राहुल गांधी की ‘खटा-खट’ योजनाओं पर सीतारमण ने कांग्रेस को घेरा

नयी दिल्ली. भाजपा नेता और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को आम चुनावों के दौरान कांग्रेस को उसकी विभिन्न योजनाओं की घोषणाओं को लेकर आड़े हाथ लिया. उन्होंने कहा कि क्या कांग्रेस को गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की महिलाओं को सालाना एक लाख रुपये देने समेत सामाजिक कल्याण योजनाओं को लागू करने की लागत के बारे में पता भी है? सीतारमण ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा है, , ”प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार के राजकोषीय प्रबंधन (विशेषकर कर्ज को लेकर) के बारे में हाल के दिनों में बहुत कुछ कहा गया है.”

उन्होंने कहा, ”कई बार, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि पर विचार किये बिना निरपेक्ष या पूर्ण आंकड़ों की तुलना की गई है. जबकि हम जीडीपी के आधार पर कर्ज की गणना करते हैं. मैं कांग्रेस के उलट एक स्पष्ट तस्वीर सामने रखना चाहूंगी. कांग्रेस ऊंचे-ऊंचे वादों के पीछे चीजों को छिपाती है जो कतई पारदर्शी नहीं हैं और वास्तविकता से कोसों दूर है.”

सीतारमण ने कहा, ”क्या कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में किये गये ऊंचे-ऊंचे वादों की लागत पर विचार किया है? क्या उन्होंने गणना की है कि ‘खटा-खट’ योजनाओं की वित्तीय लागत कितनी होगी? क्या वे उनके लिए बड़े पैमाने पर उधार लेंगे या वे इसके लिए कोष देने के लिए कर बढ़ाएंगे?” उन्होंने कहा कि आखिर राहुल गांधी ‘खटा-खट’ योजनाओं की वित्तीय लागत को पूरा करने के लिए कितनी कल्याणकारी योजनाएं बंद करेंगे? पिछले महीने कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि अगर वे चुनाव जीतते हैं तो पार्टी देश के हर गरीब परिवार की एक महिला के बैंक खाते में सालाना एक लाख रुपये डालेगी.

उन्होंने कहा, ”क्या राहुल गांधी इन सवालों का जवाब देना चाहेंगे और बताएंगे कि उनकी राजकोष के मोर्चे अधिक खर्चे वाली योजनाएं बिना कर बढ़ाये या भारी उधार लिए और अर्थव्यवस्था को गिराये बिना कैसे काम करेंगी? अच्छा यह होगा कि वह देश के लोगों के लिए इन सवालों का जवाब दें. यह उनके लिए एक चुनौती है.” वित्त मंत्री के अनुसार सच्चाई यह है कि भाजपा सरकार का राजकोषीय प्रबंधन संप्रग की तुलना में काफी बेहतर है. यह स्थिति तब है जब कोविड-19 महामारी का सामना करने के लिए राहत प्रयासों को लेकर काफी संसाधन का उपयोग किया गया था.

उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2003-04 से वित्त वर्ष 2013-14 तक संप्रग शासन के दौरान, मौजूदा मूल्य पर बा’ कर्ज (विदेशों से ऋण) सहित केंद्र सरकार का कुल ऋण लगभग 3.2 गुना बढ़ गया. यह मार्च, 2004 में 18.74 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर मार्च, 2014 में 58.59 लाख करोड़ रुपये हो गया.

उन्होंने कहा कि वहीं वित्त वर्ष 2023-24 में यह बढ़कर 172.37 लाख करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) हो गया. यानी इसमें 2.9 गुना वृद्धि हुई जो संप्रग शासन के दौरान हुई वृद्धि से कम है. वित्त वर्ष 2013-14 और वित्त वर्ष 2023-24 के बीच यह कम वृद्धि कोविड महामारी के प्रभाव के बावजूद हुई. उस दौरान राजस्व में कमी के बावजूद केंद्र ने जरूरतमंद लोगों को राहत देने के लिए उधार लिया.
केंद्र सरकार का कर्ज 2013-14 के अंत में सकल घरेलू उत्पाद का 52.2 प्रतिशत था. यह लगातार राजकोषीय मजबूती के प्रयासों से 2018-19 में कम होकर लगभग 48.9 प्रतिशत रहा.

