कर्मचारियों के संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने पर लगी रोक हटने से लोकतंत्र मजबूत होगा : आरएसएस

नयी दिल्ली/लखनऊ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने सरकारी कर्मचारियों के संघ की गतिविधियों में शामिल होने पर लगी रोक हटाने के केंद्र सरकार के फैसले का सोमवार को स्वागत किया. आरएसएस ने कहा कि फैसले से देश की लोकतांत्रिक प्रणाली मजबूत होगी. उसने पूर्ववर्ती सरकारों पर अपने राजनीतिक हितों के कारण सरकारी कर्मचारियों को संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित करने का आरोप भी लगाया.

प्रतिबंध हटाने संबंधी सरकारी आदेश के सार्वजनिक होने के एक दिन बाद आरएसएस प्रवक्ता सुनील आंबेकर ने एक बयान में कहा, “सरकार का ताजा फैसला उचित है और यह भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली को मजबूत करेगा.” विपक्ष के कई नेताओं ने सरकारी  कर्मचारियों पर संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने पर लगा प्रतिबंध हटाने के केंद्र के फैसले की आलोचना की है. आंबेकर ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 99 वर्षों से लगातार राष्ट्र के पुर्निनर्माण एवं समाज की सेवा में सक्रिय है.

उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा, एकता-अखंडता और प्राकृतिक आपदा के समय में समाज को साथ लेकर चलने में संघ के योगदान के कारण देश के विभिन्न स्तर के नेतृत्व ने समय-समय पर संघ की भूमिका को सराहा है.” आंबेकर ने आरोप लगाया, “राजनीतिक हितों के कारण तत्कालीन सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के संघ जैसे रचनात्मक संगठन की गतिविधियों में हिस्सा लेने पर बेबुनियाद प्रतिबंध लगा दिया था.”

सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस की शाखाओं में जाने पर प्रतिबंध हटाने का निर्णय देशहित से परे : मायावती
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती ने सोमवार को कहा कि सरकारी कर्मचारियों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं में जाने पर 58 वर्ष से जारी प्रतिबंध को हटाने का केंद्र का निर्णय देशहित से परे है. कांग्रेस ने पिछले सप्ताह जारी एक कथित आधिकारिक आदेश का हवाला देते हुए रविवार को दावा किया कि आरएसएस की गतिविधियों में सरकारी कर्मचारियों के भाग लेने पर लगा ”प्रतिबंध” हटा लिया गया है.

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने सोमवार को इस मामले को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ”सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस की शाखाओं में जाने पर 58 वर्ष से जारी प्रतिबंध को हटाने का केन्द्र का निर्णय देशहित से परे और राजनीति से प्रेरित संघ तुष्टीकरण का निर्णय है ताकि सरकारी नीतियों व इनके (भाजपा सरकार) अहंकारी रवैयों आदि को लेकर लोकसभा चुनाव के बाद दोनों के बीच तीव्र हुई तल्खी दूर हो.”

बसपा प्रमुख ने सिलसिलेवार पोस्ट में कहा, ”सरकारी कर्मचारियों को संविधान व कानून के दायरे में रहकर निष्पक्षता के साथ जनहित व जनकल्याण में कार्य करना जरूरी होता है जबकि कई बार प्रतिबन्धित रहे आरएसएस की गतिविधियां राजनीतिक ही नहीं बल्कि पार्टी विशेष के लिए चुनावी भी रही हैं.” मायावती ने इस निर्णय को अनुचित बताते हुए इसे तुरन्त वापस लेने की मांग की है.

इससे पहले रविवार को, कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय द्वारा नौ जुलाई को जारी एक कार्यालय ज्ञापन साझा किया, जो आरएसएस की गतिविधियों में सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी से संबंधित है. उक्त आदेश में कहा गया है, ”उपर्युक्त निर्देशों की समीक्षा की गई है और यह निर्णय लिया गया है कि 30 नवंबर 1966, 25 जुलाई 1970 और 28 अक्टूबर 1980 के संबंधित कार्यालय ज्ञापनों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उल्लेख हटा दिया जाए.” आदेश की तस्वीर के साथ एक पोस्ट में रमेश ने कहा, ”फरवरी 1948 में गांधीजी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके बाद अच्छे आचरण के आश्वासन पर प्रतिबंध को हटाया गया. इसके बाद भी आरएसएस ने नागपुर में कभी तिरंगा नहीं फहराया.”

उन्होंने पोस्ट में कहा, ”1966 में आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने वाले सरकारी कर्मचारियों पर प्रतिबंध लगाया गया था और यह सही निर्णय भी था. यह 1966 में प्रतिबंध लगाने के लिए जारी किया गया आधिकारिक आदेश है.” रमेश ने कहा, ”चार जून 2024 के बाद स्वयंभू नॉन बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री और आरएसएस के बीच संबंधों में कड़वाहट आई है. नौ जुलाई 2024 को 58 साल का प्रतिबंध हटा दिया गया जो अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान भी लागू था.”

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