एकल बाजारों पर निर्भरता कम करे ‘ग्लोबल साउथ’, निष्पक्ष आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना होगा: जयशंकर

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Wed, 24 Sep 2025 09:31 PM
एकल बाजारों पर निर्भरता कम करे ‘ग्लोबल साउथ’, निष्पक्ष आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना होगा: जयशंकर

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न्यूयॉर्क. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ‘ग्लोबल साउथ’ के देशों से लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण करके, निष्पक्ष आर्थिक प्रथाओं को ब­ढ़ावा देने और दक्षिण-दक्षिण व्यापार एवं प्रौद्योगिकी सहयोग को ब­ढ़ावा देकर किसी एक आपूर्तिकर्ता या बाजार पर निर्भरता कम करने का आग्रह किया है.

जयशंकर ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र से इतर समान विचारधारा वाले ‘ग्लोबल साउथ’ देशों की एक उच्च-स्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए कहा, ”हम ऐसे समय में मिल रहे हैं जब दुनिया की स्थिति सदस्य देशों के लिए ब­ढ़ती चिंता का विषय बनी हुई है.” उन्होंने कहा कि विशेष रूप से ‘ग्लोबल साउथ’ महामारी के झटकों और यूक्रेन तथा गाजा में युद्ध से लेकर चरम जलवायु घटनाओं, अस्थिर व्यापार, निवेश प्रवाह और ब्याज दरों में अनिश्चितता और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के एजेंडे में ”विनाशकारी” मंदी तक, कई चुनौतियों का सामना कर रहा है.

जयशंकर ने कहा, ”ब­ढ़ती चिंताओं और विभिन्न प्रकार के जोखिमों के मद्देनजर यह स्वाभाविक है कि ‘ग्लोबल साउथ’ समाधान के लिए बहुपक्षवाद की ओर रुख करे.” ‘ग्लोबल साउथ’ से तात्पर्य उन देशों से है जिन्हें अक्सर विकासशील, कम विकसित अथवा अविकसित राष्ट्र के रूप में जाना जाता है और ये मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया और लातिन अमेरिका में स्थित हैं. उन्होंने कहा, ”दुर्भाग्य से, वहां भी हमारे सामने एक बहुत ही निराशाजनक संभावना है”, ”बहुपक्षवाद की अवधारणा ही खतरे में है” और अंतरराष्ट्रीय संगठन या तो अप्रभावी हो गए हैं अथवा ”संसाधनों की कमी” से जूझ रहे हैं.

जयशंकर ने कहा, ”समकालीन व्यवस्था की आधारशिलाएं टूटने लगी हैं और अत्यंत आवश्यक सुधारों में देरी की कीमत आज स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है.” उन्होंने कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ को अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में समान अवसर की मांग करते हुए एकजुट मोर्चा प्रस्तुत करना होगा. जयशंकर ने कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ की आर्थिक सुरक्षा के लिए विकासशील देशों को ”लचीली, विश्वसनीय और लघु आपूर्ति श्रृंखलाएं बनानी होंगी जो किसी एक आपूर्तिकर्ता या किसी एक बाजार पर निर्भरता कम करे”.

उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को निष्पक्ष और पारदर्शी आर्थिक प्रथाओं के माध्यम से उत्पादन का ”लोकतांत्रिकीकरण” करना होगा, संतुलित और टिकाऊ आर्थिक संबंधों के लिए एक स्थिर वातावरण सुनिश्चित करना होगा, जिसमें दक्षिण-दक्षिण व्यापार और निवेश भी शामिल है और खाद्य, उर्वरक एवं ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करने वाले संघर्षों के तत्काल समाधान पर जोर देना होगा.
मंत्री ने वैश्विक साझा संसाधनों के संरक्षण पर भी जोर दिया, जिसमें समुद्री नौवहन संबंधी चिंताओं का समाधान; विकास के लिए प्रौद्योगिकी का सहयोगात्मक लाभ उठाना, विशेष रूप से एक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का निर्माण; और विभिन्न क्षेत्रों में निष्पक्ष एवं समान अवसर प्रदान करना शामिल है जो ‘ग्लोबल साउथ’ की विकासात्मक चिंताओं के साथ न्याय करता हो.

‘ग्लोबल साउथ’ वैश्विक मामलों में कैसे शामिल हो सकता है, इस संबंध में एक व्यवस्थित दृष्टिकोण की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए मंत्री ने विकासशील देशों की सामूहिक आवाज और प्रभाव को मजबूत करने के लिए पांच प्रमुख प्रस्ताव रखे. उन्होंने ”एकजुटता ब­ढ़ाने और सहयोग को प्रोत्साहित करने” के उद्देश्य से ‘ग्लोबल साउथ’ के बीच परामर्श को मजबूत करने के लिए मौजूदा मंचों का उपयोग करने के महत्व पर जोर दिया.

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ‘ग्लोबल साउथ’ देशों के बीच अधिक एकजुटता, बहुपक्षवाद के प्रति नयी प्रतिबद्धता और संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य वैश्विक संस्थाओं में सुधार के लिए सामूहिक प्रयास का आ”ान किया है. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार और ”समग्र रूप से बहुपक्षवाद” का भी आ”ान किया.

उन्होंने ”टीकों, डिजिटल क्षमताओं, शिक्षा क्षमताओं, कृषि-प्रथाओं और एसएमई (लघु एवं मध्यम उद्यम)” को प्रमुख उदाहरण बताते हुए कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ को अपने विशिष्ट गुणों, अनुभवों और उपलब्धियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाना चाहिए ताकि साथी देशों को लाभ मिल सके. वैश्विक चुनौतियों के प्रति एक समान दृष्टिकोण की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए मंत्री ने कहा कि केवल ‘ग्लोबल नॉर्थ’ के दृष्टिकोणों के साथ तालमेल बिठाने के बजाय जलवायु कार्रवाई और जलवायु न्याय जैसे क्षेत्रों में ‘ग्लोबल साउथ’ को ऐसी पहल करनी चाहिए जो उसके हितों की पूर्ति करें.

‘ग्लोबल साउथ’ की अपेक्षा ‘ग्लोबल नॉर्थ’ देश अधिक संपन्न और धनी माने जाते हैं. इसमें अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय राष्ट्रों के साथ-साथ जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान तथा ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देश भी शामिल हैं. ‘ग्लोबल नॉर्थ’ कोई भौगोलिक अवधारणा नहीं बल्कि मुख्य रूप से यह एक आर्थिक और राजनीतिक अवधारणा है.

उन्होंने उभरती प्रौद्योगिकियों, विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा में शामिल होने के महत्व पर भी जोर दिया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विकासशील देश विकसित हो रही वैश्विक व्यवस्था में पीछे न छूट जाएं. भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को लगातार बुलंद करता रहा है और यह सुनिश्चित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराता रहा है कि विकासशील देश वैश्विक एजेंडे को आकार देने में सार्थक भूमिका निभाएं.

By Yogesh Kumar Sahu