न बसंती न राधा, केवल दो फौजी और एक डकैत का विचार था: शोले पर जावेद अख्तर

Author: navabharat digital
UPDATED: Fri, 08 Aug 2025 02:58 PM
न बसंती न राधा, केवल दो फौजी और एक डकैत का विचार था: शोले पर जावेद अख्तर
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मुंबई: दिग्गज पटकथा लेखक जावेद अख्तर का कहना है कि ‘शोले’ की कहानी की शुरूआत में न बसंती थी और न राधा थी केवल दो पूर्व सैनिक और एक डकैत का विचार था, हालांकि इसमें कई बदलाव हुए और यह एक कालजयी फिल्म के रूप में सामने आई।

शोले फिल्म के 50 साल पूरे होने पर ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में अख्तर ने बताया कि उन्होंने शुरूआत में एक सेवानिवृत्त मेजर और दो अनुशासनहीन सिपाहियों की कहानी के बारे में सोचा था। इस फिल्म की पटकथा लेखक जोड़ी सलीम-जावेद ने लिखी थी।

अख्तर ने कहा ‘‘ यह सलीम साहब का विचार था कि एक ऐसा किरदार हो जो रिटायर्ड मेजर हो और उसके साथ दो सैनिक हों जिन्हें अनुशासनहीनता के कारण सेना से निकाला गया हो। लेकिन हम सेना को लेकर कोई छूट नहीं ले सकते थे, इसलिए बाद में तय किया गया कि एक पुलिस अफसर और दो अपराधियों पर फिल्म का तानाबाना बुना जाए।’’

उन्होंने बताया कि उस वक्त न तो बसंती और न ही राधा जैसे किरदारों की कल्पना की गई थी। उन्होंने कहा , ‘‘शुरूआत में केवल डकैत का विचार था। धीरे-धीरे कहानी बढ़ी और अन्य किरदार जुड़ते गए। तब हमें महसूस हुआ कि यह एक मल्टी-स्टारर फिल्म बन सकती है, हालांकि हमने इसे कभी भव्य फिल्म के रूप में नहीं सोचा था।’’

रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी ‘शोले’ 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई थी और इसमें अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, संजीव कुमार, अमजद खान, जया भादुरी और हेमा मालिनी सहित कई कलाकार थे। शुरूआती हफ्तों में फिल्म को धीमी प्रतिक्रिया मिली लेकिन बाद में यह ब्लॉकबस्टर साबित हुई।

अख्तर ने कहा कि सलीम-जावेद को यह अंदाजा कतई नहीं था कि वे ंिहदी सिनेमा की एक कालजयी फिल्म बना रहे हैं। उन्होंने कहा ‘‘ मुझे लगता है फिल्म का कैनवास इतना विस्तृत था कि वह खुद-ब-खुद कालातीत बन गई। इसमें बदले की भावना, मौन या मुखर प्रेम, दोस्ती, गांव की सादगी और शहरी अपराधियों की चतुराई जैसे तमाम मानवीय भावनाएं थीं। यह एक तरह से भावनाओं का मिलाजुला रूप था जो सीधे दिलों में उतरा।’’ उम्र के 80वें पड़ाव पर पहुंच चुके जावेद ने कहा कि फिल्म स्वाभाविक रूप से बनी, और इसके पीछे कोई सोची-समझी रणनीति नहीं थी।

उन्होंने कहा,‘‘ कोई भी कला जब अपने समय के साथ-साथ आगे भी प्रासंगिक बनी रहे तो वह कालजयी बन जाती है, चाहे उससे संबंधित क्षेत्र में कितने भी बदलाव क्यों न आए हों।’’ अख्तर ने बताया कि वर्ष 1975 उनके और सलीम खान के लिए निजी और पेशेवर दोनों स्तर पर निर्णायक साबित हुआ। उन्होंने कहा ‘‘ फिल्म ‘दीवार’ और ‘शोले’ की रिलीज से हमें पैसा, पहचान और नाम मिला। यह हमारे करियर का अहम साल था।’’

शोले फिल्म में सचिन पिलगांवकर (अहमद), असरानी (जेलर), ए.के. हंगल (इमाम साहब), मैक मोहन (संभा), जगदीप (सूरमा भोपाली) और विजू खोटे (कालिया) जैसे कलाकार भी थे। क्या जावेद अख्तर ‘शोले’ को आज दोबारा लिखते तो कुछ बदलते? इस पर उन्होंने कहा, ‘‘ नहीं, बिल्कुल नहीं, मैं ‘शोले’ में कुछ नहीं बदलता। मैं इसे दोबारा नहीं लिखता। हमने इसे जैसा बनाया, वैसा ही रहने देना चाहिए। मुझे खुशी है कि लोगों ने इसे सराहा और आज भी पसंद करते हैं।’’

जून में इटली के एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में ‘शोले’ का जो संस्करण प्रर्दिशत किया गया, उसमें छह मिनट का अतिरिक्त फुटेज और मूल अंत शामिल था, जिसमें ठाकुर गब्बर को मार देता है। यह प्रक्रिया फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन और सिप्पी फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा तीन वर्षों में पूरी की गई।

अख्तर ने बताया कि आपातकाल के दौरान सेंसर बोर्ड ने फिल्म का मूल अंत बदलने को कहा था, जिससे वह उस समय नाखुश और निराश थे। उन्होंने कहा ‘‘उस समय हम अंत को बदलने को लेकर दुखी थे, लेकिन हमारे पास कोई विकल्प नहीं था।’’ अगर जय और वीरू 2025 में होते तो क्या कर रहे होते? इस पर अख्तर ने जवाब दिया ‘‘बेशक, वे कॉर्पोरेट दुनिया में होते। वे इतने बदमाश हैं और कहां जाते?’’

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