सौ बात की एक बात ये कि युरोप में जगह-जगह जो आंदोलन हो रहे हैं वो युवाओं की वजह से हो रहे हैं या बुज़ुर्गों की वजह से हो रहे हैं? फ़्रांस और युरोप में कई जगह जो ये आंदोलन हो रहे हैं, हिंसा हो रही है, ये सब जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शन बताए जा रहे हैं वो हक़ीक़त तो है लेकिन पूरी कहानी नहीं है। असली वजह एक ऐसा बुनियादी बदलाव है जिसको हर देश को समझने की ज़रूरत है। फ़्रांस में इस समय जो विरोध चल रहे हैं वजहें जो बताई जा रही हैं वो तो ये बताई जा रही हैं कि स्कूलों में टीचरों की भारी कमी चल रही है, हर क्लासरूम में बहुत ज़्यादा बच्चे भरे जा रहे हैं, स्कूलों की इमारतें टूटी-फूटी हालत में हो गई हैं। तो स्कूलों का बजट बढ़ाया जाए। पुर्तगाल में हज़ारों लोग सड़कों पर आ गए हैं क्योंकि वहां मकानों की क़ीमतें बढ़ गई हैं, किराए आसमान छू रहे हैं, वेतन कम हैं।
इटली में मिलान और अन्य शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं कि स्कूलों के लिए हालत ख़स्ता लगी पड़ी है, किराए बहुत बढ़ गए हैं। बेल्जियम में छात्र निकल आए हैं सड़कों पर कि यूनिवर्सिटी की फ़ीस बढ़ा दी गई है, सरकार ने बजट कम कर दिया है। ऐल्बेनिया में छात्र विश्वविद्यालय की खराब हालत और ऊंची फीस के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं। स्पेन में भी लोगों को मकान नहीं मिल पा रहे, किराए बहुत बढ़ गए हैं। यानी सब जगह एक बड़ी वजह ये दिख रही है विरोध की कि युवाओं को जो सरकार से मिलता है उसका बजट सरकार उतना नहीं दे रही जितना देना चाहिए। तो समझने वाली बात ये है कि बजट जा कहां रहा है? इतना ज़्यादा विरोध है तो वहां की सरकारें स्कूलों कॉलेजों का बजट बढ़ा क्यों नहीं रहीं? वहां तो सरकारें मकान बनाने पर बहुत पैसा ख़र्च करतीं थीं ताकि लोगों को रहने की दिक़्क़त ना हो। तो ऐसा-कैसे हो रहा है कि युरोप के देशों को पैसा कम पड़ रहा है? वो कोई ग़रीब देश थोड़े ही हैं।
और युरोप में तो टैक्स भी बहुत लेती हैं सरकारें। और विरोध की बड़ी वजह ये भी है। क्योंकि लोग टैक्स बहुत देते हैं और अब तक तो ये मॉडल था कि टैक्स सरकार लेती थी और उसके बदले में लोगों को सुविधाएं मिलती थीं। स्कूल मिलते थे, मकान मिलते थे। वो नहीं मिल पा रहा इसलिए विरोध इतना उग्र होता जा रहा है। यहां के लोग वहां के टैक्स सुन लें होश ही उड़ जाएं। फ़्रांस में तरह-तरह के टैक्स इतने हैं कि एक आम वर्कर को औसत 47% टैक्स देना पड़ता है, मतलब यूं समझ लो कि आधी कमाई टैक्स में चली जाती है। बेल्जियम में औसत टैक्स 53% के क़रीब है, इटली में भी लगभग 47% के आसपास है, स्पेन और पुर्तगाल में भी लगभग 40% कमाई टैक्स में चली जाती है आम पब्लिक की। इसलिए सब लोग ग़ुस्से में हैं कि सुविधाएं तो दुरुस्त करो। तो इतना सारा टैक्स ले कर ये सारे युरोप के देश अब तक इतनी अच्छी सुविधाएं दे पा रहे थे तो अब क्यों नहीं दे पा रहे? उसकी वजह ये है कि वहां टैक्स देने वाले कम होते जा रहे हैं कई साल से, और टैक्स के पैसे से सुविधाएं लेने वाले बढ़ते जा रहे हैं।
