
नयी दिल्ली/न्यूयॉर्क/वॉशिंगटन. भारत और अमेरिका के बीच बातचीत का रास्ता खुला है और दोनों देशों के दीर्घकालिक संबंधों को देखते हुए यह समस्या समय के साथ सुलझ जाएगी. सरकारी सूत्रों ने यह कहा. भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत अमेरिकी शुल्क बुधवार से लागू हो जोने के साथ इससे अरबों डॉलर का भारतीय निर्यात खतरे में आ जाने के बीच यह बात कही गयी है.
सूत्रों ने कहा, “निर्यातकों को इससे घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारतीय निर्यात की विविधता इस बढ़े हुए शुल्क के प्रभाव को कम कर सकती है.” उन्होंने यह भी कहा कि चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में अमेरिका को भारत का निर्यात 21.64 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 33.53 अरब डॉलर रहा है. यदि यह रुझान आगे भी कायम रहता है, तो पिछले वित्त वर्ष के 86.5 अरब डॉलर की वार्षिक निर्यात राशि को भी पार किया जा सकता है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीद जारी रखने के जुर्माने के तौर पर भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा की थी. यह शुल्क 27 अगस्त से लागू होने के साथ ही भारतीय आयात रपर कुल शुल्क बढ़कर 50 प्रतिशत हो चुका है. अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ‘फॉक्स बिजनेस’ के साथ बातचीत में भारत-अमेरिका संबंध को बेहद जटिल बताने के साथ ही उम्मीद जताई कि आखिरकार दोनों देश एक साथ आएंगे.
बेसेंट ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच व्यक्तिगत स्तर पर अच्छे संबंध हैं और यह केवल रूसी तेल का मामला नहीं है.” इस बीच, सरकार ने निर्यातकों को सुरक्षा कवच देने के लिए कई कदम उठाने के संकेत दिए हैं. सूत्रों ने कहा कि वाणिज्य मंत्रालय इस सप्ताह रसायन, रत्न-आभूषण जैसे क्षेत्रों के प्रतिनिधियों के साथ समीक्षा बैठकें आयोजित कर रहा है. इसके अतिरिक्त, बजट 2025-26 में घोषित ‘निर्यात संवर्धन मिशन’ पर तेजी से काम हो रहा है.
एक अधिकारी ने कहा, “अगले दो-तीन दिनों में वाणिज्य मंत्रालय विविध क्षेत्रों में निर्यात को बढ़ावा देने की योजनाओं पर संबंधित पक्षों से मुलाकात करेगा.” दूसरी तरफ, सरकार ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे 40 देशों में वस्त्र निर्यात को बढ़ावा देने हेतु विशेष अभियान चलाने जा रही है. ये देश मिलकर 590 अरब डॉलर से अधिक कपड़ा व परिधान का आयात करते हैं, जबकि भारत की हिस्सेदारी महज पांच-छह प्रतिशत है.
व्यापार संगठनों ने चिंता जताई है कि ये उच्च शुल्क निर्यात की लागत को बढ़ाकर विश्व बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर कर सकते हैं. इसकी वजह यह है कि बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रमुख वस्त्र निर्यातकों को कम शुल्क का लाभ मिल रहा है. परिधान निर्यात प्रोत्साहन परिषद (एईपीसी) के महासचिव मिथिलेश्वर ठाकुर ने कहा कि अमेरिका को 10.3 अरब डॉलर का निर्यात करने वाला वस्त्र क्षेत्र ट्रंप शुल्क से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला क्षेत्र है.
इसी तरह एक चमड़ा निर्यातक ने कहा कि अमेरिकी खरीदार पहले से दिए जा चुके ऑर्डर को बनाए रखने के लिए भी लगभग 20 प्रतिशत तक की छूट मांग रहे हैं. शोध संस्थान ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने आगाह करते हुए कहा कि नए अमेरिकी शुल्क से भारतीय निर्यात का 66 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित होगा. ऐसी स्थिति में वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का अमेरिका को निर्यात घटकर 49.6 अरब डॉलर तक आ जाएगा.
निर्यात संगठनों ने सरकार से ऋण चुकाने में सहुलियत, पीएलआई योजनाओं का विस्तार, शीतगृहों एवं लॉजिस्टिक ढांचे में निवेश और यूरोपीय संघ, खाड़ी देशों एवं अफ्रीका के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर तेजी से कदम उठाने की मांग रखी है. निर्यातक संगठनों के निकाय फियो ने कहा कि यह निर्यात जगत, रोजगार व वैश्विक व्यापार संबंधों को सुरक्षा प्रदान करने का समय है.
