संभल हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत रद्द की, यूपी सरकार पर ₹10 लाख की लागत

शीर्ष अदालत ने कहा कि कथित कबूलनामे के आधार पर अकेले preventive detention कायम नहीं रखी जा सकती। अदालत ने हिरासत आदेश को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत लगाई।

Author: www.navabharat.news
UPDATED: Tue, 29 Sep 2026 01:51 PM
संभल हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत रद्द की, यूपी सरकार पर ₹10 लाख की लागत

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सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई preventive detention को रद्द कर दिया है। मंगलवार को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केवल आरोपी के कथित कबूलनामे को preventive detention का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने हिरासत आदेश को गैरकानूनी मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत भी लगाई।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

शीर्ष अदालत के सामने मुख्य सवाल NSA के तहत मुल्ला अफरोज की हिरासत से जुड़ा था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने माना कि preventive detention के लिए केवल कथित confession पर निर्भर नहीं किया जा सकता। हिरासत का निर्णय लेते समय संबंधित अन्य परिस्थितियों और सामग्री पर भी विचार किया जाना आवश्यक है।

मुल्ला अफरोज की ओर से दायर मामले में NSA के तहत 13 अक्तूबर 2025 के detention order को चुनौती दी गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में उनकी याचिका खारिज कर दी थी और हिरासत आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया था।

मामला 2024 की संभल हिंसा से जुड़ा है

संभल में नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा हुई थी। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, 24 नवंबर 2024 की घटना में चार लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। घटना के बाद पुलिस ने कई मुकदमे दर्ज किए और जांच के दौरान मुल्ला अफरोज का नाम भी सामने आया।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दायर जवाब में आरोप लगाया गया था कि हिंसा के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई और अफरोज की भूमिका के आधार पर NSA के तहत preventive action लिया गया। सरकार ने अदालत को यह भी बताया था कि 13 अक्तूबर 2025 को detention order जारी किया गया था।

NSA के तहत कब हुई थी हिरासत?

न्यायिक रिकॉर्ड के मुताबिक, संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्तूबर 2025 को NSA की धारा 3(2) के तहत detention order जारी किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने 21 अक्तूबर 2025 को आदेश को मंजूरी दी। Advisory Board की कार्यवाही के बाद 28 नवंबर 2025 को हिरासत की अवधि 12 महीने के लिए पुष्टि किए जाने का उल्लेख हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में है।

मुल्ला अफरोज ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। जून 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सरकार ने क्या पक्ष रखा था?

उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में कहा था कि उपलब्ध सामग्री और पुलिस रिपोर्टों के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट ने preventive detention का फैसला लिया। सरकार ने हिंसा, सार्वजनिक व्यवस्था पर असर और अफरोज की कथित भूमिका को अपने पक्ष में आधार बनाया था। रिकॉर्ड में सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि detention order के साथ संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले में इसी preventive detention को रद्द किया गया और सरकार पर ₹10 लाख की लागत लगाई गई। रिपोर्टिंग के अनुसार अदालत ने custodial confession को अकेले detention का आधार मानने पर आपत्ति जताई।

NSA क्या है?

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, यानी National Security Act (NSA), preventive detention से संबंधित कानून है। इसका उद्देश्य कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को ऐसे संभावित कृत्यों से रोकने के लिए हिरासत में रखना है, जिन्हें कानून में निर्दिष्ट आधारों के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए प्रतिकूल माना जाता है।

Preventive detention सामान्य आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि के समान नहीं है। ऐसे मामलों में संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत हिरासत की समीक्षा और प्रतिनिधित्व के प्रावधान लागू होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुख्य बिंदु

इस मामले में शीर्ष अदालत का महत्वपूर्ण बिंदु preventive detention के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री से जुड़ा है। अदालत ने मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत को रद्द किया और उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत लगाई। यह फैसला हिरासत आदेश में इस्तेमाल सामग्री और preventive detention की कानूनी प्रक्रिया के संदर्भ में आया है।

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