इस अवधि के दौरान राजकोषीय घाटा देखा जाए तो यह वित्त वर्ष 2013-14 में 4.5 प्रतिशत था. यह कम होकर वित्त वर्ष 2018-19 में 3.4 प्रतिशत रहा. हालाांकि, कोविड-19 महामारी और जीवन तथा आजीविका की रक्षा के लिए सरकार के विभिन्न उपायों के कारण, 2020-21 में राजकोषीय घाटा बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद का 9.2 प्रतिशत हो गया. इससे केंद्र सरकार का कर्ज बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद का 61.4 प्रतिशत हो गया.

उन्होंने लिखा है कि मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने महामारी के बाद आर्थिक वृद्धि को बनाए रखते हुए राजकोषीय मजबूती के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया. इस रणनीति ने 2020-21 में राजकोषीय घाटे को कम करने में मदद की जो 2023-24 में जीडीपी के प्रतिशत के रूप में 5.8 प्रतिशत रहा. अंतरिम बजट में वित्त वर्ष 2024-25 में इसके घटकर 5.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है. इसी तरह, केंद्र सरकार का कर्ज-जीडीपी अनुपात 2020-21 में 61.4 प्रतिशत था. जो 2023-24 में घटकर 57.1 प्रतिशत हो गया.

सीतारमण ने कहा कि संप्रग शासन के दौरान केंद्र की शुद्ध बाजार उधारी 4.5 गुना बढ़ गई थी. कोविड-19 महामारी के बावजूद हमारी सरकार के तहत यह 2.6 गुना बढ़ी.” उन्होंने कहा, ”यह हमारी सरकार के मजबूत वित्तीय प्रबंधन को बताता है.” वित्त मंत्री ने कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के तहत वास्तविक घाटा बजटीय घाटे से कहीं अधिक था. उन्होंने कहा कि वास्तव में संप्रग सरकार ने उच्च राजकोषीय घाटे को छिपाने के लिए आंकड़े छिपाये. अगर ऐसा नहीं होता तो 2008-09 में राजकोषीय घाटा आधिकारिक आंकड़ा 6.1 प्रतिशत के बजाय 7.9 प्रतिशत होता.

सीतारमण ने कहा संप्रग सरकार ने आधिकारिक घाटे के आंकड़ों को कम रखने के लिए पेट्रोलियम विपणन कंपनियों (तेल बॉन्ड), उर्वरक कंपनियों और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को नकद सब्सिडी के बदले विशेष बॉन्ड जारी किये. उन्होंने कहा, ”वित्त वर्ष 2005-06 से वित्त वर्ष 2009-10 तक पांच साल में 1.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक की रकम बही-खातों से दूर रखी गई. इस रकम को को शामिल करने से राजकोषीय और राजस्व घाटा आंकड़ा कहीं अधिक होता.” सीतारमण ने कहा कि इतना ही नहीं संप्रग के शासन के दौरान राष्ट्रमंडल खेल, एंट्रिक्स-देवास, कोयला और दूरसंचार स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ी जैसे घोटालों के कारण सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ.

उन्होंने कहा, ”दूसरी तरफ, हमने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के क्रियान्वयन के कारण, काला-बजारी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर 3.5 लाख करोड़ रुपये बचाए हैं.” वित्त मंत्री ने कहा कि अगर दूसरे देशों से तुलना की जाए तो इससे पता चलता है कि भारत ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया है. सामान्य सरकारी-ऋण अनुपात (केंद्र एवं राज्य सरकारों का) वित्त वर्ष 2002-03 से नीचे बनाये रखा गया है.

उन्होंने कहा, ”भारत का कर्ज-जीडीपी अनुपात 2022 में 81 प्रतिशत था. यह जापान (260.1 प्रतिशत), इटली (140.5 प्रतिशत), अमेरिका (121.3 प्रतिशत), फ्रांस (111.8 प्रतिशत) और ब्रिटेन (101.9 प्रतिशत) जैसी अर्थव्यवस्थाओं से उस अवधि की तुलना में काफी कम है. इतना ही नहीं इस दौरान कई देशों को हाल के वर्षों में सरकार के स्तर पर चूक के जोखिम का भी सामना करना पड़ा है.
अधिक ऋण स्तर का सामना करने वाले देशों की संख्या 2011 में 22 थी जो 2022 में बढ़कर लगभग 60 हो गई.

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