घर के अंदर संवाद ऐसा हो जो गोरे रंग की प्राथमिकता को प्रोत्साहन न दे: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Fri, 22 Dec 2023 10:46 PM
घर के अंदर संवाद ऐसा हो जो गोरे रंग की प्राथमिकता को प्रोत्साहन न दे: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय
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बिलासपुर. छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक पारिवारिक विवाद मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि मानव जाति के सम्पूर्ण समाज को घर के अंदर हो रहे संवाद को ऐसा बनाने की जरुरत है, जो गोरे रंग की प्राथमिकता को प्रोत्साहन न दे. उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं ने बताया कि न्यायमूर्ति गौतम भादुड़ी और न्यायमूर्ति दीपक कुमार तिवारी की युगल पीठ ने एक पारिवारिक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि मानव जाति के सम्पूर्ण समाज को घर के अंदर हो रहे संवाद को ऐसा बनाने की जरुरत है, जो गोरे रंग की प्राथमिकता को प्रोत्साहन न दे.

अधिवक्ताओं ने बताया कि उच्च न्यायलय ने याचिकाकर्ता पति द्वारा पत्नी से मांगी गई तलाक की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है. उन्होंने बताया कि उच्च न्यायालय में महिला (पत्नी) की तरफ से अपना पक्ष रखते हुए कहा गया था कि उसके काले रंग की वजह से उसे प्रताड़ित किया जाता रहा है.

अधिवक्ताओं ने बताया कि बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के निवासी रेवाराम वर्मा ने उच्च न्यायालय में बलौदा बाज़ार की पारिवारिक अदालत के 30 जुलाई 2022 के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी. पारिवारिक अदालत ने वर्मा की तलाक अर्जी ़खारिज कर दी थी.

याचिकाकर्ता पति ने याचिका में कहा है कि 20 अप्रैल 2005 को उसका विवाह हुआ था जिसके बाद आजीविका की तलाश में वह हैदराबाद चला गया और वहां से छह माह बाद जब वह लौटकर आया तब उनकी पत्नी अपने मायके चली गई थी और तमाम कोशिशों के बावजूद वह वापस नहीं लौटी. पति के अनुसार उसकी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण पत्नी उनके साथ नहीं रहना चाहती थी.

पति ने दलील दी थी कि पत्नी ने उसके साथ जानबूझकर झगड़ा किया और आत्महत्या करने की धमकी दी. पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने मिट्टी तेल छिड़ककर आत्महत्या की कोशिश भी की एवं बाद में एक सामाजिक बैठक में उसे (पत्नी को) समझाया भी गया.
पत्नी का तर्क था कि पति ने उसे लगातार प्रताड़ित किया और उसे घर से बाहर निकाल दिया. उसने कहा कि वह 14 अप्रैल 2017 से अपने पैतृक गांव में रहने के लिए बाध्य थी क्योंकि त्वचा के रंग को लेकर उसे गालियां दी गई और उस पर हमला भी किया गया एवं उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया.

उसने बताया कि पति दरअसल, दोबारा शादी करना चाहता है इसलिए उसने तलाक की अर्जी दी थी. अधिवक्ताओं ने बताया कि उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद पाया कि पत्नी द्वारा दिए गए कारण अधिक तार्किक लगते हैं. इसमें कहा गया है कि पति उसे इस आधार पर छोड़ना चाहता था कि उसका रंग काला है.

न्यायालय ने इस वर्ष 22 नवंबर को अपने आदेश में कहा है कि मानव समाज में इस सोच को बदलने की जरूरत है कि गहरे रंग की त्वचा वाली महिलाएं अपेक्षाकृत कम आकर्षक और कम योग्यता वाली होती हैं. पीठ ने कहा कि त्वचा को आकर्षक और गोरा बनाने वाले अधिकांश सौन्दर्य प्रसाधन भी इसे ही लक्ष्य करते हैं जिसमें गहरे रंग वाली महिलाओं को एक कम आत्मविश्वासी और असुरक्षित व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता है.

न्यायालय ने तलाक के लिए पति की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक की डिक्री प्राप्त करने के लिए उसके द्वारा क्रूरता या परित्याग का कोई आधार नहीं बनाया गया था. न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि मानव जाति के सम्पूर्ण समाज को घर के अंदर हो रहे संवाद को ऐसा बनाने की जरूरत है, जो गोरे रंग की प्राथमिकता को प्रोत्साहन न दे.

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