बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली इसलिए अवैध नहीं, क्योंकि कर्मचारियों से परामर्श नहीं किया गया: न्यायालय

नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली की शुरुआत सभी हितधारकों के फायदे के लिए है. न्यायालय ने यह भी कहा है कि इस प्रणाली की शुरुआत को सिर्फ इसलिए अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि इसे लागू करने से पहले सरकारी कार्यालयों के कर्मचारियों से परामर्श नहीं किया गया. न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से 2015 में दायर वह अर्जी मंजूर कर ली, जिसमें उड़ीसा उच्च न्यायालय के 21 अगस्त 2014 के फैसले को चुनौती दी गई थी.

इस फैसले में कहा गया था कि बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली (बीएएस) शुरू करने वाले परिपत्र कर्मचारियों के साथ परामर्श के बिना जारी किए गए थे और ये केंद्र सरकार के कार्यालयों की स्थापना और प्रशासन से जुड़ी पूर्ण नियमावली के अनुरूप नहीं थे. शीर्ष अदालत ने 29 अक्टूबर को पारित आदेश में कहा कि ओडिशा के प्रधान महालेखाकार (ए एंड ई) कार्यालय में एक जुलाई 2013 से बीएएस लागू किया गया था और इसके लिए एक जुलाई 2013, 22 अक्टूबर 2013 और छह नवंबर 2013 को परिपत्र जारी किये गये थे.

उसने कहा, “इसलिए मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, जब बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली की शुरुआत सभी हितधारकों के फायदे के लिए है, तो केवल इस आधार पर बीएएस की शुरुआत को अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि इसे लागू करने से पहले कर्मचारियों से परामर्श नहीं किया गया.” पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और प्रधान महालेखाकार (लेखा एवं हकदारी) कार्यालय को अपने विभिन्न परिपत्रों के अनुसार बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली लागू करने की अनुमति दे दी.

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