PM और RSS पर ‘आपत्तिजनक’ कार्टून: न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बताया

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Mon, 14 Jul 2025 09:00 PM
PM और RSS पर ‘आपत्तिजनक’ कार्टून: न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बताया
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ताओं के कथित आपत्तिजनक कार्टून सोशल मीडिया पर साझा करने के आरोपी एक कार्टूनिस्ट की याचिका पर सुनवाई करते हुए सोमवार को कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का ‘दुरुपयोग’ हो रहा है.

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने आरोपी कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय की अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की वकील वृंदा ग्रोवर से कहा, ”आप (याचिकाकर्ता) यह सब क्यों करते हैं?” ग्रोवर ने कहा कि यह मामला 2021 में कोविड-19 महामारी के दौरान बनाए गए एक कार्टून को लेकर है.

उन्होंने कहा, ”यह (कार्टून) अरुचिकर हो सकता है. मैं कहना चाहूंगी कि यह घटिया भी है. लेकिन क्या यह अपराध है? माननीय न्यायाधीश ने कहा है कि यह आपत्तिजनक हो सकता है, लेकिन यह अपराध नहीं है. मैं केवल कानून पर बात कर रही हूं. मैं किसी भी चीज को सही ठहराने की कोशिश नहीं कर रही हूं.” ग्रोवर याचिकाकर्ता द्वारा की गई पोस्ट को हटाने के लिए सहमत हो गईं.
न्यायमूर्ति धूलिया ने कहा, ”हम इस मामले में चाहे जो भी (निर्णय) करें, लेकिन यह निश्चित रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग है.” मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने कहा कि ऐसी ”चीजें” बार-बार की जा रही हैं.

जब ग्रोवर ने कहा कि कुछ परिपक्वता दिखानी चाहिए, तो इस पर नटराज ने कहा, ”यहां केवल परिपक्वता का सवाल नहीं है, (बल्कि) यह इससे कहीं अधिक है.” ग्रोवर ने कार्टून के प्रकाशन के समय का उल्लेख करते हुए कहा कि तब से कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं हुई है. उन्होंने कहा कि मुद्दा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का है और क्या इसके लिए गिरफ्तारी और हिरासत की आवश्यकता होगी. पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 जुलाई (मंगलवार) की तारीख निर्धारित की.

ग्रोवर ने पीठ से याचिकाकर्ता को तब तक अंतरिम संरक्षण प्रदान करने का अनुरोध किया. हालांकि, पीठ ने कहा, ”हम इस पर कल (मंगलवार को) विचार करेंगे.” मालवीय ने उन्हें अग्रिम जमानत न देने संबंधी मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के तीन जुलाई के आदेश को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है.

वकील और आरएसएस कार्यकर्ता विनय जोशी की शिकायत पर मई में इंदौर के लसूड़िया पुलिस थाने में मालवीय के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. जोशी ने आरोप लगाया है कि मालवीय ने सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री अपलोड करके हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई और सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ा.

प्राथमिकी में कई ‘आपत्तिजनक’ पोस्ट का उल्लेख किया गया है, जिनमें भगवान शिव पर कथित रूप से अनुचित टिप्पणियों के साथ-साथ कार्टून, वीडियो, तस्वीरें और मोदी, आरएसएस कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोगों के बारे में टिप्पणियां शामिल हैं. उच्च न्यायालय में मालवीय के वकील ने दलील दी थी कि उन्होंने केवल एक कार्टून पोस्ट किया था, लेकिन अन्य फेसबुक उपयोगकर्ताओं द्वारा उस पर की गई टिप्पणियों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. प्राथमिकी में उन पर हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और आरएसएस की छवि धूमिल करने के इरादे से अभद्र और आपत्तिजनक विषय-वस्तु पोस्ट करने का आरोप लगाया गया है.

पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 196 (विभिन्न समुदायों के बीच सद्भाव बनाए रखने के प्रतिकूल कार्य), 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य) और 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67-ए (इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में स्पष्ट रूप से किसी भी यौन सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करना) के तहत मामला दर्ज किया है.

नागरिकों को भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अहमियत समझनी चाहिए: न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में दिशानिर्देशों पर विचार करते हुए कहा कि नागरिकों को भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अहमियत समझनी चाहिए और आत्म-नियमन का पालन करना चाहिए. न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ वजाहत खान नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही है. खान के खिलाफ पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में प्राथमिकी दर्ज हैं. उस पर ‘एक्स’ पर एक हिंदू देवता के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट करने का आरोप है.
शीर्ष अदालत ने 23 जून को खान को 14 जुलाई तक किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया था.

खान ने एक अन्य ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ र्शिमष्ठा पनोली के खिलाफ एक वीडियो में कथित तौर पर सांप्रदायिक टिप्पणी करने के लिए शिकायत दर्ज कराई थी. उसके वकील ने शीर्ष अदालत में कहा कि ऐसे पोस्ट के जवाब में आपत्तिजनक टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए.

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ”नागरिकों को भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की अहमियत समझनी चाहिए. वैसे तो कोई नहीं चाहता कि राज्य हस्तक्षेप करे, लेकिन उल्लंघन की स्थिति में सरकार कदम उठा सकती है.” न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ”सोशल मीडिया पर इन सभी विभाजनकारी प्रवृतियों पर रोक लगानी होगी.” हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया कि उसका मतलब सेंसरशिप नहीं है.

पीठ ने नागरिकों की भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दिशानिर्देश तय करने पर विचार करते हुए कहा, ” नागरिकों के बीच भाईचारा होना चाहिए.” पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि ये पाबंदियां ‘सही ही लगायी गयी हैं.” इस बीच, पीठ ने खान को गिरफ्तारी से दिये गये अंतरिम संरक्षण को मामले की अगली सुनवाई तक बढ़ा दिया और वकील से नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के स्व-नियमन के बड़े मुद्दे से निपटने में उसकी सहायता करने को कहा.

खान को नौ जून को कोलकाता पुलिस ने गिरफ्तार किया था. उसने यह आरोप लगाते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया है कि उसके कुछ पुराने ट्वीट को लेकर असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और हरियाणा समेत कई राज्यों में उसके खिलाफ प्राथमिकी और शिकायतें दर्ज की गई हैं. उसने तर्क दिया कि ये प्राथमिकियां उसके द्वारा पनोली के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत के जवाब में दर्ज की गईं, जिसे गिरफ्तारी के बाद जमानत पर रिहा कर दिया गया है. खान की ओर से उसके वकील ने अपने मुवक्किल की ओर से कहा, ” मैंने सारे ट्वीट हटा दिये हैं और माफी भी मांग ली है. ” खान के वकील ने उसकी तरफ से कहा कि शायद ‘उसने जैसा किया, उसी का फल भुगत रहा है.’ उसके वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के हिसाब से पहली प्राथमिकी दो जून की है.

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