अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी भारतीय मत्स्य पालन में ला रही है क्रांति : सरकार

नयी दिल्ली. भारतीय समुद्री मत्स्य पालन क्षेत्र पर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के परिवर्तनकारी प्रभाव को दर्शाने के लिए केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सेमिनार और प्रदर्शन आयोजित कर रहा है. यह पहल 23 अगस्त को मनाए जाने वाले राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस से पहले की गई है. मंत्रालय ने बयान में कहा कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियां पहले से ही मत्स्य प्रबंधन और विकास को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

‘सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग’ (उपग्रहीय सुदूर संवेदी) जैसी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियां संभावित मछली पकड़ने के क्षेत्रों की पहचान करने और महासागर के स्वास्थ्य की निगरानी करने के लिए ओशनसैट और इनसैट प्रणालियों का उपयोग करती हैं. पृथ्वी अवलोकन तकनीक मछली पकड़ने के काम के महत्तम परिचालन के लिए समुद्री धाराओं, तरंगों और चरम मौसम की निगरानी करने के लिए ‘इन्सेट’, ‘ओशनसैट’ और ‘सार’ उपग्रहों को नियोजित करती है.

सैटेलाइट संचार जहाजों, तटीय स्टेशनों और अनुसंधान संस्थानों के बीच वास्तविक समय के आंकड़ों के आदान-प्रदान को सुनिश्चित करता है. आंकड़ा विश्लेषण और कृत्रिम मेधा (एआई) मछली वितरण की भविष्यवाणी करने और मत्स्य प्रबंधन को अनुकूलित करने में मदद कर रहे हैं.

मंत्रालय ने बताया कि ये उन्नत प्रणालियां समुद्र में दक्षता और सुरक्षा बढ़ाती हैं, अवैध गतिविधियों का पता लगाती हैं, जल मानचित्रण का समर्थन करती हैं और आपदा चेतावनी प्रदान करती हैं. तकनीकी प्रगति को और बढ़ावा देने के लिए, सरकार ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत एक राष्ट्रीय ‘रोलआउट’ योजना को मंजूरी दी है.

इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लक्ष्य 364 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ नौ तटीय राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों में समुद्री मछली पकड़ने वाले जहाजों पर 1,00,000 ट्रांसपोंडर स्थापित करना है. भारत की 8,118 किलोमीटर की विस्तृत तटीय भूभाग, 20.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला एक विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र और प्रचुर अंतर्देशीय जल संसाधन देश के समृद्ध मत्स्य पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने और विकसित करने में इन तकनीकी हस्तक्षेपों के महत्व को रेखांकित करते हैं.

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