सिर्फ़ शरणार्थियों की बात नहीं है कि सिरिया से, इराक़ से, अफ़्रीका से, जगह-जगह से मुसलमान शरणार्थी आ गए हैं युरोप में तो उनपर ख़र्च हो रहा है। ये नैरेटिव युरोप की कई पार्टियां ज़रूर बना रही हैं। अब तो ट्रंप ने भी कह दिया कि फ़्रांस में ये सब हिंसा इसीलिए हो रही है। लेकिन ये सिर्फ़ एक फ़ैक्टर है। जो बड़ा फ़ैक्टर है उसकी बात नहीं हो रही है और उसको समझने की ज़रूरत है। टैक्स देने वाले इसलिए कम हो गए हैं युरोप में क्योंकि टैक्स कौन देता है? जो काम करते हैं। और काम कौन करते हैं? जो काम करने की उम्र के होते हैं। युरोप में लोगों ने कई दशकों से बच्चे ही पैदा करने कम कर दिए थे। जनसंख्या ही घटती जा रही है। तो हो क्या गया है कि वहां बुज़ुर्ग ज़्यादा हो गए हैं। तो बजट कहां जा रहा है? पेंशन में। तनख़्वाहें नहीं बढ़ा पा रही सरकारें। क्योंकि पैसा तो पेंशन में जा रहा है। अस्पतालों में जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं में जा रहा है। स्कूलों की मरम्मत कहां से हो? टैक्स तो मोटा ले रहे हैं।
50% से ज़्यादा टैक्स कहां से ले लें? लेकिन काम करने की उम्र के लोग ही उतने नहीं है। बुज़ुर्ग इतने हो गए हैं। वो टैक्स देते नहीं। उनको पेंशन देनी पड़ती है क्योंकि उन्होंने जब काम किया तो इतना मोटा-मोटा टैक्स दिया था। उनके इलाज पर अस्पतालों में ख़र्च करना पड़ता है क्योंकि उन्होंने इतना मोटा-मोटा टैक्स दिया था। लोग बच्चे कम पैदा कर रहे हैं और मेडिकल सुविधाएं और रिसर्च ऐसी हो गई है कि लोग ज्यादा लंबे समय तक जी रहे हैं। युवा काम करने वालों की संख्या कम हो रही है और बुज़ुर्गों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। फिर भी फ़्रांस में बजट का लगभग 12% सरकरा शिक्षा पर ख़र्च करती है। लेकिन उसमें 32% कहां चला जाता है? टीचरों और दूसरे कर्मचारियों की पेंशन में। यानी एक तिहाई पैसा तो पेंशन देने में चला जाता है, नए टीचरों की भर्ती कहां से होगी? स्कूल कहां से बनेंगे? स्कूलों की मरम्मत कैसे होगी? और स्कूलों के टीचरों की पेंशन की ही बात नहीं है, फ्रांस में तो देश की कुल अर्थव्यवस्था का लगभग 14% ख़र्च ही पेंशन पर हो रहा है सरकार का।
कुछ टाइम पहले आपको याद होगा शायद इसी वजह से राष्ट्रपति मैक्रों की सरकार ने रिटायरमेंट की उम्र 62 साल से बढ़ाकर 64 साल करने की कोशिश की थी। पेंशन का ख़र्च कम करने के लिए ये कोशिश थी। लेकिन लाखों लोग सड़कों पर आ गए थे कि पहले ही 62 साल परल रिटायर हो रहे हैं, 64 तक क्यों काम करेंगे? सरकार को फ़ैसला वापस लेना पड़ गया था। यही सिचुएशन यूरोप के ज़्यादातर देशों है। जर्मनी में, स्पेन में, इटली में सब जगह बुज़ुर्ग ज़्यादा हो गए हैं। लोगों ने इतने सालों तक बच्चे ही पैदा नहीं किए। या कम पैदा किये। अब उन सबको पेंशन देनी है, उनके इलाज के लिए अस्पताल चलाने हैं, लेकिन उनकी जगह काम करने के लिए युवा उतने आए नहीं नहीं क्योंकि उनके बच्चे ही नहीं थे उतने। तो टैक्स कौन देगा कि पेंशन का पैसा दे सकें? अब आ जाइए सरकार पर दबाव पर। जब रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था फ़्रांस की सरकार ने तो फ़ैसला वापस लेना पड़ा था। तो वो दबाव क्यों काम कर गया सरकार पर और जेन ज़ी क्यों नहीं दबाव डाल पा रहे इतनी हिंसा के बाद भी?
क्योंकि फ़्रांस के वोटरों में 30% यानी लगभग एक तिहाई 65 साल से ज़्यादा उम्र के हैं। यानी हर तीन में एक वोटर तो बुज़ुर्ग है वहां पर। और 25 साल से कम कितने वोटर हैं? सिर्फ़ 11%, 30 साल से कम उम्र वाले भी सिर्फ़ 17% वोटर ही हैं। यानी 30% लोग तो 65 साल से ज़्यादा उम्र के हौं और सिर्फ़ 17% 30 साल से कम उम्र के हैं। 25 साल से कम वाले तो 11% ही हैं। तो कौनसा वोटबैंक बड़ा हुआ? चुनावों का तो हिसाब-किताब आप जानते ही हो। ऊपर से बुज़ुर्ग लोग तो वहां पक्का वोट देने जाते हैं, युवा तो उतनी तादाद में हैं भी नहीं और जितने हैं वो वोट देने उतने जाते भी नहीं। ये है हक़ीक़त के पीछे की हक़ीक़त। जनसंख्या बढ़ना ही समस्या नहीं होती। जनसंख्या घटना और तेज़ी से घटना तो बहुत ही बड़ी समस्या हो जाती है। सौ बात की एक बात।