13 साल बाद एमबीबीएस डिग्री पाने का रास्ता साफ, डोमिसाइल विवाद में उच्च न्यायालय ने दिया आदेश

जबलपुर: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने डोमिसाइल विवाद के चलते 13 साल से एमबीबीएस की डिग्री से वंचित एक महिला के लिए चिकित्सा क्षेत्र में आगे बढ़ने का रास्ता साफ कर दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया एवं न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने बुधवार को विशेष मामले के तौर पर याचिका का निपटारा करते हुए शैलजा पांडे का दाखिला रद्द करने संबंधी 13 जून 2013 का आदेश निरस्त कर दिया।

अदालत ने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर को उनकी अंकसूची और डिग्री जारी करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि पांडे ने मध्यप्रदेश में अपने निवास से जुड़े सभी तथ्यों का सही खुलासा किया था। इस संबंध में कार्रवाई दाखिले के समय की जा सकती थी, पढ़ाई पूरी होने के बाद नहीं।

उच्च न्यायालय ने कहा कि डिग्री के आधार पर पांडे चिकित्सा क्षेत्र में काम करने की हकदार होंगी, लेकिन उन्होंने 2013 में पढ़ाई पूरी की थी और अब 13 साल से अधिक समय बीत चुका है। डिग्री और चिकित्सा नियामक के पास पंजीकरण नहीं होने के कारण वह इस दौरान चिकित्सा पेशे में काम नहीं कर सकीं।

याचिका में पांडे ने कहा था कि एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान कॉलेज ने उनके डोमिसाइल पर आपत्ति जताई, जबकि उन्होंने सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाणपत्र के आधार पर दाखिला लिया था। अदालत ने कहा कि डोमिसाइल प्रमाणपत्र जारी करने वाले प्राधिकारी को यह देखना चाहिए था कि पांडे ने मध्यप्रदेश के किसी शैक्षणिक संस्थान में कम से कम तीन वर्ष अध्ययन किया है या नहीं।

हालांकि, प्रमाणपत्र जारी करते समय इस अतिरिक्त शर्त को मुख्य आधार बनाया गया। अदालत ने कहा कि प्राधिकारी की कार्रवाई के लिए पांडे को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि डिग्री मिलने से उनकी डॉक्टर के रूप में योग्यता स्थापित होगी, लेकिन चिकित्सा सेवा देने के लिए उन्हें नियमों के तहत पंजीकरण कराना होगा।

उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को यह जांचने का निर्देश दिया कि एमबीबीएस पूरा करने के बाद लंबे अंतराल के कारण पांडे चिकित्सा पेशे के लिए उपयुक्त हैं या नहीं। जरूरत पड़ने पर आयोग चिकित्सा विश्वविद्यालय को उनकी योग्यता और चिकित्सा सेवा के लिए पात्रता तय करने के लिए विशेष परीक्षा या परीक्षण कराने का निर्देश दे सकता है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को यह प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया।

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