबंध में आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और कदाचार का आरोप लगाया गया था.

याचिका में कहा गया है कि प्राथमिकी 2019 में किए गए फोरेंसिक ऑडिट पर आधारित है, जिसमें संदिग्ध कोष प्रवाह, बैंक ऋणों से मिले पैसे को इधर-उधर करना, काल्पनिक लेनदेन और फर्जी कंपनियों के कथित उपयोग की जांच की गई थी. इसमें कहा गया है, “जांच एजेंसियों ने वर्तमान मामले में बैंक द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराने में पांच साल की देरी को नजरअंदाज कर दिया है, जो स्पष्ट रूप से बैंक अधिकारियों और अन्य लोक सेवकों की संलिप्तता को इंगित करता है, जिनके आचरण की वजह से धोखाधड़ी हुई, यह छुपाई गई या सुविधाजनक बनाई गई.” इसमें कहा गया है कि सीबीआई और ईडी इस संस्थागत पहलू की जांच करने में पूरी तरह विफल रहे हैं और उन्होंने उन सरकारी अधिकारियों को जांच से बाहर रखा है जिनकी मिलीभगत या जानबूझकर की गई नि्क्रिरयता, आपराधिक साजिश का अनिवार्य हिस्सा है.

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