सजा में छूट न केवल संवैधानिक, बल्कि वैधानिक अधिकार भी है: उच्चतम न्यायालय

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 02 Sep 2025 07:35 PM
सजा में छूट न केवल संवैधानिक, बल्कि वैधानिक अधिकार भी है: उच्चतम न्यायालय
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने नाबालिगों से सामूहिक बलात्कार के मामलों में शेष जीवन के लिये आजीवन कारावास की सजा पाए दोषियों के सजा में छूट मांगने के अधिकार को मंगलवार को रेखांकित करते हुए कहा कि यह न केवल संवैधानिक, बल्कि वैधानिक अधिकार भी है. न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ तत्कालीन भारतीय दंड संहिता की धारा 376डीए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी. धारा 376डीए 16 वर्ष से कम उम्र की नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार की सजा से संबंधित है.

मामले में पक्षकार बनाए जाने का अनुरोध कर रहे एक याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि धारा 376डीए के अनुसार सत्र अदालत के पास आजीवन कारावास देने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है, जिसका अर्थ है कि उस व्यक्ति के शेष जीवन के लिए जेल की सजा.
पीठ ने दो पहलुओं पर गौर किया, जिनमें से पहला प्रावधान के तहत निर्धारित दंड पर था, जिसे सत्र अदालत में मुकदमा चलाए जाने के बाद लागू किया जाना था और जिसे उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है.

पीठ ने कहा, “मामले का दूसरा पहलू यह है कि यदि किसी दोषी को ऐसी सजा दी भी जाती है, तो उसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 72 या अनुच्छेद 161 के अनुसार राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल के समक्ष सजा माफी के लिए आवेदन करके सजा में छूट मांगने का अधिकार है.” शीर्ष अदालत ने कहा कि इसके अलावा ऐसे आरोपी के पास सजा में छूट पाने का वैधानिक उपाय भी है. पीठ ने कहा, “इसलिए, सज.ा में छूट पाने का अधिकार न केवल एक संवैधानिक अधिकार है, बल्कि एक वैधानिक अधिकार भी है और प्रत्येक राज्य की सज.ा में छूट की अपनी नीति है… जो तब भी लागू होती है जब सज.ा आईपीसी की धारा 376डीए या धारा 376डीबी के तहत दी गई हो.”

धारा 376डीबी, 12 वर्ष से कम उम्र की नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के लिए दंड से संबंधित है. शीर्ष अदालत ने कहा कि धारा 376डीए या 376डीबी के तहत दी गई आजीवन कारावास की सजा, शेष जीवन के लिए, संविधान, वैधानिक व्यवस्था और प्रत्येक राज्य में लागू छूट नीति के तहत किसी दोषी के छूट प्राप्त करने के अधिकार को नहीं छीनेगी. वकील ने कहा कि आईपीसी की धारा 376डीए के तहत निर्धारित सजा का अर्थ यह होगा कि दोषी से संबंधित कोई भी ऐसी परिस्थितियां नहीं हैं, जिन पर विचार किया जा सके. पीठ ने कहा कि केंद्र ने आईपीसी की धारा 376डीए का समर्थन किया है. इसके बाद शीर्ष अदालत ने धारा 376डीए के तहत सजा के एकमात्र प्रकार के निर्धारण पर याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए कानूनी प्रश्न को खुला छोड़ दिया और कहा कि इस पर उचित मामले में विचार किया जा सकता है.

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