
नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने विवादित फिल्म ‘आदिपुरुष’ के फिल्म प्रमाणपत्र को निरस्त करने के अनुरोध वाली जनहित याचिका शुक्रवार को खारिज करते हुए कहा कि किसी पाठ्य सामग्री का सिनेमाई प्रदर्शन उसकी सटीक प्रतिकृति नहीं हो सकता.
न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि फिल्म को सेंसर बोर्ड से प्रमाणपत्र मिला है और इस अदालत के लिए इसमें हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा. शीर्ष न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों पर अदालतों को सुनवाई नहीं करनी चाहिए.
पीठ ने कहा, ”हमें भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई क्यों करनी चाहिए. हर कोई अब हर बात पर संवेदनशील हो जाता है. हर बार आप उच्चतम न्यायालय आ जाते हैं. क्या हम हर बात पर सुनवाई करें? फिल्मों, किताबों के लिए इन दिनों सहिष्णुता का स्तर गिरता जा रहा है.” उच्चतम न्यायालय वकील ममता रानी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें पवित्र ग्रंथों को कथित तौर पर गलत तरह से प्रस्तुत करने के लिए फिल्म के प्रमाणपत्र को निरस्त करने का अनुरोध किया गया था.
न्यायालय ने ‘आदिपुरुष’ के खिलाफ उच्च न्यायालय में लंबित कार्यवाही पर रोक लगाई
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को विवादास्पद फिल्म “आदिपुरुष” के खिलाफ विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित कार्यवाही पर रोक लगा दी. महाकाव्य रामायण से प्रेरित ह्लआदिपुरुषह्व की उसके संवादों और बोलचाल की भाषा के उपयोग के लिए आलोचना हो रही है. न्यायमूर्ति एस.के. कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने मामले में पक्षकारों को नोटिस जारी किया.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 30 जून को फिल्म के निर्माताओं को 27 जुलाई को उसके समक्ष पेश होने का निर्देश दिया था और केंद्र सरकार से फिल्म पर अपने विचार देने के लिए एक समिति बनाने को कहा था. अदालत फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली कुलदीप तिवारी और नवीन धवन की अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.
उच्च न्यायालय ने निर्देशक ओम राउत, निर्माता भूषण कुमार और संवाद लेखक मनोज मुंतशिर को 27 जुलाई को उसके समक्ष पेश होने का आदेश दिया था. इसने केंद्र सरकार को पांच सदस्यीय समिति गठित करने का भी निर्देश दिया है जो फिल्म पर अपनी राय देगी कि क्या इसने जनता की भावनाओं को आहत किया है.
एक आदेश में उसने सरकार को फिल्म को प्रमाणपत्र देने के फैसले की समीक्षा करने का भी निर्देश दिया था. उच्च न्यायालय ने कहा था कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के अध्यक्ष अपने व्यक्तिगत हलफनामे दाखिल करेंगे और बताएंगे कि सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए फिल्म के प्रमाणन के लिए दिशानिर्देशों का पूर्ण रूप से पालन किया गया है या नहीं.



