‘भारत’ का अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा यह अपनी पहचान खो देगा: भागवत

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Sun, 27 Jul 2025 09:58 PM
‘भारत’ का अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा यह अपनी पहचान खो देगा: भागवत
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कोच्चि. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि ‘भारत’ का अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा यह अपनी पहचान और विश्व में इसे जो सम्मान प्राप्त है, वह खो देगा. भागवत ने कहा कि इंडिया तो ‘भारत’ है लेकिन जब हम इसके बारे में बात करते हैं, लिखते हैं या बोलते हैं तो इसे इसी रूप में रखा जाना चाहिए फिर चाहे वह सार्वजनिक रूप से हो या व्यक्तिगत रूप से. उन्होंने कहा कि “क्योंकि यह भारत है” इसलिए भारत की पहचान का सम्मान किया जाता है.

उन्होंने कहा, ” भारत एक व्यक्तिवाचक संज्ञा है. इसका अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए. यह सच है कि ‘इंडिया भारत है’. लेकिन भारत, भारत है. इसलिए बातचीत, लेखन और भाषण के दौरान फिर चाहे वह व्यक्तिगत हो या सार्वजनिक हमें भारत को भारत ही रखना चाहिए.” उन्होंने कहा, ”भारत को भारत ही रहना चाहिए. भारत की पहचान का सम्मान किया जाता है क्योंकि यह भारत है. अगर आप अपनी पहचान खो देते हैं तो चाहे आपके कितने भी अच्छे गुण क्यों न हों आपको इस दुनिया में कभी सम्मान या सुरक्षा नहीं मिलेगी. यही मूल सिद्धांत है.” उन्होंने आरएसएस से जुड़े शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन ‘ज्ञान सभा’ में यह बात कही.

अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि दुनिया ताकत की भाषा समझती है इसलिए भारत को आर्थिक दृष्टि से भी शक्तिशाली और समृद्ध बनना होगा. भागवत ने कहा कि भारत को अब ”सोने की चिड़िया” बनने की जरूरत नहीं है बल्कि अब ”शेर” बनने का समय आ गया है. उन्होंने कहा,” यह ज.रूरी है क्योंकि दुनिया ताकत को समझती है. इसलिए भारत को ताकतवर बनना होगा. उसे आर्थिक दृष्टि से भी समृद्ध बनना होगा.” उन्होंने स्पष्ट किया कि देश को दूसरों पर शासन करने के लिए नहीं,बल्कि विश्व की सहायता करने के लिए ताकतवर बनना चाहिए.

अपने भाषण में भागवत ने यह भी कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो किसी व्यक्ति को कहीं भी अपने दम पर जीवित रहने में मदद कर सके. आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि ‘भारतीय’ शिक्षा त्याग और दूसरों के लिए जीना सिखाती है और अगर कोई चीज. किसी व्यक्ति को स्वार्थी होना सिखाती है तो वह शिक्षा नहीं है. आरएसएस प्रमुख ने यह बात यहां आरएसएस से जुड़े शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन ‘ज्ञान सभा’ में कही.

उन्होंने कहा कि शिक्षा का तात्पर्य केवल स्कूल जाना भर नहीं है बल्कि घर और समाज का वातावरण भी है. इसलिए, समाज को यह भी सोचना होगा कि अगली पीढ़ी को अधिक जिम्मेदार और आत्मविश्वासी बनाने के लिए किस तरह का माहौल बनाया जाए.
इस कार्यक्रम में केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, विभिन्न शिक्षाविद और राज्य के कुछ विश्वविद्यालयों के कुलपति शामिल थे.

शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो किसी व्यक्ति को कहीं भी अपने दम पर जीवित रहने में मदद करे: भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो किसी व्यक्ति को कहीं भी अपने दम पर जीवित रहने में मदद कर सके. आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि ‘भारतीय’ शिक्षा त्याग और दूसरों के लिए जीना सिखाती है और अगर कोई चीज. किसी व्यक्ति को स्वार्थी होना सिखाती है तो वह शिक्षा नहीं है.

आरएसएस प्रमुख ने यह बात यहां आरएसएस से जुड़े शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन ‘ज्ञान सभा’ में कही. उन्होंने कहा कि दुनिया ताकत की भाषा समझती है, इसलिए भारत को आर्थिक दृष्टि से भी शक्तिशाली और समृद्ध बनना होगा.

एनईपी 2020 भारत की शिक्षा प्रणाली को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करने का पहला प्रयास: आर्लेकर

केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने रविवार को कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 देश की शिक्षा प्रणाली को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करने का पहला गंभीर प्रयास है. राज्यपाल यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन ‘ज्ञान सभा’ को संबोधित कर रहे थे. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत सहित उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए आर्लेकर ने यह भी कहा कि विकसित भारत केवल एक आर्थिक अवधारणा नहीं है, बल्कि ”समाज का समग्र विकास है.”

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