नयी दिल्ली. आतंकवाद रोधी कानून गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज एक मामले में ‘न्यूजक्लिक’ के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ और मानव संसाधन विभाग के प्रमुख अमित चक्रवर्ती को पुलिस हिरासत में भेजने का निचली अदालत का आदेश शुक्रवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में सवालों के घेरे में आ गया. उच्च न्यायालय ने कहा कि मामले में कुछ गायब है क्योंकि आदेश स्पष्ट रूप से पुरकायस्थ के वकील को सुने बिना दिया गया.
पुरकायस्थ और चक्रवर्ती को तीन अक्टूबर को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया था. एक अदालत ने दोनों को 11 अक्टूबर तक पुलिस की हिरासत में भेज दिया गया था. दोनों ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया और अंतरिम राहत के रूप में तत्काल रिहाई का अनुरोध किया.
हालांकि, न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला ने कहा कि इस स्तर पर ऐसी राहत नहीं दी जा सकती क्योंकि अदालत को पुलिस के वकील को भी सुनना है. अदालत ने मामले को नौ अक्टूबर को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया. अदालत में उस दिन पहले इसी मामले पर सुनवाई होगी.
उच्च न्यायालय ने कहा, ”एकमात्र कठिनाई यह है कि आरोप ऐसी प्रकृति के नहीं लगते कि आपको तुरंत रिहा किया जा सके.” अपनी गिरफ्तारी के अलावा, दोनों ने उन्हें सात दिन की पुलिस हिरासत में भेजने के निचली अदालत के आदेश को भी चुनौती दी है और मामले में प्राथमिकी को रद्द करने का अनुरोध किया है.
उच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया और पुरकायस्थ-चक्रवर्ती की गिरफ्तारी, रिमांड आदेश को चुनौती देने और प्राथमिकी को रद्द करने के अनुरोध वाली दो याचिकाओं पर जवाब मांगा. अदालत ने पुलिस से याचिकाओं के लंबित रहने तक रिहाई के अनुरोध वाली अंतरिम अर्जियों के संबंध में भी जवाब दाखिल करने को कहा. उच्च न्यायालय ने जांच अधिकारी को सोमवार को उसके समक्ष केस डायरी प्रस्तुत करने और यह सुनिश्चित करने को कहा कि चक्रवर्ती की चिकित्सा स्थिति से समझौता नहीं किया जाए, क्योंकि वह दिव्यांग हैं.
दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अंतरिम अर्जियों का जवाब एक दिन के भीतर दाखिल किया जाएगा. उन्होंने इस मामले में निर्देश प्राप्त करने और इसे सोमवार को सूचीबद्ध करने को लेकर कुछ समय देने का अदालत से आग्रह किया.
सॉलिसिटर जनरल कहा, ”मेरे पास प्रति नहीं है. मैं इस (याचिका और अर्जियों) पर अपना जवाब दूंगा. कई तथ्य बताए गए हैं और दलील दी गई है जो मैं नहीं जानता. तथ्यात्मक रूप से भी मुझे निर्देश लेने होंगे. मेरे पास कागजात भी नहीं हैं, कृपया मामले को सोमवार को सूचीबद्ध करें.” पुरकायस्थ का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने अदालत को दस्तावेज दिखाए हैं और उनका मुवक्किल रिहाई का हकदार है क्योंकि गिरफ्तारी अवैध थी और इसके लिए कोई आधार उन्हें नहीं बताया गया था.
उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के नियमों के उल्लंघन का दावा किया, जिसमें कहा गया है कि कोई आरोपी वकील की सेवा लेने का हकदार है. सिब्बल ने कहा कि हिरासत आदेश पुरकायस्थ के वकील को सुने बिना या हिरासत अर्जी पर उनके जवाब पर विचार किए बिना दिया गया था. सिब्बल ने दलील दी, ”यह पूरी तरह से अवैध है. उनकी हिरासत जारी नहीं रखी जा सकती. उन्हें तुरंत रिहा किया जाना चाहिए.”
न्यायमूर्ति गेडेला ने मौखिक टिप्पणी में कहा, ”मिस्टर मेहता, बस एक बात बताइये. जहां तक रिमांड पर दिए गए आदेश का सवाल है, ऐसा प्रतीत होता है कि वहां कुछ गायब है क्योंकि इसमें कहा गया है कि यह सुबह छह बजे जारी किया गया था. जाहिर तौर पर उन्होंने (निचली अदालत के न्यायाधीश) वकील (आरोपी के) को नहीं सुना.” सिब्बल ने कहा कि अपनी शर्तों पर रिमांड आदेश टिकाऊ नहीं है. इस पर न्यायाधीश ने कहा, ”यही कारण है कि मैं कह रहा हूं कि हमें उन्हें सुनना होगा. लेकिन अगर मैं इसे टिकने योग्य नहीं मानता हूं, तो यह चला जाता है. सारी चीजें चल जाती हैं.”
सिब्बल ने जवाब दिया, ”तो फिर मुझे अंदर (हिरासत में) क्यों रहना चाहिए? मुझे (पुरकायस्थ को) अंतरिम राहत दीजिए. प्रथम दृष्टया अगर मेरा कोई मामला बनता है तो मुझे अंतरिम रिहाई प्रदान करें और सोमवार को इसकी सुनवाई करें, मैं फिर वापस जाऊंगा.” पुलिस ने दिल्ली में ‘न्यूजक्लिक’ के कार्यालय को सील कर दिया है. न्यूज पोर्टल पर चीन समर्थक नीतियों को बढ.ावा देने के लिए धन लेने का आरोप लगाया गया है. प्राथमिकी में आरोप लगाया है कि ”भारत की संप्रभुता में हस्तक्षेप करने” और देश के खिलाफ असंतोष पैदा करने के इरादे से चीन से बड़ी मात्रा में धन आया.
इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि पुरकायस्थ ने 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए एक समूह- ‘पीपुल्स अलायंस फॉर डेमोक्रेसी एंड सेक्युलरिज्म’ (पीएडीएस) के साथ साजिश रची. प्राथमिकी में दावा किया गया है कि ये विदेशी कोष चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचार विभाग के एक सक्रिय सदस्य नेविली रॉय सिंघम द्वारा धोखाधड़ी से लगाए गए थे.
बहस के दौरान, सिब्बल ने कहा कि तीन अक्टूबर की सुबह उनके मुवक्किल के आवास पर छापेमारी की गई और उन्हें लोधी रोड स्थित स्पेशल सेल के कार्यालय ले जाया गया. सिब्बल ने कहा कि उसी शाम करीब सात बजे पुरकायस्थ को गिरफ्तार कर लिया गया.
सिब्बल ने दावा किया कि अगले दिन उनके मुवक्किल को सुबह लगभग छह से 6:30 बजे पेशी के लिए निचली आलत के न्यायाधीश के आवास पर ले जाया गया, जहां अभियोजक और कानूनी सहायता के लिए अन्य वकील मौजूद थे, लेकिन पुरकायस्थ के परिवार के सदस्यों या वकील को सूचित नहीं किया गया था.
सिब्बल ने कहा कि पुरकायस्थ के परिवार के सदस्यों और वकील को बाद में रिमांड कार्यवाही के बारे में सूचित किया गया. सिब्बल ने कहा कि परिवार के सदस्यों ने तब आपत्ति जताई जब उन्हें बताया गया कि रिमांड आवेदन व्हाट्सऐप के माध्यम से भेजा जाएगा और वे उसी मोड का उपयोग करके अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं.
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि रिमांड आवेदन शाम लगभग 7:07 बजे पुरकायस्थ के वकील को व्हाट्सऐप संदेश के माध्यम से भेजा गया था, जिसके बाद उन्होंने (वकील) उसी नंबर पर रिमांड दिए जाने पर विस्तृत आपत्तियों वाला एक दस्तावेज भेजा. सिब्बल ने कहा कि वकील को पता चला कि पुरकायस्थ को पहले ही सात दिनों के लिए पुलिस हिरासत में भेज दिया गया था और निचली अदालत के आदेश में दर्ज है कि इस पर सुबह छह बजे हस्ताक्षर किए गए थे. सिब्बल ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि कम से कम सुबह सात बजे तक कोई रिमांड आदेश नहीं सुनाया गया था, जब याचिकाकर्ताओं के परिवार के सदस्यों को कार्यवाही से जुड़ने को कहा गया.
उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा कि आदेश में याचिकाकर्ता के वकील की टेलीफोन के माध्यम से उपस्थिति भी दर्ज है, जबकि उनसे केवल सुबह सात बजे संपर्क किया गया था और वह सुबह छह बजे उपस्थित नहीं हो सकते थे. सिब्बल ने दलील दी, ”हमारी अदालतों को क्या हो रहा है? मुझे बस यही कहना है. मुझे गिरफ़्तारी का आधार नहीं बताया गया है. अब उच्चतम न्यायालय का आदेश है कि गिरफ्तारी के आधार न केवल बताए जाने चाहिए, बल्कि उन्हें लिखित रूप में व्यक्ति को सौंपना होगा.” अदालत ने जब यह कहा कि कि रिमांड आवेदन में स्पष्ट रूप से पुलिस ने यह खुलासा नहीं किया है कि दोनों व्यक्तियों को गिरफ्तारी के आधार के बारे में सूचित किया गया था, तो सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इसमें जो दिखता है उससे कहीं अधिक है.
उच्च न्यायालय ने शीर्ष अदालत के एक हालिया आदेश का हवाला दिया जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को किसी आरोपी की गिरफ्तारी का आधार बताने का निर्देश दिया गया था. न्यायाधीश ने कहा, ”हम इसे समझते हैं, लेकिन अगर उच्चतम न्यायालय के किसी निर्देश का उल्लंघन किया गया तो….” सुबह में, सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए मामले का उल्लेख किया, जिसने इसे दिन के दौरान सूचीबद्ध करने की अनुमति दी.
एक निचली अदालत ने उच्चतम न्यायालय के 2016 के आदेश और दिल्ली उच्च न्यायालय के 2010 के आदेश का हवाला देते हुए बृहस्पतिवार को दिल्ली पुलिस को दोनों (आरोपियों) को प्राथमिकी की एक-एक प्रति प्रदान करने का निर्देश दिया था. पुलिस ने कहा कि प्राथमिकी में नामजद संदिग्धों और डेटा के विश्लेषण में सामने आए संदिग्धों के खिलाफ तीन अक्टूबर को दिल्ली में 88 और अन्य राज्यों में सात स्थानों पर छापेमारी की गई. मंगलवार को कुल 46 पत्रकारों और ‘न्यूजक्लिक’ के योगदानकर्ताओं से पूछताछ की गई और उनके मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट जब्त कर लिए गए.