
नई दिल्ली: पिछले एक दशक में अमित शाह भाजपा के लिए सबसे सफल चुनावी रणनीतिकार के रूप में साबित हुए हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के लिए रणनीति बनाने से लेकर हाल ही में बिहार और अब पश्चिम बंगाल तक उनकी पहचान बनी है माइक्रो-मैनेजमेंट, बूथ स्तर की इंजीनियरिंग और डेटा-आधारित रणनीति से। शाह ने चुनावों की रणनीति को हमेशा बूथ स्तर तक जाकर आकार दिया है, जहां कुछ सौ वोटों का अंतर भी निर्णायक होता है।
बंगाल में शाह का वॉर रूम मॉडल क्या था?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बंगाल दौरा एक सामान्य चुनाव प्रचार नहीं था। वे 15 दिन बंगाल में रहे। यहां वे सिर्फ रैलियां करने के लिए नहीं, बल्कि एक पूरा वॉर रूम चलाने के लिए मौजूद थे। यह बिल्कुल वैसा ही था, जैसा उन्होंने पिछले साल बिहार चुनाव में किया था। उनके दौरे उत्तर बंगाल, जंगलमहल, सीमावर्ती जिलों और औद्योगिक पट्टियों में बारीकी से मैप किए गए थे। पार्टी ने करीब 100-120 जीतने योग्य और 80-100 प्रतिस्पर्धी सीटों की पहचान की थी और शाह का पूरा प्रचार कार्यक्रम इन्हीं सीटों के इर्द-गिर्द बुना गया था। हर जोन में रात 1-2 बजे तक संगठन की बैठकें होती थीं।
शाह के 50 से अधिक कार्यक्रमों में क्या-क्या शामिल था?
अमित शाह के बंगाल दौरे में 50 से अधिक चुनावी कार्यक्रम हुए:
30 जनसभाएं
12 रोड शो
संगठन की बैठकें
प्रेस कॉन्फ्रेंस
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद बंगाल में भाजपा की जिन सभाओं में सबसे ज्यादा भीड़ जुटी, वो सभाएं और रोड शो अमित शाह के रहे। पहले चरण के मतदान के दिन शाह खुद भाजपा के वॉर रूम में मौजूद रहे और पूरी प्रक्रिया की निगरानी की।
बूथ स्तर की रणनीति क्या थी?
शाह का सबसे बड़ा राजनीतिक नवाचार रहा है बूथ स्तर पर भारी जोर। सिर्फ बड़ी रैलियों पर निर्भर रहने की बजाय भाजपा का चुनावी ढांचा स्थानीय इकाइयों के जरिए काम करता है, जिसे पन्ना प्रमुख शैली की रणनीति कहा जाता है। पश्चिम बंगाल में यह और भी बहुस्तरीय था। भाजपा की चुनाव रणनीति बूथ स्तर पर मतदाताओं तक संपर्क करने पर केंद्रित थी और यह सब डेटा के आधार पर तय किया गया था। इस बार उम्मीदवारों की काबिलियत का एक साफ पैमाना था- हर बूथ पर 200-300 वोट जुटाने की क्षमता। भाजपा ने फिल्म अदाकारों को बड़े पैमाने पर टिकट बांटने के बजाय उम्मीदवारों की काबिलियत पर जोर दिया।
2021 की हार के बाद क्या बदला?
2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने पूरा जोर लगाया था, लेकिन 77 सीटें जीती थीं। हालांकि, यह आंकड़ा उसके पिछले प्रदर्शन से काफी बेहतर था, लेकिन यह उसे सत्ता के करीब नहीं पहुंचा सका। इसके बाद भाजपा ने अपने स्थानीय समर्थन आधार को फिर से खड़ा करने पर ध्यान दिया। अमित शाह के करीबी माने जाने वाले सुनील बंसल को प्रभारी बनाया गया और संगठन ढांचे के पुनर्निर्माण पर काम शुरू हुआ। इस बार भाजपा ने दलबदलुओं और सेलेब्रिटी उम्मीदवारों के टिकट में भारी कटौती की। जोर दिया गया उन नामों पर, जिनके पास स्थानीय स्तर पर विश्वसनीयता हो और पार्टी कैडर का समर्थन हो।
शाह के नेतृत्व में इस बार भाजपा ने नैरेटिव कैसे बदला?
इस बार ‘टोन’ में बदलाव जानबूझकर किया गया। ममता पर व्यक्तिगत हमले बंद हो गए। हिंदुत्व को अलग रूप से पेश किया गया। यहां तक कि जब हुमायूं कबीर और भाजपा के बीच कथित सौदे का एक वीडियो लीक हुआ, तब भी पार्टी ने न आक्रामक प्रतिक्रिया दी, न ममता को निशाना बनाया और न ही नेताओं और कार्यकर्ताओं को बेलगाम बयान देने दिया।
शाह ने कौन से मुद्दे उठाए?
शाह ने अपने भाषणों में कई धारदार मुद्दे उठाए। जैसे- “गुंडे घर से बाहर न आएं, वरना उन्हें उल्टा लटकाकर सीधा कर देंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि ममता दीदी ने जिन घुसपैठियों को पाला-पोसा है, उन्हें चुन-चुनकर बाहर निकालेंगे। उन्होंने 45 दिन में बॉर्डर पर फेंसिंग के लिए जमीन देने का वादा किया। बंगाल में बाबरी मस्जिद नहीं बनने देने की बात कही। महिला सुरक्षा पर उन्होंने संदेशखाली और आरजी कर कांड की बात भी उठाई। उन्होंने वादा किया कि भाजपा सरकार बनने पर रात 1 बजे भी महिलाएं आराम से घूम सकेंगी।
बूथ स्तर पर क्या निर्देश थे?
भाजपा की तरफ से साफ निर्देश था कि मतदाता सूची यानी SIR में एक भी फर्जी वोटर न बचे ताकि TMC ‘छापा वोट’ न डाल पाए। भाजपा का 100% वोट सुबह 11 बजे तक पड़ जाए। यही बूथ प्रबंधन की धुरी था। चुनाव के अंतिम दौर में अमित शाह ने एक नारा दिया जो पूरे पूर्वी भारत को एक साथ साधने की कोशिश था। यह नारा था- ‘अंग, बंग और कलिंग, तीनों में भाजपा की सरकार।’



