प्रधानमंत्री ने आदिवासियों को उनकी धार्मिक पहचान से क्यों वंचित रखा: कांग्रेस

मोदी सरकार में निजी निवेश, व्यापक उपभोग पटरी से उतरे: कांग्रेस

नयी दिल्ली. कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर झारखंड के बारे में रविवार को सवाल उठाते हुए पूछा कि उन्होंने आदिवासियों को उनकी धार्मिक पहचान से वंचित क्यों रखा और सरना कोड लागू करने से इनकार क्यों किया. कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी झारखंड में चुनावी रैलियां कर रहे हैं, इसलिए उन्हें एक भी वोट मांगने से पहले तीन सवालों के जवाब देने चाहिए.

उन्होंने ‘एक्स’ पर सवाल किया कि कोरबा-लोहरदगा और चतरा-गया रेलवे लाइन का क्या हुआ. रमेश ने कहा कि लोहरदगा और चतरा के लोग शिक्षा, रोजगार और व्यापार के अवसरों तक पहुंच में सुधार के लिए वर्षों से बेहतर रेल कनेक्टिविटी की मांग कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, ”दुर्भाग्य से, मोदी सरकार के सत्ता में आने के दस साल बाद और लोहरदगा से लगातार दो बार भाजपा सांसदों के चुने जाने के बाद भी इस संबंध में विशेष प्रगति नहीं हुई है. अक्टूबर 2022 में, रेल मंत्रालय ने चतरा-गया रेल परियोजना को मंजूरी दी लेकिन दो साल बाद भी कोई प्रगति नहीं हुई है.”

रमेश ने कहा, ”कोरबा-गुमला-लोहरदगा लाइन के लिए लोगों को और कितना इंतजार करना होगा? चतरा-गया लाइन के लिए लोगों को और कितना इंतजार करना होगा? क्या नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री इस आवश्यक परियोजना को पूरा करने के लिए कुछ कर रहे हैं?” उन्होंने सवाल किया कि वे इंजीनियरिंग कॉलेज कहां हैं जिनका प्रधानमंत्री ने 2014 में वादा किया था. रमेश ने कहा कि झारखंड में 2014 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान अपने प्रचार अभियान में प्रधानमंत्री मोदी ने राज्य में एक आईटी संस्थान और इंजीनियरिंग कॉलेजों समेत कई औद्योगिक और शैक्षिक परियोजनाओं का वादा किया था.

रमेश ने कहा, ”लेकिन अब तक केवल दो संस्थान ही स्थापित हुए हैं – एनआईईएलआईटी (राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान) रांची और केंद्रीय पेट्रोरसायन अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (सिपेट) खूंटी. इन संस्थानों के पास भी क्रमश? नौ और सात वर्षों के संचालन के बाद कोई स्थायी परिसर नहीं है. दूसरी ओर, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) नीत सरकार ने भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) रांची और एक केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसे अच्छी क्वालिटी वाले संस्थानों की स्थापना की थी.
उन्होंने सवाल किया कि प्रधानमंत्री शैक्षिक संस्थानों के वादे पूरे करने में क्यों विफल रहे जो उन्होंने दस साल पहले किए थे. प्रधानमंत्री ने आदिवासियों को उनकी धार्मिक पहचान से वंचित क्यों किया है, उन्होंने सरना कोड को मान्यता देने से क्यों इंकार किया है? उन्होंने कहा, ”झारखंड के आदिवासी समुदाय वर्षों से सरना धर्म को मानते आ रहे हैं. वे भारत में अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान को

आधिकारिक रूप से मान्यता देने की मांग कर रहे हैं. लेकिन, जनगणना के धर्म कॉलम से ‘अन्य’ विकल्प को हटाने के हालिया निर्णय ने सरना अनुयायियों के लिए दुविधा पैदा कर दिया है. उन्हें अब या तो विकल्प में मौजूद धर्मों में से किसी एक को चुनना होगा या कॉलम को ख.ाली छोड़ना होगा.” रमेश ने कहा कि भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास के 2021 तक सरना कोड लागू करने के आश्वासन के बावजूद, मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में इस मामले में कोई खास प्रगति नहीं हुई है. उन्होंने कहा कि क्या प्रधानमंत्री इस मुद्दे को संबोधित करेंगे और स्पष्ट करेंगे कि सरना कोड लागू करने को लेकर उनका क्या रुख है. झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा के लिए 13 और 20 नवंबर को चुनाव होंगे जबकि मतगणना 23 नवंबर को होगी.

