चीन उर्वरकों, दुर्लभ मृदा खनिजों की आपूर्ति से जुड़ी भारत की चिंताओं का समाधान करने के लिए सहमत

ताइवान पर भारत के रुख में नहीं आया है कोई बदलाव

नयी दिल्ली. चीन ने भारत को उर्वरकों और दुर्लभ मृदा खनिजों की आपूर्ति से जुड़े प्रतिबंधों में ढील देने पर सहमति जताई है. आधिकारिक सूत्रों ने मंगलवार को यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि विदेश मंत्री एस जयशंकर को उनके चीनी समकक्ष वांग यी ने इस मुद्दे पर हुई प्रगति से अवगत कराया. भारत की दो दिवसीय यात्रा पर आए वांग ने सोमवार को जयशंकर के साथ अपनी वार्ता के दौरान यह आश्वासन दिया. सूत्रों ने बताया कि चीन ने भारत की तीन प्रमुख चिंताओं का समाधान करने का वादा किया है.

एक सूत्र ने कहा, ”(चीन के) विदेश मंत्री वांग यी ने विदेश मंत्री जयशंकर को आश्वासन दिया कि भारत की उर्वरकों, दुर्लभ मृदा खनिजों और सुरंग खोदने वाली मशीनों की जरूरतों को चीन पूरा करेगा.” जयशंकर ने सोमवार को बिना कोई विवरण दिए कहा था कि उन्होंने बैठक में ”विशेष चिंताओं” का उल्लेख किया, जिन्हें उन्होंने पिछले महीने अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान भी उठाया था. इस संबंध में दोनों पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.

दुर्लभ मृदा खनिजों को उच्च-स्तरीय तकनीकी उत्पादों, जैसे इले्ट्रिरक वाहन (ईवी), ड्रोन और बैटरी स्टोरेज के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. चीन वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला में एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहा है. भारत अपनी आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए दुर्लभ मृदा खनिजों की निरंतर आपूर्ति की उम्मीद कर रहा है. वैश्विक दुर्लभ मृदा खनन में चीन का लगभग 70 प्रतिशत योगदान है, जो इसे महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बनाता है.

चीन 2023 तक भारत को भारी मात्रा में उर्वरक निर्यात करता था. हालांकि, चीन ने पिछले साल कई देशों को आपूर्ति रोक दी थी. उसने जून में प्रतिबंध हटा लिए, लेकिन भारत को निर्यात फिर से शुरू करने के मानदंडों में ढील नहीं दी. ऐसा पता चला है कि चीन ने भारत को सुरंग खोदने वाली मशीनों का निर्यात बंद कर दिया है. पूर्वी लद्दाख सीमा विवाद के बाद भारत-चीन के बीच तनाव बढ. गया था और दोनों पक्ष संबंधों को सुधारने के लिए नए सिरे से प्रयास कर रहे हैं.

बैठक में अपनी शुरुआती टिप्पणियों में विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि भारत और चीन को एक कठिन दौर के बाद संबंधों को आगे बढ.ाने के लिए ”स्पष्ट और रचनात्मक” दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. जयशंकर ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास सीमावर्ती क्षेत्रों में तनाव घटाने की प्रक्रिया को आगे बढ.ाने पर भी जोर दिया. इस क्षेत्र में दोनों देशों की सेनाओं के बीच चार साल से अधिक समय तक गतिरोध बना रहा.

साल 2020 में गलवान घाटी में झड़प के बाद भारत-चीन संबंधों में गंभीर तनाव आ गया था. इसके मद्देनजर चीनी विदेश मंत्री की यात्रा को दोनों पड़ोसी देशों द्वारा संबंधों को बहाल करने प्रयासों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है. चीनी विदेश मंत्री मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ सीमा मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधि (एसआर) स्तर की वार्ता के एक नये दौर की बैठक के लिए भारत आए हैं.

मंगलवार को होने वाली विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता में दोनों पक्षों द्वारा एलएसी पर समग्र स्थिति की समीक्षा के अलावा विश्वास-बहाली के नये उपायों पर विचार-विमर्श किए जाने की उम्मीद है. दोनों पक्षों ने टकराव वाले स्थानों से सैनिकों को हटा लिया है, लेकिन उन्होंने सीमा से अग्रिम पंक्ति के सैनिकों को वापस नहीं बुलाया है. वर्तमान में, पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में एलएसी पर दोनों पक्षों के लगभग 50,000 से 60,000 सैनिक तैनात हैं.

एनएसए डोभाल ने पिछले साल दिसंबर में चीन की यात्रा की थी और वांग के साथ विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता की थी. इससे कुछ हफ्ते पहले, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने रूस के शहर कजान में एक बैठक में दोनों पक्षों के बीच विभिन्न वार्ता तंत्रों को बहाल करने का निर्णय लिया था. पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध मई 2020 में शुरू हुआ और उसी वर्ष जून में गलवान घाटी में हुई झड़प के परिणामस्वरूप द्विपक्षीय संबंधों में गंभीर तनाव पैदा हो गया.

गत वर्ष 21 अक्टूबर को हुए एक समझौते के तहत, टकराव वाले शेष दो स्थानों डेमचोक और देपसांग से सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह गतिरोध प्रभावी रूप से समाप्त हो गया. पिछले कुछ महीनों में दोनों पक्षों ने संबंधों को बहाल करने के लिए कई पहल की हैं, जिनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करना और भारत द्वारा चीनी नागरिकों को पर्यटक वीजा जारी करने की प्रक्रिया फिर से शुरू करना शामिल है.

ताइवान पर भारत के रुख में नहीं आया है कोई बदलाव

ताइवान पर भारत के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है और नयी दिल्ली के ताइवान के साथ आर्थिक, प्रौद्योगिकी और सांस्कृतिक संबंधों पर आधारित रिश्ते हैं. सरकारी सूत्रों ने मंगलवार को यह जानकारी दी. यह स्पष्टीकरण ऐसे वक्त में आया है जब चीनी मीडिया में खबरें हैं कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को अपने चीनी समकक्ष वांग यी से मुलाकात के दौरान यह पुन: पुष्टि की कि नयी दिल्ली, ताइवान को चीन का हिस्सा मानता है. ऐसी जानकारी है कि जयशंकर ने वांग के साथ वार्ता में ताइवान मुद्दे पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की.

सूत्रों ने कहा, ”ताइवान पर हमारे रुख में कोई बदलाव नहीं है.” उन्होंने कहा, ”हमने जोर दिया कि बाकी दुनिया की तरह भारत का भी ताइवान से संबंध है, जो आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक रिश्तों पर केंद्रित है. हम इसे जारी रखना चाहते हैं.” वांग के दिल्ली पहुंचने के तुरंत बाद दोनों विदेश मंत्रियों के बीच सोमवार को व्यापक बातचीत हुई थी. अतीत में भारत ने ‘एक चीन’ नीति का समर्थन किया था, लेकिन यह किसी द्विपक्षीय दस्तावेज. में शामिल नहीं है.

हालांकि, भारत और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, लेकिन द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्ते लगातार बढ़ रहे हैं.
भारत ने 1995 में ताइपे में भारत-ताइपे संघ (आईटीए) की स्थापना की थी, ताकि दोनों पक्षों के बीच संपर्क को बढ़ावा दिया जा सके और व्यापार, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को सुगम बनाया जा सके. आईटीए को सभी वाणिज्यिक और पासपोर्ट सेवाएं प्रदान करने का भी अधिकार दिया गया है. उसी वर्ष, ताइवान ने भी दिल्ली में ताइपे आर्थिक एवं सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की थी.

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