प. बंगाल सरकार ने कई जातियों का ओबीसी दर्जा रद्द करने के फैसले पर रोक लगाने का आग्रह किया

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 20 Aug 2024 09:02 PM
प. बंगाल सरकार ने कई जातियों का ओबीसी दर्जा रद्द करने के फैसले पर रोक लगाने का आग्रह किया
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नयी दिल्ली. पश्चिम बंगाल सरकार ने कई जातियों का ओबीसी दर्जा रद्द करने के कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर उसकी अपील पर मंगलवार को उच्चतम न्यायालय से तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया. उच्च न्यायालय ने सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों और राज्य सरकार द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण के लिए राज्य में कई जातियों, ज्यादातर मुस्लिम समूहों का ओबीसी दर्जा रद्द कर दिया था.

शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस मुद्दे पर 27 अगस्त को सुनवाई करेगी. राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़., न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ से कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने की जरूरत है, क्योंकि इससे नीट-यूजी (राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा-स्नातक), 2024 पास करने वाले उम्मीदवारों के दाखिले पर असर पड़ रहा है.

सिब्बल ने याचिका पर आज ही सुनवाई का अनुरोध करते हुए कहा, ”उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने की आवश्यकता है…छात्रवृत्ति का मुद्दा लंबित है और नीट के जरिये दाखिला प्रभावित होंगे.” राज्य के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग का प्रतिनिधित्व करने वाले एक वकील ने कहा कि छात्र मेडिकल कॉलेजों और अन्य संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए अपने ओबीसी दर्जे के प्रमाणीकरण को लेकर कतार में खड़े हैं. प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ”हम इस पर 27 अगस्त को सुनवाई करेंगे.” शीर्ष अदालत ने पांच अगस्त को राज्य सरकार से ओबीसी सूची में शामिल की गई नयी जातियों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन तथा सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर आंकड़े उपलब्ध कराने को कहा था.

उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की याचिका पर निजी वादियों को नोटिस जारी करते हुए, शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार से एक हलफनामा दाखिल करने को कहा था. शीर्ष अदालत ने हलफनामा में 37 जातियों को ओबीसी सूची में शामिल करने से पहले उसके और राज्य के पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा किए गए विचार-विमर्श का विवरण भी देने को कहा था. इन 37 जातियों में ज्यादातर मुस्लिम समूह हैं.

उच्च न्यायालय ने कहा था कि मुसलमानों के 77 वर्गों को पिछड़ा वर्ग के रूप में चुनना ”समग्र रूप से मुस्लिम समुदाय का अपमान है.” उच्च न्यायालय की पीठ ने कहा था कि अदालत का यह संदेह दूर नहीं हुआ कि ”उक्त समुदाय (मुसलमानों) को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए एक वस्तु के रूप में समझा गया है.” पीठ ने कहा था, ”यह उन घटनाओं की श्रृंखला से स्पष्ट है, जिसके कारण 77 वर्गों को ओबीसी के रूप में वर्गीकृत किया गया और उन्हें वोट बैंक के रूप में शामिल किया गया.” राज्य के आरक्षण अधिनियम 2012 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर उच्च न्यायालय ने कहा कि हटाए गए वर्गों के नागरिक, जो पहले से सेवा में हैं या आरक्षण का लाभ ले चुके हैं या राज्य की किसी चयन प्रक्रिया में सफल हुए हैं, उनकी सेवाएं इस आदेश से प्रभावित नहीं होंगी.

उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम, 2012 के तहत ओबीसी के रूप में आरक्षण देने के लिए चुनी गई 37 श्रेणियों को भी रद्द कर दिया.
अदालत ने ऐसे वर्गीकरण की सिफारिश करने वाली रिपोर्ट के ”अवैध” होने के कारण 77 वर्गों को रद्द कर दिया था, जबकि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा परामर्श नहीं किए जाने के कारण अन्य 37 वर्गों को ओबीसी सूची से हटा दिया गया था. पीठ ने सरकार के 11 मई, 2012 के आदेश को भी रद्द कर दिया था, जिसके तहत कई उप-वर्ग बनाए गए थे.

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