न्यायालय का भूपेश बघेल की PMLA संबंधी याचिका पर सुनवाई से इनकार

नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि ”खराबी कानून में नहीं है” बल्कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों के ”दुरुपयोग” में है. न्यायालय ने इसी के साथ धनशोधन मामलों में प्रवर्तन निदेशालय को पूरक आरोपपत्र दाखिल करने का अधिकार देने वाले पीएमएलए प्रावधान को चुनौती देने वाली छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया.

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने पीएमएलए की धारा 44 की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करने से इनकार करते हुए कहा कि सत्य की खोज में सबूतों को उजागर करने पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता. धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारियों को पूरक आरोपपत्र दायर करने का अधिकार देता है.

शीर्ष अदालत ने हालांकि कहा कि अगर बघेल को लगता है कि छत्तीसगढ़ में कई मामलों की जांच कर रहे ईडी अधिकारी शीर्ष अदालत के 2022 के फैसले में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं तो वह उच्च न्यायालय का रुख कर सकते हैं. न्यायमूर्ति बागची ने ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू से कहा कि 1898 में दंड प्रक्रिया संहिता के मूल स्वरूप में आगे की जांच की परिकल्पना नहीं की गई थी, बल्कि अंतरिम पुलिस रिपोर्ट की बाध्यता से निपटने के लिए 1973 में इसकी परिकल्पना की गई.

न्यायमूर्ति बागची ने राजू से कहा, ”ख.राबी कानून में नहीं है. मुश्किल इसके दुरुपयोग में है. नयी संहिता (1973) में संशोधन को बीएनएसएस में भी लागू किया गया है. न्यायिक निगरानी की जरूरत इसलिए आ रही है क्योंकि सीआरपीसी की धारा 173(8) यह सुनिश्चित करने के लिए लाई गई थी कि जांच एक अंतिम रिपोर्ट या पुलिस रिपोर्ट के साथ समाप्त हो. इस अंतरिम पुलिस रिपोर्ट की कभी कल्पना भी नहीं की गई थी. अंतरिम पुलिस रिपोर्ट के दुरुपयोग से बचने के लिए सीआरपीसी की धारा 173(8) लाई गई. अब हो यह रहा है कि यह दुरुपयोग को रोक नहीं पा रही है. इस दुरुपयोग को देखा जाना चाहिए.” पीठ ने बघेल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से कहा कि ईडी द्वारा पूरक आरोपपत्र दाखिल किए जाने में कुछ भी अवैध या गलत नहीं है, क्योंकि आगे की जांच से आरोपियों को भी मदद मिल सकती है.

इसने कहा, ”तो आपका मामला यह है कि प्रावधान का दुरुपयोग किया जा रहा है. शक्ति का यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि आप अनधिकृत कार्रवाई में लिप्त होंगे. यदि शक्ति का प्रयोग कानून या प्रावधान के तहत सख्ती से किया जाता है, तो यह आरोपी के पक्ष में भी हो सकता है… आरोपी निर्दोष है या नहीं, यह पता लगाने के लिए शिकायत की आगे जांच क्यों नहीं की जा सकती?” पीठ ने सिब्बल से कहा, ”यह कोई अपराध में संलिप्तता इंगित करने वाला तथ्य हो सकता है या कोई दोषमुक्त करने वाला तथ्य भी हो सकता है. अगर आप देखें तो इस तरह से जांच का किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने या पुलिस रिपोर्ट दर्ज न करने से कोई लेना-देना नहीं है.”

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि कानून वास्तव में कहता है कि यह जांच एजेंसियों को न्याय के लिए तथ्य सामने लाने और सच्चाई को उजागर करने के लिए ”कोई शक्ति प्रदान नहीं कर रहा है, बल्कि एक अवशिष्ट शक्ति को मान्यता दे रहा है”. ये मामले छत्तीसगढ़ में कथित शराब घोटाले और अन्य मामलों से संबंधित हैं. न्यायालय ने चार अगस्त को बघेल और उनके बेटे चैतन्य से पूछा था कि उसे प्राथमिकी, गिरफ्तारी और हिरासत तथा पीएमएलए प्रावधानों के खिलाफ उनकी याचिकाओं पर विचार क्यों करना चाहिए.

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और ईडी सहित जांच एजेंसियां कोयला घोटाला, शराब घोटाला, महादेव सट्टेबाजी ऐप मामले, चावल मिल मामले और डीएमएफ घोटाला मामलों सहित कई मामलों की जांच कर रही हैं, जो कथित तौर पर भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान हुए थे. जुलाई में, चैतन्य को कथित छत्तीसगढ़ शराब घोटाले से संबंधित धनशोधन मामले में गिरफ्तार किया गया था.

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