‘‘क्या भारत की मातृभाषाओं में पढ़ाई को बढ़ावा देना भगवाकरण है?’’ – केंद्रीय शिक्षा मंत्री

इंदौर. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बुधवार को इस आरोप को सिरे से खारिज किया कि भाजपा की अगुवाई वाली सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिये पढ़ाई-लिखाई का भगवाकरण कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार हिन्दी समेत सभी भारतीय जुबानों को पूरे आदर के साथ ‘‘राष्ट्रीय भाषाएं’’ मानती है और उन्हें बराबर महत्व देती है.

प्रधान ने इंदौर में संवाददाताओं से बातचीत के दौरान एक सवाल पर कहा,‘‘अपनी जिन मातृभाषाओं में देश के नागरिक बोलते-सुनते हैं, उन भाषाओं पढ़ाई-लिखाई को बढ़ावा देना क्या भगवाकरण है? क्या भारतीय शिक्षा नीति को रोजगारोन्मुखी बनाना भगवाकरण है?’’ उन्होंने किसी का नाम लिए बगैर कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर कुछ लोगों का “अपना दृष्टिकोण” है और वह उन्हें शुभेच्छाएं देते हैं. प्रधान ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देश के सभी तबकों के लोगों के सुझावों के आधार पर बनाया गया है और सब इस नीति को लेकर सहमत हैं.

शिक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि भारतीय भाषाओं को लेकर लोगों में “राजनीतिक कारणों से” भ्रम फैलाया जाता है. उन्होंने कहा, ‘‘हम भारत की सभी भाषाओं को पूरे आदर के साथ राष्ट्रीय भाषाएं मानते हैं. हिन्दी हमारी राजभाषा (सरकारी काम-काज की भाषा) और एक महत्वपूर्ण जुबान है. लेकिन मराठी, गुजराती, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, तमिल, पंजाबी, उड़िया, बंगाली, असमी और अन्य भारतीय भाषाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं. सभी भाषाएं देश को जोड़कर रखती हैं.’’

रूसी हमले के बाद यूक्रेन से स्वदेश लौटने को बाध्य भारतीय मेडिकल विद्यार्थियों की पढ़ाई अधर में अटकने के बारे में पूछे जाने पर शिक्षा मंत्री ने कहा,‘‘हम लोग भी इस विषय में ंिचतित हैं और इन विद्यार्थियों के लिए जरूर कोई रास्ता निकाला जाएगा.’’ देश में आम जरूरत की चीजों के भाव (कीमतें) लगातार बढ़ने के सवाल पर प्रधान ने महंगाई को ‘‘वैश्विक चुनौती’’ बताया. उन्होंने कहा, ‘‘दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं जब कोविड-19 का प्रकोप घटने पर पटरी पर आ रही थीं और भारत की अर्थव्यवस्था सात-आठ प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि दर हासिल करने की ओर बढ़ रही थी, उस वक्त रूस व यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ गया और खासकर आम जरूरत की चीजों की कीमतें बढ़ गईं. इस महंगाई का असर भारत पर भी पड़ा है.’’ मीडिया के साथ बातचीत से पहले, प्रधान ने “सक्षम और वैभवशाली भारत के निर्माण में नई शिक्षा नीति” विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि इस नीति में भारतीय भाषाओं में पढ़ाई-लिखाई पर खास जोर दिया गया है.

उन्होंने इंदौर के प्रबुद्ध लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘गुलामी के दौर में देश में अंग्रेजों के कारण पनपी औपनिवेशिक मानसिकता के कारण हम आजादी के बाद भी लम्बे समय तक इस मिथ्या मोह में रहे कि अगर हम अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाएंगे तो ही अभिजात्य कहलाएंगे और अंग्रेजी सीखकर विश्व के ताकतवर देश बन जाएंगे.’’ प्रधान ने भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान सरीखे विषयों की पढ़ाई भी भारत की आंचलिक भाषाओं में कराए जाने पर जोर दिया. उन्होंने हालांकि अपनी बात में जोड़ा कि सरकार को इस पर कोई आपत्ति नहीं है कि वैश्विक स्तर पर पढ़ाई, शोध-अनुसंधान या अन्य काम-काज करने के मकसद से कोई भारतीय विद्यार्थी देश में अंग्रेजी में शिक्षा लेना चाहता है.

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