इंदौर. इंदौर लोकसभा क्षेत्र में 2.18 लाख वोट (डाले गये कुल वैध मतों का 16.28 फीसद हिस्सा) हासिल करके नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाने वाला ‘नोटा’ एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन स्थानीय मतदाताओं का एक बड़ा तबका इस कीर्तिमान पर ज्यादा हैरान नहीं लगता. मतदाताओं की मानें, तो कांग्रेस के घोषित प्रत्याशी के पालाबदल के बाद ‘नोटा’ को प्रमुख विपक्षी दल के खुले समर्थन के चलते इस कीर्तिमान की संभावना के बारे में उन्हें पहले से अंदाजा था.
कांग्रेस प्रत्याशी अक्षय कांति बम ने पार्टी को तगड़ा झटका देते हुए नामांकन वापसी की आखिरी तारीख 29 अप्रैल को अपना पर्चा वापस ले लिया और वह इसके तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए थे. नतीजतन इस सीट के 72 साल के इतिहास में कांग्रेस पहली बार चुनावी दौड़ से बाहर हो गई. तब कांग्रेस ने स्थानीय मतदाताओं से अपील की कि वे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर ‘नोटा’ (उपरोक्त में से कोई नहीं) का बटन दबाकर भाजपा को सबक सिखाएं.
शहर के छावनी क्षेत्र के निवासी भुरू खान ने ”पीटीआई-भाषा” से कहा,”नोटा का रिकॉर्ड तो बनना ही था. अगर विपक्ष का कोई मजबूत उम्मीदवार मैदान में नहीं होगा, तो और भला क्या होगा?” इंदौर में ‘नोटा’ के साथ ही निवर्तमान सांसद और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार शंकर लालवानी ने भी रिकॉर्ड बनाया. लालवानी ने अपने नजदीकी प्रतिद्वंद्वी बहुजन समाज पार्टी प्रत्याशी संजय सोलंकी को 11.75 लाख वोट के विशाल अंतर से हराया और इस सीट पर भाजपा का 35 साल पुराना कब्जा बरकरार रखा. यह लोकसभा चुनाव में देश भर की 543 सीट में जीत का सबसे बड़ा अंतर है.
शहर के एक अन्य बाशिंदे महेश वर्मा ने प्रतिक्रिया दी,”लालवानी का रिकॉर्ड भी बनना ही था क्योंकि इंदौर भाजपा का गढ़ है और भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस चुनावी मैदान में थी ही नहीं.” वर्मा ने कहा कि कांग्रेस उम्मीदवार के चुनावी मैदान से हटने के बाद इस पार्टी के परंपरागत मतदाताओं ने अपना गुस्सा जाहिर किया जिससे ‘नोटा’ का भी रिकॉर्ड बन गया. स्थानीय निवासी अभिषेक अग्रवाल ने कहा कि ‘नोटा’ मतदाताओं की असहमति का अहम हथियार है.
देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने हाल में ”पीटीआई-भाषा” से कहा था कि फिलहाल ‘नोटा’ प्रतीकात्मक प्रभाव रखता है और यह किसी सीट के चुनाव परिणाम पर कोई भी असर नहीं डाल सकता. उन्होंने यह भी कहा था कि किसी सीट पर ‘नोटा” को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिलने के बाद ही मतदान के इस विकल्प को चुनाव परिणाम पर कानूनी रूप से असरदार बनाने के बारे में सोचा जा सकता है.
इस बार इंदौर लोकसभा क्षेत्र में कुल 14 उम्मीदवारों ने किस्मत आजमाई जिनमें से 13 उम्मीदवारों ने अपनी जमानत गंवा दी. ‘नोटा’ ने इन सभी 13 उम्मीदवारों को मात दे दी और ‘नोटा’ वोट हासिल करने के मामले में लालवानी के बाद दूसरे क्रम पर रहा. इंदौर में 13 पराजित उम्मीदवारों को कुल मिलाकर 1.16 लाख वोट मिले, जबकि अकेला ‘नोटा’ 2.18 लाख वोट ले गया. इंदौर में 13 मई को हुए मतदान में कुल 25.27 लाख मतदाताओं में से 61.75 प्रतिशत लोगों ने वोट डाला था और इनमें से 13.43 लाख मत वैध पाए गए. कुल वैध मतों का 16.28 फीसद हिस्सा ‘नोटा’ के खाते में गया.
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में ‘नोटा’ को बिहार की गोपालगंज सीट पर देश भर में सर्वाधिक वोट मिले थे. तब इस क्षेत्र के 51,660 मतदाताओं ने ‘नोटा’ का विकल्प चुना था और कुल मतों में से करीब पांच प्रतिशत वोट ‘नोटा’ के खाते में गए थे. इससे पहले, 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ‘नोटा’ को तमिलनाडु के नीलगिरि में 46,559 वोट मिले थे और ‘नोटा’ ने कुल डाले गए मतों का करीब पांच फीसद हिस्सा हासिल किया था. उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद ‘नोटा’ के बटन को सितंबर 2013 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में शामिल किया गया था. मतदान का यह विकल्प किसी चुनाव क्षेत्र में मतदाताओं को सभी उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार देता है.