हम किसी बच्चे को नहीं मार सकते, अजन्मे बच्चे एवं मां के अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी : उच्चतम न्यायालय

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Thu, 12 Oct 2023 08:46 PM
हम किसी बच्चे को नहीं मार सकते, अजन्मे बच्चे एवं मां के अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी : उच्चतम न्यायालय
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने दो बच्चों की मां को 26-सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने वाले अपने आदेश को वापस लेने की केंद्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि उसे एक अजन्मे बच्चे के अधिकारों तथा स्वास्थ्य के आधार पर उसकी मां के स्वायत्त निर्णय लेने के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा.

दो बच्चों वाली एक विवाहित महिला को 26-सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी जाए या नहीं, इस पर असमंजस का सामना करते हुए, प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने महिला के वकील से पूछा कि क्या वह (याचिकाकर्ता) चाहती है कि शीर्ष अदालत एम्स के डॉक्टरों को न्यायिक आदेश के तहत ‘जीवित और सामान्य रूप से विकसित भ्रूण’ की धड़कन रोकने के लिए कहे.

पीठ में न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे. गर्भ का चिकित्सकीय समापन (एमटीपी) अधिनियम के तहत गर्भावस्था को समाप्त करने की ऊपरी सीमा विवाहित महिलाओं और बलात्कार पीड़िताओं सहित विशेष श्रेणियों और विकलांग तथा नाबालिगों के लिए 24 सप्ताह है. पीठ ने केंद्र और महिला के वकील को उससे (याचिकाकर्ता से) गर्भावस्था को कुछ और हफ्तों तक बरकरार रखने की संभावना पर बात करने को कहा.

यह मुद्दा उस वक्त उठा जब अखिल भारतीय आयुर्वज्ञिान संस्थान (एम्स) मेडिकल बोर्ड के एक चिकित्सक ने 10 अक्टूबर को एक ई-मेल भेजा था, जिसमें कहा गया था कि इस चरण पर गर्भ समाप्त करने पर भ्रूण के जीवित रहने की प्रबल संभावना है. इससे पहले बोर्ड ने महिला की जांच की थी और छह अक्टूबर को शीर्ष अदालत के सामने रिपोर्ट प्रस्तुत की थी.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ”हम बच्चे को नहीं मार सकते.” अदालत इस नैतिक दुविधा से जूझ रही थी कि बच्चे के जन्म का आदेश दिया जाए या मां की पसंद का सम्मान किया जाए. पीठ ने कहा, ”अगर बच्चा विकृति के साथ पैदा होता है, तो कोई भी उसे गोद नहीं लेगा.” पीठ ने इसे ”कड़वा सच” करार देते हुए कहा कि भारत में लोग विकृत बच्चों को गोद लेना पसंद नहीं करते हैं और हालांकि कुछ अपवाद भी हैं, लेकिन लोग आमतौर पर ऐसा नहीं करते हैं. इसमें कहा गया है कि न्यायाधीशों का काम अधिकारों और कर्तव्यों तथा सामाजिक भलाई के बीच संतुलन बनाना है.

इससे पहले याचिकाकर्ता के वकील ने गर्भ समाप्त करने के पक्ष में जोरदार दलील दी और पूछा कि अगर एक अविवाहित गर्भवती महिला ने अदालत से संपर्क किया होता तो क्या अदालत ने यही रुख अपनाया होता, पीठ ने कहा, ”हम सर्वोच्च न्यायालय हैं.” पीठ ने कहा, ”यह किसी नाबालिग पीड़िता का मामला नहीं है, जो गर्भवती हो गई है और न ही यह उस महिला का मामला है, जो यौन हिंसा या दुर्व्यवहार की शिकार है. वह (याचिकाकर्ता) एक विवाहित महिला है. उसके दो बच्चे हैं. निश्चित रूप से, प्राथमिक सवाल जो हम आपसे पूछना चाहते थे, वह यह है कि वह 26 सप्ताह तक क्या कर रही थी? उसे पहले दो बार गर्भधारण हुआ था. वह गर्भावस्था के परिणामों को जानती है.”

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ”आप क्या चाहते हैं, हम चिकित्सकों को क्या करने के लिए बोलें? आप चाहते हैं कि हम चिकित्सकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहें कि वे भ्रूण के दिल की धड़कन रोक दें? एम्स उच्चतम न्यायालय से यह निर्देश चाहता है.” जब वकील ने ‘नहीं’ में जवाब दिया, तो पीठ ने कहा कि जब महिला ने 24 सप्ताह से अधिक समय तक इंतजार किया है, तो क्या वह कुछ और हफ्तों तक भ्रूण को बरकरार नहीं रख सकती, ताकि एक स्वस्थ बच्चे के जन्म की संभावना हो.

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि महिला अपनी समस्याओं और मानसिक स्थिति के कारण अपनी गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती है. उन्होंने कहा कि गर्भावस्था के कारण वह अपना ख्याल रखने में असमर्थ है और उसने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है तथा आत्महत्या के बारे में भी सोच रही है.

पीठ ने कहा, ”हमें अजन्मे बच्चे के अधिकारों को भी संतुलित करने की आवश्यकता है. निस्संदेह, महिला की स्वायत्तता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. उसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार है, उसे संविधान के विभिन्न प्रावधानों के तहत अधिकार है… लेकिन समान रूप से, आपको इस तथ्य से भी अवगत होना चाहिए कि आप जो कुछ भी कर रहे हैं वह अजन्मे बच्चे के अधिकारों को प्रभावित करने वाला है.” पीठ ने मामले की सुनवाई शुक्रवार सुबह 10:30 बजे तय की है.

यह मामला न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष उस वक्त आया जब बुधवार को दो न्यायाधीशों की पीठ ने महिला को 26-सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने के अपने नौ अक्टूबर के आदेश को वापस लेने की केंद्र की याचिका पर खंडित फैसला सुनाया. शीर्ष अदालत ने नौ अक्टूबर को महिला को यह ध्यान में रखते हुए गर्भ को चिकित्सीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी थी कि वह अवसाद से पीड़ित है और ‘भावनात्मक, आर्थिक और मानसिक रूप से’ तीसरे बच्चे को पालने की स्थिति में नहीं है.

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