
नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया. न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइंया की पीठ ने कहा कि भ्रामक विज्ञापन समाज को बहुत नुकसान पहुंचा सकते हैं और उन्हें रोकना तथा अनजान जनता को बचाना आवश्यक है.
शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकारों को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे आम जनता औषधि एवं जादुई उपचार अधिनियम, 1954 के तहत प्रतिबंधित आपत्तिजनक विज्ञापनों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सके. पीठ ने कहा कि 1954 का अधिनियम 70 वर्ष से अधिक पुराना है और इसका सही अर्थों में क्रियान्वयन नहीं किया गया है. शीर्ष अदालत ने आगे कहा, ”हम राज्य सरकारों को निर्देश देते हैं कि वे आज से दो महीने की अवधि के भीतर उचित शिकायत निवारण तंत्र बनाएं और नियमित अंतराल पर इसकी उपलब्धता का पर्याप्त प्रचार करें.” इस प्रणाली के तहत टोल-फ्री नंबर पर या ईमेल के माध्यम से शिकायत दर्ज की जा सकती है.
शीर्ष अदालत ने राज्यों को 1954 के अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन के संबंध में पुलिस तंत्र को संवेदनशील बनाने का निर्देश दिया. पीठ ने कहा, ”हम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को राजपत्रित अधिकारियों की नियुक्ति करने का निर्देश देते हैं, जो तलाशी, जब्ती आदि के लिए औषधि एवं जादुई उपचार अधिनियम की धारा-8 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए अधिकृत होंगे.” शीर्ष अदालत ने कहा कि जैसे ही शिकायत निवारण तंत्र या अन्य माध्यम से शिकायतें प्राप्त होंगी, उन्हें तुरंत कार्रवाई के लिए संबंधित अधिकारी को भेज दिया जाएगा.
पीठ ने कहा, ”यदि अधिकारी को लगता है कि 1954 के अधिनियम का उल्लंघन हुआ है तो वह पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराकर आपराधिक कानून लागू करेगा, ताकि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जा सके.” आदेश में रजिस्ट्री को भी यह निर्देश दिया गया कि वह 1954 के अधिनियम के बारे में जागरूकता कार्यक्रमों के लिए आदेश की प्रति राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के साथ साझा करे.
पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह तीन महीने के भीतर भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ कार्रवाई को प्रर्दिशत करने के लिए एक ‘डैशबोर्ड’ (सूचनापट) का निर्माण सुनिश्चित करे.
भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाते हुए उच्चतम न्यायालय ने सात मई, 2024 को निर्देश दिया था कि किसी भी विज्ञापन को जारी करने की अनुमति देने से पहले, केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 की तर्ज पर विज्ञापनदाताओं से स्व-घोषणा प्राप्त की जाए.
ऐसे विज्ञापनों का मुद्दा तब उठा था जब शीर्ष अदालत 2022 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पतंजलि और योग गुरु रामदेव पर कोविड-रोधी टीकाकरण अभियान और आधुनिक चिकित्सा पद्धति को बदनाम करने का अभियान चलाने का आरोप लगाया गया था.