पचास प्रतिशत अमेरिकी शुल्क से झींगा, कपड़ा, रत्न-आभूषण के निर्यात पर पड़ेगा गंभीर प्रभाव
अमेरिका भेजे जाने वाले भारतीय सामान पर 50 प्रतिशत के भारी शुल्क से झींगा, कपड़ा, चमड़ा और रत्न एवं आभूषण जैसे क्षेत्रों में निर्यात और रोजगार सृजन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा. निर्यातकों ने कहा कि 25 प्रतिशत शुल्क के अलावा भारत पर 25 प्रतिशत का जुर्माना लगाने से उसके सबसे बड़े निर्यात बाजार में भारतीय उत्पादों की आवाजाही बाधित होगी.
बीते वित्त वर्ष भारत के 437.42 अरब डॉलर मूल्य के वस्तु निर्यात में अमेरिका का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा था. अमेरिका 2021-22 से भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. 2024-25 में, वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार 131.8 अरब अमेरिकी डॉलर रहा. इनमें 86.5 अरब डॉलर निर्यात और 45.3 अरब डॉलर आयात था. चमड़ा क्षेत्र के एक निर्यातक ने कहा, ”50 प्रतिशत शुल्क एक आर्थिक प्रतिबंध की तरह है. इससे इकाइयां बंद होंगी और नौकरियां कम होंगी.” कपड़ा निर्यात संवर्धन परिषद (एईपीसी) के महासचिव मिथिलेश्वर ठाकुर ने कहा कि 10.3 अरब डॉलर के निर्यात के साथ कपड़ा क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है.
उन्होंने कहा, ”उद्योग अमेरिका द्वारा घोषित 25 प्रतिशत जवाबी शुल्क को लेकर तैयार था. लेकिन, 25 प्रतिशत अतिरिक्त बोझ ने…भारतीय कपड़ा उद्योग को अमेरिकी बाजार से प्रभावी रूप से बाहर कर दिया है. इसका कारण बांग्लादेश, वियतनाम, श्रीलंका, कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे प्रमुख प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में 30-31 प्रतिशत शुल्क के नुकसान के अंतर को पाटना असंभव है.” रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) के चेयरमैन किरीट भंसाली ने कहा है कि अमेरिकी बाजार पर हमारी निर्भरता काफी ज्यादा है.
उन्होंने कहा, ”तराशे और पॉलिश किए हुए हीरों के मामले में भारत का आधा निर्यात अमेरिका को होता है. इस शुल्क वृद्धि से पूरा उद्योग ठप पड़ सकता है. इससे कारीगरों से लेकर बड़े विनिर्माताओं तक, मूल्य श्रृंखला के हर हिस्से पर भारी दबाव पड़ेगा.” भंसाली ने कहा कि तुर्की, वियतनाम और थाइलैंड जैसे प्रतिस्पर्धी अब भी काफी आगे हैं, जिससे भारत के 50 प्रतिशत शुल्क के कारण अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद अपेक्षाकृत कम प्रतिस्पर्धी हो गए हैं. उन्होंने कहा कि अगर इस असंतुलन को दूर नहीं किया गया, तो यह अमेरिका के लिए एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की दीर्घकालिक स्थिति को नुकसान पहुंचा सकता है.
हीरा क्षेत्र के एक अन्य अधिकारी ने कहा कि हीरे को तराशना और पॉलिश क्षेत्र के एक बड़ा झटका है. यह क्षेत्र गुजरात के खासकर सूरत, नवसारी, भावनगर और जसदान में लाखों लोगों को नौकरियां दे रहा है. कोलकाता स्थित एक समुद्री खाद्य निर्यातक ने कहा कि अब अमेरिकी बाजार में भारत का झींगा ‘बेहद’ महंगा हो जाएगा. इससे निर्यातकों की प्रतिस्पर्धी क्षमता प्रभावित होगी.