मोदी सरकार में निजी निवेश, व्यापक उपभोग पटरी से उतरे: कांग्रेस

कांग्रेस ने रविवार को दावा किया कि भारत लगातार आय में स्थिरता के कारण ‘मांग संकट’ का सामना कर रहा है. मुख्य विपक्षी दल ने कहा कि संप्रग सरकार के दौरान लगातार जीडीपी वृद्धि को गति देने वाला निजी निवेश और व्यापक उपभोग का ‘दोहरा इंजन’ मोदी सरकार के पिछले दस वर्षों में ‘पटरी से उतर गया’ है.

कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने सरकार से कहा कि वह कांग्रेस के प्रस्तावों को स्वीकार करे, जिसमें ग्रामीण भारत में आय वृद्धि को गति देने के लिए मनरेगा मजदूरी को न्यूनतम 400 रुपये प्रतिदिन तक बढ.ाना, किसानों के लिए एमएसपी और ऋण माफी की गारंटी देना तथा महिलाओं के लिए मासिक आय सहायता योजना शामिल हैं. उन्होंने कहा कि समय बीतने के साथ ही भारत के घटते उपभोग की त्रासदी अधिक स्पष्ट होती जा रही है.

उन्होंने एक बयान में कहा कि पिछले सप्ताह, भारतीय उद्योग जगत के कई सीईओ ने ‘सिकुड़ते’ मध्य वर्ग पर चिंता जताई थी और अब, नाबार्ड के अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेशन सर्वेक्षण (एनएएफआईएस) 2021-22 के नए आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत के मांग संकट की वजह लगातार आय में स्थिरता है. रमेश ने सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि औसत मासिक घरेलू आय कृषि परिवारों के लिए 12,698 रुपये से 13,661 रुपये और गैर-कृषि परिवारों के लिए 11,438 रुपये है.

उन्होंने आगे कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में अनुमानित प्रति व्यक्ति आय 2,886 रुपये प्रति माह है, जो प्रतिदिन 100 रुपये से भी कम है. इसलिए ज्यादातर भारतीयों के पास बुनियादी जरूरतों के अलावा विवेकाधीन उपभोग के लिए बहुत कम पैसा है. उन्होंने दावा किया, ”लगभग हर सबूत इसी निष्कर्ष की ओर इशारा करते हैं कि औसत भारतीय आज 10 साल पहले की तुलना में कम खरीद सकता है. यह भारत की खपत में मंदी का मूल कारण है.” श्रम ब्यूरो के वेतन दर सूचकांक के आंकड़ों का हवाला देते हुए, रमेश ने कहा कि 2014 से 2023 के बीच मजदूरों की वास्तविक मजदूरी स्थिर रही और वास्तव में 2019 से 2024 के बीच इसमें गिरावट आई.

उन्होंने कृषि मंत्रालय के कृषि सांख्यिकी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कृषि मजदूरों की वास्तविक मजदूरी हर साल 6.8 प्रतिशत बढ.ी. रमेश ने कहा, ”मोदी के कार्यकाल में कृषि मजदूरों की वास्तविक मजदूरी हर साल -1.3 प्रतिशत घटी.” आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण श्रृंखला के आंकड़ों का हवाला देते हुए, रमेश ने कहा कि समय के साथ औसत वास्तविक आय 2017 से 2022 के बीच स्थिर रही है.

उन्होंने सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि ईंट भट्टों में काम करने वाले श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी 2014 से 2022 के बीच स्थिर रही या कम हो गई. उन्होंने दावा किया कि खपत में यह मंदी हमारी मध्यम अवधि और दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता को नष्ट कर रही है. रमेश ने दलील दी कि खपत में पर्याप्त वृद्धि के बिना भारत का निजी क्षेत्र नए उत्पादन में निवेश करने के लिए इच्छुक नहीं होगा.

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