
Karwa Chauth 2025: शुक्रवार 10 अक्तूबर को सुहागिनों को महापर्व करवा चौथ मनाया जाएगा। इस व्रत में सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की मनोकामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। आइए जानते हैं करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और महत्व के बारे में।
किन महिलाओं को नहीं रखना चाहिए करवा चौथ का व्रत?
गर्भवती महिलाओं को करवा चौथ का निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए
नवजात शिशु को दूध पिलाने वाली माताओं को भी यह व्रत नहीं रखना चाहिए।
जो महिलाएं किसी गंभीर शारीरिक या मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं, उन्हें यह व्रत नहीं रखना चाहिए।
मासिक धर्म के दौरान करवा चौथ का व्रत रखना उचित नहीं है, हालांकि मन से प्रार्थना कर सकते हैं।
कैसे शुरू हुई सरगी की परंपरा?: How the Sargi Tradition Started
सरगी की शुरुआत को लेकर दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं, जो इसके धार्मिक महत्व को दर्शाती हैं। पहली कथा माता पार्वती से जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब माता पार्वती ने भगवान शिव की दीर्घायु और कल्याण के लिए पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनकी सास जीवित नहीं थीं। ऐसे में उनकी मां मैना देवी ने उन्हें व्रत से पहले सरगी दी थी एक विशेष थाली जिसमें पौष्टिक और शुभ खाद्य पदार्थ थे। तभी से यह परंपरा बनी कि यदि सास जीवित न हों, तो मायके से मां भी सरगी भेज सकती हैं।
दूसरी कथा महाभारत काल से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब द्रौपदी ने पांडवों की रक्षा और दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनकी सास कुंती ने उन्हें सरगी दी थी। इस प्रसंग से यह मान्यता और भी प्रबल हो गई कि सरगी ससुराल पक्ष की ओर से दी जानी चाहिए। खासकर सास की ओर से, जो इसे आशीर्वाद और प्रेम के रूप में अपनी बहू को देती है।
क्या है सरगी का धार्मिक महत्व?
करवा चौथ के व्रत की शुरुआत जिस परंपरा से होती है, वह है सरगी। इसका मुख्य उद्देश्य शारीरिक ऊर्जा प्रदान करना है, लेकिन इससे कहीं अधिक इसका सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी है। यह सरगी सास द्वारा बहू को दी जाती है, जो आशीर्वाद और स्नेह का प्रतीक मानी जाती है। इसे ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय से पहले खाया जाता है, जिससे व्रती महिला दिनभर बिना जल और अन्न के उपवास रख सके।
धार्मिक दृष्टि से सरगी सिर्फ ऊर्जा देने वाला भोजन नहीं, बल्कि यह पति की लंबी उम्र, घर में सुख-शांति और सास-बहू के रिश्ते में प्रेम और विश्वास की डोर को मजबूत करने वाली परंपरा है। यह यह भी दर्शाता है कि कैसे हमारी परंपराएं केवल आस्था से जुड़ी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और संबंधों की बुनियाद को भी मज़बूत करती हैं।
सरगी खाने का समय ? ( Karwa Chauth Sargi Time)
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक करवा चौथ पर सरगी हमेशा ब्रह्म मुहूर्त में ग्रहण की जाती है। ऐसे में करवा चौथ के दिन यानी 10 अक्तूबर को ब्रह्म मुहूर्त सुबह लगभग 4 बजकर 35 मिनट से 5 बजकर 23 मिनट के बीच तक रहेगा। ऐसे में आप इस अवधि में सरगी खा सकती हैं।
करवा चौथ व्रत के नियम (Karwa Chauth Fast Rules)
करवा चौथ के दिन सूर्योदय से पहले ही सरगी ग्रहण करनी चाहिए।
व्रत में भूलकर भी काले रंग के वस्त्र व इस रंग की चीजों का उपयोग भी न करें।
करवा चौथ के व्रत की कथा 16 श्रृंगार और लाल जोड़े में सुननी चाहिए।
चंद्रमा देखने के बाद ही व्रत का पारण करें।
मन को शांत रखें और किसी भी तरह का नकारात्मक भाव मन में न रखें।
संध्या के समय पूजा अवश्य करें।
इस दिन तामसिक चीजों का सेवन करें।
चंद्रमा को अर्घ्य दें और सुहागिनों को क्षमतानुसार चीजें दान करें।
निर्जला उपवास रखें।
पूजा विधि
करवा चौथ के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर लें और उसके बाद सरगी ग्रहण करें।
इसके बाद पूजा मुहूर्त के समय एक साफ चौकी पर करवा माता की तस्वीर रखें।
फिर एक साफ थाली लेकर उसमें सिंदूर, दीपक, गंगाजल, अक्षत और हल्दी रखें।
इस दौरान आप थाली में फूल और गुड़ भी अवश्य रखें।
अब चौकी के पास एक नए कलश में साफ जल भरकर उसे रख दें।
अब दीप प्रज्ज्वलित करें और धूपबत्ती जला लें।
माता करवा को फल, हल्दी, अक्षत और ताजे फूल अर्पित करें।
इसके बाद करवा चौथ के व्रत की कथा सुनें और सभी बड़ों से आशीर्वाद लें।
अब चंद्रमा के निकलते ही उसे जल अर्पित करें।
इसके बाद साफ नई छलनी के माध्यम से चंद्रमा देखें और फिर उसी से पति की ओर देखें।
फिर आप पति के हाथों से व्रत का पहला जल ग्रहण करें और उनका आशीर्वाद लें।
इसके बाद सुहागिन महिलाओं को कुछ वस्त्र व अन्न दान करें और उनका आशीर्वाद लें।
अंत में व्रत का पारण करते हुए जाने अनजाने में हुई गलतियों की क्षमा मांगें।



