
नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने कुछ लोगों द्वारा अपने निहित स्वार्थों के लिए न्यायिक प्रणाली के दुरुपयोग की हालिया प्रवृत्ति की निंदा करते हुए सोमवार को कहा कि आपराधिक कानून व्यक्तिगत दुश्मनी निपटाने के लिए प्रतिशोधात्मक कार्यवाही का मंच नहीं बन सकता.
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने गुवाहाटी के एक व्यवसायी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले को खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं. पीठ ने कहा कि हाल के वर्षों में कुछ लोग अपने निहित स्वार्थों और अपने अप्रत्यक्ष उद्देश्यों एवं एजेंडा को पूरा करने के लिए आपराधिक न्याय तंत्र का दुरुपयोग कर रहे हैं.
शीर्ष अदालत ने कहा, ”अदालतों को ऐसी प्रवृत्तियों के प्रति सतर्क रहना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे समाज के ताने-बाने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले चूक और अपराध के कृत्यों को शुरू में ही रोक दिया जाए.” शीर्ष अदालत ने शिकायत और साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए कहा कि व्यवसायी इंदर चंद बागड़ी के विरुद्ध धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात का पुख्ता मामला नहीं बनाया जा सका है और शिकायतकर्ता जगदीश प्रसाद बागड़ी के पास विवादित संपत्ति के विक्रय विलेख को रद्द करने एवं अपने संविदात्मक अधिकारों के उल्लंघन के लिए हर्जाना मांगने के वास्ते दीवानी कानून के तहत अन्य उपाय मौजूद हैं.
पीठ ने कहा, ”आपराधिक कानून को व्यक्तिगत रंजिश और प्रतिशोध की भावना से प्रतिशोधात्मक कार्यवाही शुरू करने का मंच नहीं बनना चाहिए.” न्यायालय ने यह भी कहा कि इंदर चंद बागड़ी को किसी भी प्रकार की आपराधिक मंशा का दोषी नहीं ठहराया जा सकता और इसलिए, अभियोजन पक्ष द्वारा उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप टिकने योग्य नहीं हैं. पीठ ने ”हरियाणा बनाम भजन लाल” मामले में 1992 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत का मानना है कि इंद्र चंद बागड़ी के खिलाफ आपराधिक इरादे और अन्य आरोप दुर्भावनापूर्ण इरादे से लगाए गए हैं और वर्तमान अभियोजन को जारी रखने की अनुमति देना न तो समीचीन है और न ही न्याय के हित में है.
आपराधिक न्याय तंत्र के दुरुपयोग की निंदा की जानी चाहिए: उच्चतम न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने असफल या टूटे रिश्तों को बलात्कार जैसे अपराध का रंग देने की ‘चिंतनीय पहलू’ की ओर इशारा करते हुए सोमवार को कहा कि इस संबंध में आपराधिक न्याय तंत्र का दुरुपयोग चिंता का विषय है और इसकी निंदा की जानी चाहिए. शीर्ष अदालत ने एक कथित बलात्कार मामले में दर्ज प्राथमिकी निरस्त करते हुए कहा कि हर खराब रिश्ते को बलात्कार के अपराध में बदलना न केवल अपराध की गंभीरता को कम करता है, बल्कि आरोपी के दामन को कलंकित करता है और उसके साथ गंभीर अन्याय करता है.
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि बलात्कार का अपराध सबसे गंभीर प्रकार का है और केवल उन्हीं मामलों में लागू किया जाना चाहिए, जहां वास्तविक यौन हिंसा, जबरन या स्वतंत्र सहमति का अभाव हो. पीठ ने कहा कि किसी रिश्ते के दौरान हुई शारीरिक अंतरंगता को सिफ.र् इसलिए बलात्कार का अपराध नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह रिश्ता शादी में परिणत नहीं हो पाया. पीठ ने यह भी कहा कि कानून को उन वास्तविक मामलों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए जहां भरोसे का कत्ल हुआ हो और सम्मान का हनन हुआ हो.
शीर्ष अदालत ने कहा, ”इस अदालत ने कई मौकों पर उस चिंतनीय प्रवृत्ति पर ध्यान दिया है, जिसमें असफल या टूटे हुए रिश्तों को आपराधिकता का रंग दे दिया जाता है.” पीठ ने मुंबई उच्च न्यायालय के औरंगाबाद पीठ की ओर से मार्च 2025 में दिये गए आदेश के विरुद्ध एक व्यक्ति द्वारा दायर अपील पर अपना फैसला सुनाया. उच्च न्यायालय ने छत्रपति संभाजीनगर शहर में अगस्त 2024 में दर्ज एक प्राथमिकी को रद्द करने संबंधी उसकी याचिका खारिज कर दी थी. इसने कहा कि मामले में बलात्कार का आरोप पूरी तरह से शिकायतकर्ता के इस दावे पर आधारित है कि व्यक्ति ने शादी का झूठा झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए.
पीठ ने कहा, ”हमारा मानना ??है कि वर्तमान मामला ऐसा नहीं है जहां अपीलकर्ता (पुरुष) ने प्रतिवादी संख्या-दो (महिला) को केवल शारीरिक सुख के लिए बहलाया-फुसलाया और फिर गायब हो गया. यह रिश्ता तीन साल तक चला, जो एक लंबी अवधि है.” न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में, किसी सक्रिय रिश्ते के दौरान हुई शारीरिक अंतरंगता को केवल इसलिए बलात्कार के अपराध के रूप में पूर्वव्यापी रूप से चिह्नित नहीं किया जा सकता, क्योंकि रिश्ता विवाह में परिणत नहीं हो पाया.
इसने कहा, ”न्यायालय उस सामाजिक संदर्भ के प्रति सचेत है जिसमें हमारे जैसे देश में विवाह संस्था का गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है.” पीठ ने कहा कि कानून को उन वास्तविक मामलों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए, जहां विश्वास का उल्लंघन हुआ हो और सम्मान का हनन हुआ हो, अन्यथा पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (आईपीएस) की धारा 376 (बलात्कार के लिए दंड) का सुरक्षात्मक दायरा वास्तव में पीड़ित लोगों के लिए महज औपचारिकता बनकर रह जाएगा. पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय यह समझने में विफल रहा कि प्राथमिकी को पढ़ने से ही पता चलता है कि पक्षों के बीच अंतरंग संबंध वास्तव में सहमति से बने थे.
इसने कहा कि इस मामले में जिन कृत्यों की शिकायत की गई है, वे उस समय स्वेच्छा से किए गए रिश्ते के दायरे में हुए थे.
पीठ ने मामले में दायर प्राथमिकी और आरोपपत्र को रद्द करते हुए कहा, ”ऐसे तथ्यों के आधार पर अभियोजन जारी रखना न्यायिक तंत्र के दुरुपयोग से कम नहीं होगा.” न्यायालय ने अपील स्वीकार कर ली और उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया.



