सबरीमाला पर 2018 के फैसले की समीक्षा करेगी अदालत? सीजेआई सूर्यकांत की पीठ की सुनवाई शुरू

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को केरल के सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धर्मों में और धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर दी है। अदालत ने नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ का औपचारिक गठन किया है, जो 2018 के फैसले के खिलाफ दाखिल समीक्षा याचिकाओं पर विचार करेगी।

नहीं मिलेगा अतिरिक्त समय
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सबरिमला मामले में पक्षकारों के वकीलों से कहा है कि वे निर्धारित समयसीमा का सख्ती से पालन करें। पीठ ने स्पष्ट किया कि और भी कई संवेदनशील मामले लंबित हैं, इसलिए अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा। पीठ ने यह निर्देश सुनवाई के दौरान दिया और सभी पक्षों को समयबद्ध तरीके से अपने तर्क और दस्तावेज पेश करने का आदेश दिया। इससे यह संकेत मिलता है कि कोर्ट इस मामले में तेजी से फैसला सुनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे है। इसके साथ ही इसमें न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना, एम.एम. सुंदरश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ए.जी. मसिह, प्रसन्न बी. वराले, आर. महादेवन और जोयमलया बागची शामिल हैं। इस फैसले में महिलाओं को सभी आयु वर्ग के लिए सबरीमाला के भगवान अयप्पा मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। साथ ही इससे जुड़े अन्य मुद्दों पर भी चर्चा होगी, जो धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं।

सबरीमाला के अलावा अन्य धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे

सबरीमाला मामले के अलावा, शीर्ष अदालत अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित व्यापक संवैधानिक सवालों की भी जांच करेगी। इसमें मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश, अंतरधार्मिक विवाह के बाद पारसी महिलाओं का अग्नि मंदिरों में प्रवेश का अधिकार, बहिष्कृत करने की प्रथाओं की वैधता और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति की कानूनी वैधता जैसे मुद्दे शामिल हैं।

सुनवाई का विस्तृत कार्यक्रम
इससे पहले, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली पीठ ने सुनवाई के लिए एक विस्तृत कार्यक्रम तय किया था। पीठ ने स्पष्ट किया था कि मामले की स्वीकार्यता निर्णायक रूप से तय हो चुकी है। सात महत्वपूर्ण कानूनी सवालों की पहचान भी की गई है। कार्यक्रम के अनुसार, समीक्षा याचिकाओं का समर्थन करने वाले पक्षों की दलीलें 7 से 9 अप्रैल तक सुनी जाएंगी। इसके बाद, 14 से 16 अप्रैल तक विरोध करने वाले पक्षों की दलीलें पेश की जाएंगी। यदि कोई जवाबी दलीलें होती हैं, तो वे 21 अप्रैल को सुनी जाएंगी और एमिकस क्यूरी (न्यायालय का मित्र) द्वारा अंतिम दलीलें 22 अप्रैल तक पूरी होने की उम्मीद है। शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों को लिखित दलीलें पहले से दाखिल करने का निर्देश दिया था और समय-सीमा के सख्त पालन पर जोर दिया था, क्योंकि संविधान पीठ के मामले अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।

विभिन्न पक्षों के लिखित सबमिशन
सुनवाई की पूर्व संध्या पर, त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से दायर लिखित सबमिशन में शीर्ष अदालत से धर्म की समुदाय-केंद्रित समझ अपनाने का आग्रह किया गया है। बोर्ड का तर्क है कि अदालतों को आस्था-आधारित प्रथाओं की पुनर्व्याख्या करने से बचना चाहिए और आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के सिद्धांत के निरंतर अनुप्रयोग पर सवाल उठाना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि केंद्र सरकार समीक्षा याचिकाओं का समर्थन करती है।

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