महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के परिणाम फैसले पर निर्भर करेंगे: न्यायालय

नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि महाराष्ट्र में 57 स्थानीय निकाय के चुनाव के अंतिम परिणाम, जहां आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा का उल्लंघन हुआ है, मामले में उसके फैसले पर निर्भर करेंगे. प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने ये टिप्पणी स्थानीय निकाय चुनाव में आरक्षण के मुद्दे पर सुनवाई 28 नवंबर को करना निर्धारित हुए की.

महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरक्षण पर 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा के अनुपालन के संबंध में राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) से परामर्श करने के लिए समय मांगा. इससे पहले 19 नवंबर को पीठ ने राज्य सरकार से कहा था कि वह स्थानीय निकाय चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया को तब तक स्थगित करने पर विचार करे जब तक कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे पर उसका फैसला नहीं आ जाता.

मंगलवार को राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने पीठ को बताया कि 242 नगर परिषदों और 42 नगर पंचायतों यानी कुल 288 निकायों के चुनाव 2 दिसंबर के लिए पहले ही अधिसूचित किए जा चुके हैं. वरिष्ठ वकील ने कहा कि इनमें से 57 निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का उल्लंघन हुआ है. इसका संज्ञान लेते हुए, पीठ ने कहा कि पहले से अधिसूचित 57 निकायों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण मौजूदा कार्यवाही के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा.

शुरुआत में, सॉलिसिटर जनरल ने राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) के साथ परामर्श के लिए समय देने हेतु स्थगन की मांग की. वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि बंठिया की सिफारिशों को मंजूरी देने वाले न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा जुलाई 2022 में दिए गए निर्देश सहित पिछले आदेशों ने भ्रम पैदा किया था. उन्होंने कहा कि राज्य के अधिकारियों ने अदालत के आदेशों की “वास्तविक व्याख्या” के तहत काम किया.

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने स्थगन का विरोध ना करते हुए पीठ को सूचित किया कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने अवमानना याचिका भी दायर की है. मौजूदा अधिसूचित आरक्षण ढांचे का समर्थन करते हुए उन्होंने दलील दी कि पहले से जारी चुनाव को नहीं रोका जाना चाहिए और इस बात पर जोर दिया कि न्यायालय ने पहले ही चुनाव प्रक्रिया को न्यायिक परिणाम के अधीन कर दिया था.
प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यदि अंतत? चुनाव अवैध पाए जाते हैं, तो न्यायालय के पास उन्हें रद्द करने का अधिकार है.

उन्होंने कहा, “यदि चुनाव कानून के विरुद्ध होते हैं, तो उन्हें रद्द किया जा सकता है.” हालांकि, विकास सिंह ने दलील दी कि इस तरह रद्द किये जाने से सार्वजनिक धन की बर्बादी होगी और उन्होंने चुनाव प्रक्रिया को रोकने पर जोर दिया. वरिष्ठ अधिवक्ता नरेंद्र हुड्डा ने 50 प्रतिशत की ऊपरी सीमा को संवैधानिक “लक्ष्मण रेखा” बताया. स्थानीय निकाय द्वारा आरक्षण सीमा का उल्लंघन करने के आंकड़ों में विसंगतियों को देखते हुए, पीठ ने राज्य निर्वाचन आयोग से एक विस्तृत सूची प्रस्तुत करने को कहा. ओबीसी आरक्षण को लेकर विवाद के कारण महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव 2021 से रुके हुए हैं.

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