कागज पर छात्र, हकीकत में सन्नाटा: चार वर्षों तक ‘घोस्ट हॉस्टलों’ पर बरसता रहा पैसा, एक जांच से कैसे खुला राज?

 मुंबई: महाराष्ट्र में सरकारी धन के दुरुपयोग का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जर्जर इमारतें, बंद पड़े हॉस्टल और धूल से ढके खाली बिस्तर… लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में सब कुछ सामान्य दिखाया जाता रहा। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य के छह ऐसे “घोस्ट हॉस्टल” (सिर्फ कागजों पर संचालित हॉस्टल) को, जहां एक भी छात्र नहीं रह रहा था, वहां भी चार वर्षों तक कुल 1.62 करोड़ रुपये की सरकारी फंडिंग जारी की गई।

CAG रिपोर्ट में क्या सामने आया?
10 जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में पेश की गई CAG की कंप्लायंस ऑडिट रिपोर्ट-2024 में पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों के लिए संचालित सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त हॉस्टलों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में बुनियादी ढांचे, सुरक्षा, स्वच्छता और वित्तीय प्रबंधन में भारी अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है। CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग ने चार वर्षों तक ऐसे संस्थानों को 1.62 करोड़ रुपये जारी किए, जो वास्तव में संचालित ही नहीं हो रहे थे। रिपोर्ट में इन छह संस्थानों को ‘घोस्ट हॉस्टल’ बताया गया है और इसे सार्वजनिक धन के खुले दुरुपयोग का मामला माना गया है।
राज्य में कितने हॉस्टल संचालित हो रहे हैं?
मार्च 2024 तक महाराष्ट्र में 443 सरकारी और 2,388 सरकारी सहायता प्राप्त हॉस्टल संचालित थे। इनमें 1,21,971 छात्र और 40,543 छात्राएं रह रही थीं। ऑडिट अवधि के दौरान राज्य सरकार ने इन हॉस्टलों पर कुल 2,321 करोड़ रुपये खर्च किए। CAG की टीम ने जांच के दौरान 18 सरकारी और 21 सरकारी सहायता प्राप्त हॉस्टलों का मौके पर जाकर निरीक्षण किया।
किस हॉस्टल में सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा मिला?
रिपोर्ट में जालना जिले के मोदीखान हॉस्टल का विशेष उल्लेख किया गया है। जांच के दौरान हॉस्टल की इमारत पूरी तरह जर्जर और बंद मिली। वहां किसी छात्र के रहने के कोई संकेत नहीं थे, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में 38 छात्र और एक अधीक्षक (सुपरिटेंडेंट) दर्ज थे। हैरानी की बात यह रही कि राज्य सरकार ने इस हॉस्टल को चार वर्षों तक मानदेय के रूप में 18 लाख रुपये जारी किए। CAG की टीम को जाफराबाद (जालना) में 24 छात्रों की क्षमता वाले हॉस्टल में धूल से ढके खाली बिस्तर मिले, जहां लंबे समय से कोई नहीं रह रहा था। इसके अलावा जालना जिले में चार अन्य तथा बुलढाणा और लातूर में एक-एक ऐसे ही ‘घोस्ट हॉस्टल’ पाए गए।

सरकारी हॉस्टलों में कौन-कौन सी सुविधाएं नहीं मिलीं?
रिपोर्ट के अनुसार कई सरकारी हॉस्टलों में डाइनिंग हॉल, पुस्तकालय, कंप्यूटर लैब, सीसीटीवी निगरानी, दैनिक समाचार पत्र, टेलीविजन और बिजली बैकअप जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव था। नियमित स्वास्थ्य जांच लगभग नहीं के बराबर पाई गई। चार हॉस्टलों में टेबल-कुर्सियां तक उपलब्ध नहीं थीं, जिससे छात्रों को जमीन पर बैठकर भोजन करना पड़ता था।

दिव्यांग छात्रों के अधिकारों की अनदेखी कैसे हुई?
रिपोर्ट में बताया गया कि अहिल्यानगर, धाराशिव, जालना और नागपुर के कुछ हॉस्टलों में दिव्यांग छात्रों के लिए निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया। नियमानुसार उन्हें भूतल पर कमरे दिए जाने चाहिए थे, लेकिन उन्हें ऊपरी मंजिलों पर ठहराया गया।

बायोमेट्रिक और निगरानी व्यवस्था की क्या स्थिति रही?
CAG ने पाया कि राज्य के 280 सरकारी हॉस्टलों में बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली तो लगाई गई थी, लेकिन इनमें से केवल 46 हॉस्टलों में ही मशीनें कार्यरत थीं। इसके अलावा कई हॉस्टलों में साफ-सफाई की खराब स्थिति, निम्न गुणवत्ता का भोजन, स्वच्छ पेयजल की कमी, अपर्याप्त रोशनी और अनाज का अनिवार्य एक महीने का बफर स्टॉक न रखने जैसी गंभीर कमियां भी सामने आईं।

करोड़ों रुपये का बजट खर्च क्यों नहीं हुआ?
रिपोर्ट में वित्तीय प्रबंधन पर भी सवाल उठाए गए हैं। वर्ष 2023-24 में सरकारी हॉस्टलों के लिए आवंटित 487 करोड़ रुपये में से 56.65 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए गए।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button