Budget 2026: क्या वित्त मंत्री सीतारमण चावल निर्यातकों को बजट में देंगी राहत? आईआरईएफ ने रखी ये मांगें

Author: navabharat digital
UPDATED: Tue, 06 Jan 2026 02:27 PM
Budget 2026: क्या वित्त मंत्री सीतारमण चावल निर्यातकों को बजट में देंगी राहत? आईआरईएफ ने रखी ये मांगें
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नई दिल्ली: भारतीय चावल निर्यातकों के संघ (आईआरईएफ) ने आने वाले केंद्रीय बजट 2026 में चावल निर्यात को मजबूत करने के लिए सरकार से कई अहम राहतों की मांग की है। फेडरेशन ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को दिए अपने सुझावों में कहा है कि अगर निर्यातकों को टैक्स में छूट, सस्ता कर्ज और ढुलाई (लॉजिस्टिक्स) में मदद मिले, तो भारतीय चावल दुनिया के बाजार में और ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकता है।

आईआरईएफ ने मांग की है कि चावल निर्यात के लिए लिए जाने वाले कर्ज पर 4 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी दी जाए। इसके अलावा, चावल को खेतों और मिलों से बंदरगाह या आईसीडी तक पहुंचाने में आने वाली लागत को कम करने के लिए सड़क और रेल भाड़े पर 3 प्रतिशत तक सरकारी मदद मिले। फेडरेशन ने यह भी कहा है कि निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों की छूट योजना (RoDTEP) के तहत निर्यातकों को जो टैक्स वापसी मिलनी होती है, उसका भुगतान समय पर किया जाना चाहिए।

भारत वैश्विक चावल व्यापार का करीब 40% हिस्सा संभालता है

फेडरेशन के अनुसार, भारत दुनिया के कुल चावल व्यापार का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। साल 2024-25 में भारत ने 170 से ज्यादा देशों को लगभग 2.01 करोड़ टन चावल का निर्यात किया। आईआरईएफ का कहना है कि चावल निर्यात से किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं, गांवों में रोजगार बनता है और देश को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा मिलती है। यही वजह है कि यह क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है।

चावल उत्पादन और निर्यात के सामने कई समस्याएं हैं

हालांकि, फेडरेशन ने यह भी बताया कि चावल उत्पादन और निर्यात के सामने कई समस्याएं हैं। कई प्रमुख धान उत्पादक इलाकों में भूजल तेजी से घट रहा है। साथ ही, सरकारी खरीद, भंडारण और परिवहन की लागत लगातार बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव से भी निर्यातकों और किसानों दोनों को नुकसान उठाना पड़ता है।

फेडरेशन के सुझाव और मांग

इन समस्याओं से निपटने के लिए आईआरईएफ ने टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की मांग की है। फेडरेशन का सुझाव है कि जो किसान और कंपनियां कम पानी में धान उगाने वाली तकनीकें अपनाएं जैसे वैकल्पिक गीलापन और सुखाने (एडब्ल्यूडी), सीधे बोए गए चावल (डीएसआर), लेजर लेवलिंग और ऊर्जा बचाने वाली मिलिंग। उन्हें टैक्स और निवेश में खास छूट दी जाए। इससे पानी की बचत होगी और खेती पर्यावरण के लिए भी बेहतर बनेगी।

इसके अलावा, आईआरएफ ने कहा है कि सामान्य किस्मों की बजाय प्रीमियम बासमती, जीआई, ऑर्गेनिक और खास गैर-बासमती चावल की खेती और निर्यात को बढ़ावा देना चाहिए। इससे किसानों को ज्यादा कीमत मिलेगी और सरकार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत खरीद का दबाव भी कम होगा।

फेडरेशन की एक बड़ी मांग उन पुराने विवादों से जुड़ी है, जो कुछ किस्मों पर 20 प्रतिशत निर्यात शुल्क लगाए जाने के बाद खड़े हुए। आईआरईएफ का कहना है कि शुल्क की गणना को लेकर अलग-अलग व्याख्याओं के कारण कई निर्यातकों पर पिछली तारीख से भारी टैक्स मांगें बन गईं। फेडरेशन ने सरकार से आग्रह किया है कि ऐसे मामलों में एक बार की माफी दी जाए, ताकि निर्यातकों को राहत मिले और अनावश्यक कानूनी विवाद खत्म हों।

इसके साथ ही, आईआरईएफ ने निर्यात से जुड़ी जांच, गुणवत्ता नियंत्रण, ट्रेसेबिलिटी और फाइनेंस गारंटी जैसी सुविधाओं को मजबूत करने की भी मांग की है। फेडरेशन का कहना है कि इससे प्रीमियम अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय चावल की साख बनी रहेगी और लंबे समय में निर्यात और किसानों दोनों को फायदा होगा।

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