प्रधानमंत्री कजान जाएंगे, मणिपुर आज भी उनका इंतजार कर रहा है: कांग्रेस

चीन के मुद्दे पर साढ़े चार वर्षों से संसद में चर्चा नहीं होने दी गई: कांग्रेस

नयी दिल्ली. कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने से पहले सोमवार को कटाक्ष करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री रूस के शहर कज़ान तो पहुंच जाएंगे, लेकिन दुख की बात है कि मणिपुर अभी भी उनका इंतज़ार कर रहा है. प्रधानमंत्री मोदी 16वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के निमंत्रण पर 22-23 अक्टूबर को रूस की यात्रा करेंगे. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की 16वीं बैठक रूस के कजान में आयोजित की जाएगी.

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”रूस के कज़ान में कल से विस्तारित ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन शुरू हो रहा है. प्रधानमंत्री ऐसी अधिकतर चीज़ों का श्रेय लेने लगते हैं, लेकिन ऐसे शिखर सम्मेलन का 2014 से पहले का भी इतिहास रहा है.” उन्होंने कहा, ”नवंबर 2001 में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जिम ओ’ नील ने पहली बार ब्रिक (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) नाम दिया था ताकि उस चौकड़ी की ओर ध्यान आर्किषत किया जा सके जो 2050 तक दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियां बन सकती हैं. वर्ष 2006 के सितंबर महीने में, इन चार देशों के विदेश मंत्रियों ने न्यूयॉर्क में मुलाक.ात की और कोशिश की कि वे ओ’नील की आर्थिक अवधारणा को राजनीतिक महत्व कैसे दे सकते हैं.”

रमेश के अनुसार, जून 2009 में, चीन, ब्राज़ील और रूस के राष्ट्रपतियों और भारत के प्रधानमंत्री ने पहली बार ब्रिक शिखर सम्मेलन के लिए रूस में मुलाक.ात की. दो साल बाद ब्रिक, ब्रिक्स बना और दक्षिण अफ्रीका को समूह में शामिल किया गया. नई दिल्ली ने मार्च 2012 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की.” उन्होंने कहा कि अब ब्रिक्स में मिस्र, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इथियोपिया पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हैं तथा कई अन्य देश इसमें शामिल होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. रमेश ने कटाक्ष करते हुए कहा, ”मोदी जी कज़ान तो पहुंच जाएंगे लेकिन दु?ख की बात है कि मणिपुर अभी भी उनका इंतज़ार कर रहा है.”

चीन के मुद्दे पर साढ़े चार वर्षों से संसद में चर्चा नहीं होने दी गई: कांग्रेस

कांग्रेस ने भारतीय और चीनी वार्ताकारों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के आसपास गतिरोध वाले बाकी बिंदुओं पर गश्त के लिए सहमति बनने की घोषणा के बाद सोमवार को सरकार पर कटाक्ष करते हुए दावा किया कि संसद में पिछले साढ़े चार वर्षों में एक बार भी चीन के साथ लगी सीमा की स्थिति पर चर्चा नहीं होने दी गई.

पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चार साल पुरानी एक टिप्पणी को लेकर सवाल किया कि क्या देश प्रधानमंत्री की टिप्पणियों को कभी भूल सकता है जिसने ”भारत के पक्ष को बेहद कमज.ोर कर दिया है?” भारत ने सोमवार को घोषणा की कि भारतीय और चीनी वार्ताकार पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर गतिरोध वाले बाकी बिंदुओं पर गश्त के लिए एक समझौते पर सहमत हुए हैं. इस समझौते को पूर्वी लद्दाख में लगभग चार वर्षों से जारी सैन्य गतिरोध के समाधान की दिशा में एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है.

रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”अभी जब हम भारत और चीन के बीच हुए समझौते के विस्तृत विवरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तब यह याद करना उचित होगा कि संसद में पिछले साढ़े चार वर्षों में एक बार भी सीमा की स्थिति पर चर्चा नहीं होने दी गई है.” उन्होंने सवाल किया कि क्या देश प्रधानमंत्री द्वारा 19 जून, 2020 को की गई उन टिप्पणियों को कभी भूल सकता है जिसने हमारे पक्ष को बेहद कमजोर कर दिया है? रमेश ने सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री की टिप्पणी का एक वीडियो भी साझा किया जिसमें उन्होंने कहा था कि ”भारत की सीमा में न कोई घुस आया है, न ही घुसा हुआ है तथा हमारी कोई चौकी किसी दूसरे के कब्जे में नहीं है.”

दक्षिण के राज्यों को परिवार नियोजन की सफलता के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए: कांग्रेस

कांग्रेस ने सोमवार को कहा कि दक्षिण भारत के राज्यों को परिवार नियोजन की सफलता के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए और इसका असर संसद में उनके प्रतिनिधित्व पर नहीं होना चाहिए. पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह भी कहा कि दक्षिण भारतीय राज्यों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त फॉर्मूले पर काम किया जा सकता है.

रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, “दक्षिण भारतीय राज्य परिवार नियोजन में अग्रणी रहे हैं. प्रजनन क्षमता के प्रतिस्थापन स्तर तक पहुंचने वाला पहला स्थान 1988 में केरल था, उसके बाद 1993 में तमिलनाडु, 2001 में आंध्र प्रदेश और 2005 में कर्नाटक ने यह उपलब्धि हासिल की. ”

उन्होंने कहा, “पिछले कुछ समय से यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि इन सफलताओं से संसद में इन राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है. इसीलिए 2001 में वाजपेयी सरकार ने संविधान (अनुच्छेद 82) में संशोधन कर लोकसभा में पुनर्समायोजन को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के प्रकाशन पर निर्भर बना दिया.”

रमेश के अनुसार, आम तौर पर, 2026 के बाद पहली जनगणना का मतलब 2031 की जनगणना होती. लेकिन संपूर्ण दशकीय जनगणना कार्यक्रम बाधित हो गया है और यहां तक कि 2021 के लिए निर्धारित जनगणना भी नहीं की गई है. उन्होंने कहा, “हम सुनते रहे हैं कि लंबे समय से विलंबित जनगणना जल्द ही शुरू होगी. क्या इसका उपयोग लोकसभा में सीटों के आवंटन के लिए किया जाएगा?” रमेश ने कहा, “सफलता को दंडित कदापि नहीं किया जाना चाहिए. ऐसा न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त फॉर्मूले पर काम किया जा सकता है.”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button