
नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल में हुए छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा चेहरा पहचान प्रौद्योगिकी और बायोमेट्रिक निगरानी के अन्य तरीकों के कथित इस्तेमाल को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए बृहस्पतिवार को अपनी सहमति दे दी।
यह याचिका केरल से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(माकपा) के राज्यसभा सदस्य ए.ए. रहीम ने दायर की है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने निर्देश दिया कि वर्तमान मामले को इस मुद्दे पर पूर्व में दाखिल याचिकाओं के साथ जोड़ दिया जाए।
राज्यसभा सदस्य रहीम की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि दो मुद्दे दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों की चेहरे की पहचान करने वाली प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल और प्राइवेट कंपनियों की ओर से आंकड़ों का प्रबंधन ंिचता का विषय है।
उन्होंने कहा, ”एक आपके चेहरे की पहचान करता है और दूसरा वाहन का। यानी चश्मे का भी इस्तेमाल होता है और वाहन का भी।
और यह सभी जानकारी बिना अनुमति ली जाती है। इन आंकड़ों का प्रबंधन प्राइवेट कंपनियों द्वारा किया जाता है, नियमों का उल्लंघन करते हुए…।” पीठ ने कहा कि इस याचिका पर मामले से जुड़ी अन्य याचिकाओं के साथ सुनवाई होगी। रहीम ने अपनी याचिका में अनुरोध किया है कि शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभाओं सार्वभौमिक तौर पर बायोमेट्रिक निगरानी के इस्तेमाल को असंवैधानिक घोषित किया जाए और जब तक संसद ऐसे उपायों को मंज़ूरी देने और उन्हें विनियमित करने के लिए कोई विशेष कानून नहीं बनाती, तब तक इस पर रोक लगाई जाए।
वकील सुभाष चंद्रन के.आर. के ज़रिए दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि दिल्ली पुलिस ने ”कानूनी अस्पष्टता’ की स्थिति में बायोमेट्रिक निगरानी की। याचिका में कहा गया कि न तो विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े दिल्ली पुलिस के कानूनी आदेश में और न ही अपराध प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम 2022, आम लोगों की सभाओं में शामिल होने वाले लोगों की बायोमेट्रिक निगरानी की इजाज़त देते हैं।
रहीम ने दावा किया है कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की बायोमेट्रिक जानकारी को स्वत: काम करने वाली प्रणाली से प्राप्त की और उसका मिलान कथित तौर पर इस राष्ट्रीय स्तर के स्थायी आपराधिक डेटाबेस के साथ किया।
इसमें आरोप लगाया गया है कि सीसीटीवी कैमरों, ड्रोन और मोबाइल कमांड-एंड-कंट्रोल गाड़ी का इस्तेमाल करके तस्वीरें और वीडियो फुटेज अंधाधुंध तरीके से एकत्र किये गए, जिससे प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और आम लोगों की लगातार बायोमेट्रिक निगरानी की गई।
याचिका में दलील दी गई कि दिल्ली पुलिस द्वारा सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए सवाल के दिये जवाब में पुष्टि हुई है कि चेहरा पहचान प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने के लिए निजता पर पड़ने वाले असर का आकलन नहीं किया गया।
रहीम ने यह भी दावा किया गया है कि पुलिस ने पहले कहा था कि चेहरा पहचान प्रौद्योगिकी (एफआरटी) का इस्तेमाल सिफऱ् लापता लोगों का पता लगाने और मृतकों की पहचान करने के लिए किया जाना था। केएस पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए, याचिका में कहा गया है कि जिस निगरानी पर सवाल उठाया गया है, वह क़ानूनी होने, राज्य के उचित मकसद और तार्किकता के संवैधानिक पैमानों पर खरी नहीं उतरती है।
याचिका में अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे बायोमेट्रिक निगरानी के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्रौद्योगिकी , डेटाबेस और वेंडर व्यवस्थाओं का खुलासा करें। साथ ही, एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे प्रभावित लोग अपनी जानकारी तक पहुंच सकें और शिकायत निवारण प्रक्रिया के ज़रिए उसे हटवाने की मांग कर सकें। इसमें निजी कंपनियों को यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है कि वे अपने पास मौजूद किसी भी बायोमेट्रिक डेटा को सुरक्षित रखें, उसके स्वामित्व में मौजूद ऐसे आंकड़े हमेशा के लिए नष्ट कर दें।



