
नयी दिल्ली. राज्यसभा में बुधवार को विपक्ष ने भाजपा पर इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया और कांग्रेस सदस्य जयराम रमेश ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 साल पूरे होने पर संसद में हो रही चर्चा का मकसद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बदनाम करना था.
‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 साल पूरे होने पर राज्यसभा में हुई चर्चा में हिस्सा लेते हुए रमेश ने भाजपा पर देश के लिए शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि जो लोग बार-बार नेहरू का नाम ले रहे हैं, वह उन लोगों का अपमान कर रहे हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए तब अपनी कुर्बानी दी ‘जब आप लोग अंग्रेजों के साथ मिलजुल कर काम करने को तैयार थे.’ रमेश ने कहा कि लोग इतिहास में राजनीति को घुसा रहे हैं. उन्होंने कहा कि कुछ लोग ‘हिस्टोरियन (इतिहासकार) बनना चाहते हैं ंिकतु ‘डिस्टोरियन (विकृत करने वाले)’ बन गये हैं.
उच्च सदन में मंगलवार को इस चर्चा की शुरूआत करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि यदि राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के दो टुकड़े न किए जाते तो देश का विभाजन भी नहीं होता. रमेश ने कहा कि बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने 28 सितंबर 1937 को सरदार वल्लभ भाई पटेल को एक पत्र लिखकर कहा था कि ‘वंदे मातरम्’ को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में जो राय है उसे देखते हुए कांग्रेस की कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) में कोई रुख अपनाया जाए. रमेश ने कहा कि क्या यह कहा जा सकता है कि राजेन्द्र प्रसाद और सरदार पटेल उस समय तुष्टीकरण कर रहे थे? कांग्रेस नेता ने कहा कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने 16 अक्टूबर 1937 को गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर को एक पत्र लिखकर उनसे पूछा कि वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस कार्य समिति में पार्टी का क्या रुख होना चाहिए? उन्होंने कहा कि 19 अक्टूबर 1937 को गुरुदेव ने इसका जवाब दिया था. उन्होंने कहा कि नेता जी ने 17 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू को भी पत्र लिखा था.
रमेश ने कहा कि 28 अक्टूबर 1937 को कोलकाता में सीडब्ल्यूसी में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जो प्रस्ताव हुआ, उस समय महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेताजी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि बड़े-बड़े नेता मौजूद थे. उन्होंने सवाल किया कि इन बड़े नेताओं पर तुष्टीकरण का आरोप कैसे लगाया जा सकता है? कांग्रेस सांसद ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ मूल रूप से 1875 में लिखा गया और 1882 में इसमें कुछ और अंश जोड़े गये. उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी का मानना था कि विज्ञान एवं आध्यात्मिकता का मिलन आवश्यक है.
उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ पर चर्चा के जरिये गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र जातिवाद को भारतीय समाज के लिए एक शाप मानते थे. रमेश ने कहा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान में जाकर जिन्ना की सराहना की थी तो क्या वह तुष्टीकरण नहीं था? कांग्रेस के ही सैयद नासिर हुसैन ने भी चर्चा में हिस्सा लेते हुए भाजपा पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि जिन्ना की मज़ार पर सिर झुकाने वालों को हमें राष्ट्रवाद सिखाने की जरूरत नहीं है.
उन्होंने कहा, “देश में पैदा हुए हर भारतीय के लिए राष्ट्रवाद ज़रूरी है. अब, क्या जिन्ना की मज़ार पर सिर झुकाने वाले हमें राष्ट्रवाद सिखाएंगे?” हुसैन ने कहा कि हर कोई भारत के राष्ट्र गीत के तौर पर ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान करता है और “छिटपुट तत्व यह तय नहीं कर सकते कि कौन वंदे मातरम् गाएगा और कौन नहीं.” उन्होंने कहा कि इस चर्चा के दौरान कांग्रेस नेताओं को घेरने की कोशिश की गयी जो नाकाम रही.
हुसैन ने कहा कि यह ऐतिहासिक सच है कि कांग्रेस पार्टी ने और उसके कार्यकर्ताओं ने अपने कार्यक्रमों के जरिए ‘वंदे मातरम्’ को देश के कोने-कोने तक फैलाया. उन्होंने कहा कि 1937 के आसपास ‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश में दो प्रमुख राजनीतिक विचारधाराएं थीं. उनमें से एक मुस्लिम लीग की विचारधारा और दूसरी हिंदू महासभा की थी.
उन्होंने कहा कि जब राष्ट्र गीत को लेकर बहुत सारे विवाद पैदा हो रहे थे तब कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर ‘वंदे मातरम्’ के दो अंतरों को शामिल करने का निर्णय किया. हुसैन ने कहा कि भाजपा कांग्रेस पार्टी पर जो आरोप लगा रही है, वह वास्तव में कांग्रेस पर नहीं, बल्कि रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, बी आर आंबेडकर पर आरोप लगा रही है.