झींगा निर्यातक ने कहा, ”हमें पहले से ही इक्वाडोर से भारी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि वहां केवल 15 प्रतिशत शुल्क है. भारतीय झींगे पर पहले से ही 2.49 प्रतिशत डंपिंग रोधी शुल्क और 5.77 प्रतिशत प्रतिपूर्ति शुल्क लगता है. इस 50 प्रतिशत के बाद, शुल्क काफी बढ़ जाएगा.” इसी तरह, एक चमड़ा निर्यातक ने कहा कि कुछ कंपनियों के पास लगभग दो-तीन महीने के ऑर्डर हैं, लेकिन अमेरिकी कंपनियां ऑर्डर बनाए रखने के लिए लगभग 20 प्रतिशत की छूट की मांग कर रही हैं.
चमड़ा ‘फुटवियर’ निर्यातक ने कहा, ”भारत के लिए 50 प्रतिशत शुल्क को ध्यान में रखते हुए, यदि छूट को स्वीकार नहीं किया जाता है, तो ऑर्डर पूरी तरह से रोक दिए जाएंगे या रद्द कर दिए जाएंगे. इसके अलावा, यदि छूट नहीं दी जाती है, तो कोई नया ऑर्डर नहीं दिया जाएगा.” उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार करने वाली कंपनियों को अमेरिकी व्यापार में नुकसान के कारण अपने कार्यबल में 50 प्रतिशत की कमी की आशंका है.
निर्यातकों ने सरकार से भारी शुल्क से निपटने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया है. निर्यातकों के शीर्ष निकाय फियो के अध्यक्ष एस. सी. रल्हन ने निर्यातकों को राहत देने के लिए एक वर्ष की अवधि तक कर्ज के मूलधन और ब्याज के भुगतान पर मोहलत देने का आग्रह किया है. उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त, मौजूदा सीमा में 30 प्रतिशत की स्वत? वृद्धि और आपातकालीन ऋण गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) के तहत बिना किसी गारंटी के मुक्त ऋण देने पर भी विचार किया जा सकता है. इससे सरकारी खजाने पर अधिक बोझ डाले बिना इन कंपनियों पर पड़ रहे दबाव को कम करने में मदद मिलेगी.
इसके अलावा, प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाने के लिए पीएलआई योजना का विस्तार करना, बुनियादी ढांचे को बढ़ाना और कोल्ड-चेन/भंडारण परिसंपत्तियों में निवेश करने के साथ आक्रामक रूप से दूसरे देशों को निर्यात बढ़ाने के लिए यूरोपीय संघ, ओमान, चिली, पेरू, जीसीसी, अफ्रीका और अन्य लातिन अमेरिकी देशों के साथ व्यापार समझौतों (एफटीए) में तेजी लायी जानी चाहिए.
भारत पर रूसी तेल खरीद के लिए लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लागू
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रूसी तेल की खरीद के लिए भारत पर लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क बुधवार से प्रभावी हो गया. भारत पर अमेरिका द्वारा लगाया गया कुल शुल्क अब 50 प्रतिशत हो गया है. अमेरिकी गृह मंत्रालय ने सोमवार को जारी मसौदा आदेश में कहा था कि ” बढ़ा हुआ शुल्क उन भारतीय उत्पादों पर लागू होगा जिन्हें 27 अगस्त, 2025 को ‘ईस्टर्न डेलाइट टाइम’ (ईडीटी) के अनुसार रात 12 बजकर एक मिनट या उसके बाद उपभोग के लिए (देश में) लाया गया है या गोदाम से निकाला गया है. बशर्ते कि उन्हें देश में उपयोग के लिए मंजूरी दे दी गई हो या 17 सितंबर, 2025 को 12:01 बजे (ईडीटी) से पहले उपभोग के लिए गोदाम से बाहर ले जाया गया हो और आयातक ने एक विशेष ‘कोड’ घोषित करके अमेरिकी सीमा शुल्क को यह प्रमाणित किया हो.”
ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत के जवाबी शुल्क की घोषणा की थी जो सात अगस्त से लागू हो गया. अमेरिकी राष्ट्रपति ने सात अगस्त को ही रूसी कच्चे तेल की भारत द्वारा की जाने वाली खरीद के लिए भारतीय वस्तुओं पर शुल्क को दोगुना करके 50 प्रतिशत करने की घोषणा की थी लेकिन समझौते पर बातचीत के लिए 21 दिन का समय दिया था. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को जोर देकर कहा था कि वह किसानों, पशुपालकों और लघु उद्योगों के हितों से समझौता नहीं कर सकते. उन्होंने आगाह किया कि ” हम पर दबाव बढ़ सकता है लेकिन हम डटे रहेंगे.”



