गंभीर रूप से झुलसे दो बच्चों को ‘एलोग्राफ्ट’ से मिला नया जीवन

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Thu, 09 Nov 2023 08:42 PM
गंभीर रूप से झुलसे दो बच्चों को ‘एलोग्राफ्ट’ से मिला नया जीवन
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भुवनेश्वर. अखिल भारतीय आयुर्वज्ञिान संस्थान (एम्स) भुवनेश्वर द्वारा पहली बार किए गए सफल ‘एलोग्राफ्ट’ की बदौलत दो बच्चों को नया जीवन मिला है जो गंभीर रूप से झुलस गए थे. ‘एलोग्राफ्ट’ एक ऊतक है जिसे प्राप्तकर्ता के समान प्रजाति के दाता से प्रतिरोपित किया जाता है, लेकिन यह आनुवंशिक रूप से समान नहीं होता है.

यहां केसुरा क्षेत्र की छह वर्षीय श्रावणी मलिक और पुरी के सात वर्षीय सूर्यकांत जून में अलग-अलग घटनाओं में बिजली के तारों के संपर्क में आने से गंभीर रूप से झुलस गए थे. अस्पताल के एक अधिकारी ने बताया कि एक महीने के अंतराल के बाद अगस्त और सितंबर में दो बार उनका ऑपरेशन किया गया.

जून में अपनी इमारत की छत पर खेलते समय श्रावणी बिजली के तार के संपर्क में आ गई थी और उसके हाथ गंभीर रूप से झुलस गए थे. उसका यहां कैपिटल अस्पताल और फिर कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल में लंबा इलाज चला, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि उसके दोनों हाथ कटने के बाद भी उसे बचाना मुश्किल होगा.

इसके बाद उसका परिवार उसे एम्स-भुवनेश्वर के बर्न्स सेंटर में लेकर पहुंचा, जहां ‘एलोग्राफ़्ट’ किया गया और श्रावणी ठीक हो गई.
श्रावणी की मां रुनुलता मलिक ने कहा, ”कटक में डॉक्टरों ने हमसे कहा कि उसे बचाना मुश्किल है. एम्स में उसका इलाज किया गया और वह ठीक हो गई.ह्व वहीं, सूर्यकांत के चेहरे को छोड़कर उसका पूरा शरीर झुलस गया था और पुरी के जिला मुख्यालय अस्पताल के डॉक्टर उसके पूरी तरह ठीक होने का आश्वासन नहीं दे सके. उसे भी एम्स-भुवनेश्वर ले जाया गया, जहां ‘एलोग्राफ्ट’ के बाद वह ठीक हो गया.

सूर्यकांत की मां प्रतिमा स्वैन ने कहा, ह्लमैंने सारी उम्मीद खो दी थी. मैंने उसे भगवान जगन्नाथ की कृपा पर छोड़ दिया था. वह अब ठीक हो रहा है. एम्स के डॉक्टर भगवान की तरह हैं.ह्व एम्स बर्न्स सेंटर की र्निसंग प्रभारी हरप्रिया बल ने कहा, ”जलना जीवन का सबसे दर्दनाक अनुभव है. इलाज से पहले दोनों बच्चों का मनोबल बढ़ाने के लिए उन्हें पूरा भावनात्मक समर्थन दिया गया.” हरप्रिया ने कहा कि ऐसी चिकित्सीय स्थितियों में, गंभीर रूप से जले हुए रोगियों के लिए त्वचा ‘एलोग्राफ्ट’ ही एकमात्र विकल्प है, लेकिन एम्स के पास कोई त्वचा बैंक नहीं है.

उन्होंने कहा कि दोनों बच्चों के लिए इस्तेमाल की गई त्वचा एम्स में एक अन्य मरीज के इलाज के लिए मुंबई से लाई गई थी, लेकिन उस मरीज की मौत हो गई और उसके परिवार ने इसे बर्न्स सेंटर को दान कर दिया. एम्स भुवनेश्वर के कार्यकारी निदेशक आशुतोष विश्वास ने कहा, ”हमारे पास ‘ऑटोग्राफ्ट’ की सुविधा है, लेकिन ‘एलोग्राफ्ट’ पहली बार किया गया. यह एक बड़ी उपलब्धि है. हमने बच्चों की जान बचा ली.” ‘ऑटोग्राफ्ट’ प्रक्रिया में व्यक्ति के स्वयं के शरीर से ऊतक का उपयोग किया जाता है. अस्पताल के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर रंजीत साहू ने कहा कि इस सफलता से लोगों में यह संदेश जाएगा कि त्वचा दान करके ‘एलोग्राफ्ट’ किया जा सकता है.

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