उदयनिधि स्टालिन ने संस्कृत को ‘मृत भाषा’ कहा, भाजपा ने किया पलटवार

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Fri, 21 Nov 2025 09:35 PM
उदयनिधि स्टालिन ने संस्कृत को ‘मृत भाषा’ कहा, भाजपा ने किया पलटवार
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चेन्नई. तमिलनाडु के उप मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने शुक्रवार को संस्कृत को ‘एक मृत भाषा’ कहा जिस पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नेताओं को टिप्पणी करते समय अधिक जिम्मेदारी बरतनी चाहिए. द्रमुक नेता उदयनिधि एक पुस्तक विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे, जहां उन्होंने तमिल भाषा के विकास के लिए ”सिर्फ 150 करोड़ रुपये देने पर” केंद्र सरकार की आलोचना की. उन्होंने कहा कि इसके उलट, संस्कृत, जो ‘एक मृत भाषा’ है, को 2,400 करोड़ रुपये मिल रहे हैं.

उदयनिधि के शब्दों पर नाराजगी जताते हुए भाजपा नेता तमिलिसाई सुंदरराजन ने ‘पीटीआई वीडियो’ से कहा कि कोई भी किसी भी भाषा को मरा हुआ कहने का हक नहीं रखता, खासकर उस भाषा को जो आज भी पूरे देश में पूजा-पाठ और रीति-रिवाजों में इस्तेमाल होती है. उन्होंने कहा, ”एक भाषा की तारीफ करके दूसरी को नीचा दिखाने की यह सोच पूरी तरह से गलत है और नेताओं को भाषा तथा संस्कृति के बारे में बात करते समय अधिक जिम्मेदार होना चाहिए.” सुंदरराजन ने दावा किया कि तमिल में भी संस्कृत से कई चीजें शामिल की गई हैं.

राज्य के अधिकारों और वास्तविक संघीय ढांचे के लिए लड़ाई जारी रहेगी: स्टालिन

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने राष्ट्रपति संदर्भ पर उच्चतम न्यायालय के परामर्श को लेकर शुक्रवार को कहा कि राज्य के अधिकारों और वास्तविक संघीय ढांचे के लिए उनकी लड़ाई जारी रहेगी. स्टालिन का यह बयान उच्चतम न्यायालय के उस फैसले के एक दिन बाद आया है जिसमें कहा गया था कि अदालत राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति पर कोई समयसीमा नहीं थोप सकती, लेकिन राज्यपालों के पास विधेयकों को अनिश्चितकाल तक रोककर रखने की ह्लअसीम” शक्तियां भी नहीं हैं.

राष्ट्रपति द्वारा इस विषय पर परामर्श मांगे जाने पर, प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई की अगुवाई वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति वाली राय में कहा कि राज्यपालों द्वारा ह्लअनिश्चितकालीन विलंब” की सीमित न्यायिक समीक्षा का विकल्प खुला रहेगा.

शीर्ष अदालत राष्ट्रपति द्वारा राय मांगे जाने पर जवाब दे रही थी, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत न्यायालय से यह जानना चाहा था कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों से निपटने के दौरान राष्ट्रपति द्वारा विवेक का प्रयोग करने के लिए न्यायिक आदेशों द्वारा समयसीमा निर्धारित की जा सकती है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने एक बयान में कहा कि राज्यपालों के पास लंबित विधेयकों की मंजूरी के लिए समयसीमा तय करने के वास्ते संविधान में संशोधन होने तक उनका प्रयास जारी रहेगा.

उन्होंने यह भी कहा कि अदालत की यह राय तमिलनाडु बनाम राज्यपाल मामले में अप्रैल 2025 में दिए गए फैसले को प्रभावित नहीं करेगी. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने कहा कि उच्चतम न्यायालय की राय इस बात की पुष्टि करती है कि राज्य में निर्वाचित सरकार ही मुख्य भूमिका में होनी चाहिए और सत्ता के दो केंद्र नहीं हो सकते.

उन्होंने कहा कि न्यायालय की राय स्पष्ट करती है कि राज्यपाल किसी विधेयक पर फैसला लेने में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं कर सकते और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को संविधान की मर्यादाओं में रहकर ही काम करना चाहिए. मुख्यमंत्री ने कहा कि अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि राज्यपाल के पास किसी विधेयक को रद्द करने या ‘पॉकेट वीटो’ लगाने जैसा कोई चौथा विकल्प नहीं है.

उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें अदालत का रुख कर सकती हैं और राज्यपाल की जानबूझकर की गई देरी या निर्णय न लेने के लिए उन्हें जवाबदेह ठहरा सकती हैं. स्टालिन ने अहमदाबाद के सेंट जेवियर्स कॉलेज सोसाइटी बनाम गुजरात राज्य (1974) 1 एससीसी 717 (पैरा 109) मामले में नौ सदस्यीय पीठ के आदेश में हवाल दिया जिसमें कहा गया था कि यह परामर्श उतना ही प्रभावी है जितनी कानून अधिकारियों की राय होती है.

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