
चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में दशकों बाद ऐसी आंधी दिख रही है, जिसने बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। सिनेमाई पर्दे के हीरो से असल जिंदगी के राजनेता बने विजय ने राज्य की जनता के सामने एक नया और मजबूत विकल्प पेश किया। पुरानी पार्टियों के परिवारवाद, भ्रष्टाचार और घिसे-पिटे चुनावी वादों से ऊब चुके मतदाता, खासकर युवा और महिलाएं, अब विजय के रूप में एक नई उम्मीद देख रहे हैं।
49 साल की द्रविड़ सत्ता को विजय की चुनौती
तमिलनाडु की राजनीति में पिछले 49 वर्षों से केवल दो ही द्रविड़ पार्टियों, द्रमुक और अन्नाद्रमुक का दबदबा रहा है। राज्य की सत्ता हमेशा इन्हीं दोनों खेमों के बीच घूमती रही है, लेकिन अब अभिनेता से नेता बने थलापति विजय की पार्टी टीवीके ने इस दशकों पुराने एकाधिकार को सीधी और कड़ी चुनौती दी है। विजय की रैलियों में जो भीड़ दिखाई दे रही थी। वो वोट में परिवर्तित होती दिखी। 49 साल की मजबूत द्रविड़ सत्ता के सामने विजय एक बड़े तूफान की तरह खड़े हो गए हैं।
नंबरगेम में फंसा पेंच तो किस ओर जाएंगे विजय?
चुनाव के रुझानों में थलापति विजय की पार्टी टीवीके भले ही सबसे ज्यादा सीटों पर आगे चल रही है, लेकिन सियासत में जब तक जादुई आंकड़ा पार न हो जाए, तब तक कुछ भी तय नहीं माना जाता। दरअसल तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए 118 नंबर होना चाहिए। फिलहाल विजय की पार्टी 100 से 110 सीटों के आसपास आगे चल रही है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि अगर विजय अपने दम पर सरकार बनाने से चूक जाते हैं और त्रिशंकु विधानसभा की नौबत आती है, तो वह किस पार्टी का समर्थन लेंगे या किसे अपना सकते हैं।
दरअसल अपनी लगभग हर चुनावी रैली में विजय ने सत्ताधारी पार्टी द्रमुक और केंद्र में बैठी भाजपा पर जमकर निशाना साधा । उन्होंने इन दोनों पार्टियों को अपना मुख्य राजनीतिक और वैचारिक प्रतिद्वंद्वी बताया है। लेकिन, इस पूरी आक्रामक बयानबाजी के बीच एक बात जिसने सबका ध्यान खींचा, वह यह थी कि विजय ने मुख्य विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक पर हमेशा ‘हल्का हाथ’ रखा। उन्होंने अन्नाद्रमुक के खिलाफ कोई तीखा या कड़वा हमला नहीं किया। इस का फायदा अब विजय को मिल सकता है।
अगर नतीजों में नंबरगेम का पेंच फंसता है, तो संभावना है अन्नाद्रमुक और टीवीके का साथ आना सबसे स्वाभाविक कदम होगा। अन्नाद्रमुक भी यह भली-भांति जानती है कि द्रमुक को सत्ता से बेदखल करने के लिए यह सबसे सुनहरा मौका है। ऐसे में पूरी संभावना है कि अन्नाद्रमुक, अपनी सहयोगी भाजपा का साथ छोड़कर सीधे तौर पर विजय को अपना समर्थन दे दे।



